50 साल हो गए अभिनेता पृथ्वीराज कपूर को दुनिया से गए हुए। उनके नाम पर मुंबई के जुहू में समंदर किनारे बना ‘पृथ्वी थियेटर’ अब भी उनकी यादों से गुलजार है। यहां काम करने वाले ‘पापाजी’ की बात छिड़ने पर ही भावुक हो जाते हैं, कहते हैं, ‘कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब कोई यहां उनकी बात न छेड़ देता हो।’ पृथ्वीराज कपूर को उनके साथ काम करने वाले भी ‘पापाजी’ कहकर बुलाते थे और आज भी सांझ ढलते ही पृथ्वी थियेटर में ‘पापाजी’ की बसाई दुनिया में जिंदगी के नौ रस अलग अलग नाटकों में झलकने लगते रंगमंच और सिनेमा से जुड़ा शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर को न जानता हो, उनकी यादों के संग कुछ पल बिताने के लिए ‘अमर उजाला’ ने एक शाम यहां काम करने वालों के साथ बिताई, आइए देखते हैं क्या कहते हैं ‘पापाजी’ के चाहने वाले..
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राहुल रावल, पृथ्वीराज कपूर
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राहुल रावल पृथ्वी थियेटर में 2019 से हैं। वह कहते हैं, 'मुझे यहां जो भी काम मिलता है कर लेता हूं क्योंकि उससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। पृथ्वी थियेटर के बारे में अखबारों में बहुत कुछ पढ़ रखा है। जहां तक मुझे पता है पृथ्वीराज कपूर साहब ने थियेटर की शुरुआत बहुत ही छोटे से स्तर से यहां झोपड़ा बनाकर की थी। वह धीरे धीरे डेवलप होता होता, आज यहां तक पहुंच गया। मुंबई के बाहर भी यह थियेटर बहुत प्रसिद्ध है।'
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पृथ्वीराज कपूर, नितिन मालिक
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वहीं बस दो हफ्ता पहले यहां काम शुरू करने वाले नितिन मालिक कहते हैं, ‘मेरे लिए पृथ्वी थियेटर से जुड़ना बहुत बड़ी बात है। पृथ्वी थियेटर के बारे में बहुत सुना था कि यहां बहुत बड़े बड़े दिग्गजों ने काम किया है। लेकिन पृथ्वीराज कपूर के बारे में मैंने अपने दादा और दादी से बहुत कुछ सुना है। दोनों उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे, उनकी फिल्में बहुत देखते थे, मैंने भी उनके साथ 'मुगल ए आजम' देखी है। ऐसी शख्सीयत को दुनिया से गए 50 साल हो गए हैं, मन मानने को तैयार नहीं होता'
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पृथ्वीराज कपूर, वेद मान सिंह
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वेद मान सिंह पृथ्वी थियेटर में स्वयंसेवक के रूप में काम करते हैं। वह कहते है, 'जब मुंबई पहले दिन पहुंचा तो उसी दिन सीधे पृथ्वी थियेटर देखने आ गया था। अब वालंटियर के रूप में यहां पांच साल से काम कर रहा हूं। थियेटर की शुरुआत सबसे पहले पृथ्वीराज कपूर साहब ने की थी। उसके बाद सत्यदेव दुबे ने थियेटर की शुरुआत की थी। पृथ्वीराज कपूर की फिल्म 'मुगल ए आजम' मैंने देखी है। एक मेथड एक्टर के तौर पर उनका अभिनय देखकर बहुत कुछ सीखा जात सकता है।'
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पृथ्वीराज कपूर, इरफान अहमद कुरैशी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, पृथ्वी थियेटर के कैफे में काम करने वाले इरफान अहमद कुरैशी की तो बात ही अलग है। वह कहते हैं, 'मुझे यहां पर काम करते 13 साल हो गए। थियेटर में सबका अभिनय देखते देखते मैं लेखक बन गया। मैं कहानियां, गीत और गजल लिखता हूं। एक बार थियेटर में मैंने भी परफॉर्म किया है। पृथ्वीराज कपूर के बारे में जो कुछ भी जाना उनके बेटे शशि कपूर साहब से जाना। वह यहां आते थे तो मैं उनको हर बार फ्रेश लाइम सोडा और आइस टी सर्व करता था।'
मुंबई में सिर्फ एक काम से किसी का गुजारा नहीं होता। ये एक बार फिर हमें समझाया पृथ्वी थियेटर में काम करने वाले नितिन समीर कंक ने। वह यहां वैसे तो ड्राइवर की नौकरी करते हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर यहां होने वाले नाटकों का प्रोडक्शन भी संभाल लेते हैं। नितिन कहते हैं, 'मुझे पृथ्वी थियेटर में 23 साल से ज्यादा हो गए। पृथ्वीराज कपूर हमारे साहब शशि कपूर के पिता थे। उन्होंने जिस तरह से संघर्ष करके इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई, उसे सुनकर मुझे बहुत ही प्रेरणा मिली है। मैंने सुना है कि जब पृथ्वीराज कपूर देश में घूम घूम कर नाटक करते थे तो उनके नाटकों के प्रभाव से तमाम युवक स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे।'
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संजय पवार, पृथ्वीराज कपूर
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
संजय पवार पृथ्वी थियेटर के ऑफिस में पिछले 25 वर्षों से काम कर रहे हैं। वह कहते हैं, 'हम लोग पृथ्वीराज कपूर को प्यार से ‘पापाजी’ कहते हैं। पृथ्वीराज कपूर के बारे में जितना सुना है, वह शशि कपूर साहब से ही सुना है कि वह किसी से भेदभाव नहीं रखते थे। उनका कहना था कि फिल्मों में कदम रखने से पहले थियेटर करना बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने पृथ्वी थियेटर की स्थापना की और शशि कपूर साहब ने उनके सपने को साकार किया।'
पृथ्वीराज कपूर, सुरेश सोलंकी
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थियेटर कैसे बड़े-छोटे और ऊंचे-नीचे का भेदभाव मिटा देता है, ये हमें समझाया पृथ्वी थियेटर में हाउसकीपिंग का काम संभालने वाले सुरेश सोलंकी ने। वह पृथ्वी थियेटर में पिछले 26 साल से साफ सफाई का काम करते आ रहे हैं, कहते हैं, 'जब मैं नया नया आया तो पृथ्वी थियेटर और पृथ्वीराज कपूर के बारे में इतनी जानकारी नहीं थी लेकिन धीरे धीरे मैंने उनके बारे में जाना। और जितना मैं उनको जानता गया, उतना ही मेरा उनके प्रति आदर और प्रेम बढ़ता गया।’