जब भारतीय सिनेमा में महिला किरदारों को भी पुरुष कलाकार या फिर कोठे पर काम करने वाली ही निभाया करती थीं उस समय फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर अभिनेत्री दुर्गा खोटे एक नया बदलाव लाईं। वह ऐसा समय था जब अच्छे परिवार की महिलाएं फिल्मों में काम नहीं करती थीं। तब दुर्गा खोटे ने इस रूढ़िवादिता को तोड़ा और हिंदी और मराठी फिल्मों में कई बेहतरीन किरदारों को निभाने के साथ सिनेमा में हमेशा के लिए अमर हो गईं। इस महान अभिनेत्री के जन्मदिन के मौके पर आज हम आपको उनके करियर के कुछ बेहतरीन किरदारों के बारे में बताते हैं।
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दुर्गा खोटे
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
किरदार : तारामती
फिल्म : अयोध्येचा राजा (1932)
दुर्गा खोटे ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक मूक फिल्म 'फरेबी जाल' से की थी। वी शांताराम की कंपनी प्रभात फिल्म कंपनी के बैनर तले बनी इस फिल्म में दुर्गा का एक छोटा सा ही किरदार रहा। उनको पहचान तब मिली जब इसी कंपनी के बैनर तले उन्होंने अपनी पहली बोलती फिल्म 'अयोध्येचा राजा' में तारामती का किरदार निभाया। इस फिल्म से दुर्गा की प्रसिद्धि बहुत दूर तक फैली। वैसे दुर्गा प्रभात फिल्म कंपनी के साथ माहवार तनख्वाह लेकर काम करते थीं। लेकिन, इस फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने अपने आप को आजाद कर लिया और उस समय की दूसरी फिल्म कंपनियों के साथ भी काम करने लगीं।
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दुर्गा खोटे
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
किरदार : सौदामिनी
फिल्म : अमर ज्योति (1936)
दुर्गा खोटे के सबसे बेहतरीन किरदारों में से एक किरदार सौदामिनी का भी है जो उन्होंने वी शांताराम के निर्देशन में बनी फिल्म 'अमर ज्योति' में निभाया। सौदामिनी एक साहसी महिला होती है जो अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिए समुद्री डाकू बन जाती है। वहीं से वह अपने राज्य के तानाशाह की नाक में दम कर देती है। इस फिल्म के जबरदस्त हिट होने के पीछे बताया जाता है कि दुर्गा खोटे की बेहतरीन अदाकारी ही पर्दे पर रंग लाई। इसके अलावा फिल्म का संगीत भी बेहतरीन रहा। यहां से दुर्गा खोटे उस समय के महान कलाकारों चंद्र मोहन, सोहराब मोदी और पृथ्वीराज कपूर की कतार में आकर खड़ी हो गईं।
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दुर्गा खोटे
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
किरदार : विद्या की सास
फिल्म : चरणों की दासी (1941)
फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत किए दुर्गा खोटे को कुछ ही समय बीता था और इतने कम समय में उन्होंने वर्ष 1938 में आई एक फिल्म 'साथी' का निर्माण और निर्देशन भी कर डाला। भारतीय सिनेमा में वह पहली कुछ महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने अभिनय के अलावा निर्माण और निर्देशन में भी काम शुरू किया। और जब 40 के दशक की शुरुआत हुई तो दुर्गा के खाते में आए दो बड़े पुरस्कार। गजानन जागीरदार के निर्देशन में बनी फिल्म 'चरणों की दासी' में दुर्गा को विद्या की सास किरदार में देखा गया। विद्या का किरदार फिल्म में अभिनेत्री वानामाला ने निभाया है। यह पारिवारिक ड्रामा फिल्म हिंदी के अलावा मराठी भाषा में भी रिलीज जिसका शीर्षक रहा 'पायाची दासी'। इस फिल्म में बेहतरीन किरदार निभाने के लिए दुर्गा को बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड से सम्मानित किया गया।
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दुर्गा खोटे
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किरदार : महारानी कैकेयी
फिल्म : भरत मिलाप (1942)
इसके अगले ही साल वर्ष 1942 में दुर्गा खोटे ने एक और फिल्म 'भरत मिलाप' में बेहतरीन काम कर दिखाया। जिसके लिए दुर्गा को दूसरी साल लगातार बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड से सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का यह पुरस्कार दुर्गा को फिल्म में महारानी कैकेयी का किरदार निभाने के लिए मिला। फिल्म की कहानी महारानी कैकेयी और उनकी दासी मंथरा से ही शुरू होती है जो अपने महाराज दशरथ से जानबूझकर अपने बेटे भरत को राजा बनाने के लिए भगवान श्री राम का वनवास चाहती है। महारानी कैकेयी के किरदार में दुर्गा ने बेहतरीन काम कर दिखाया।
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दुर्गा खोटे
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
किरदार : जोधाबाई
फिल्म : मुगल-ए-आजम (1960)
दुर्गा खोटे ने अपने करियर की शुरुआत में भी हर तरह के किरदार निभाए और जब धीरे-धीरे वह फिल्मों के साथ आगे बढ़ती रहीं, तब भी उन्हें अलग किरदारों को निभाने से परहेज न रहा। वर्ष 1960 में आई के. आसिफ की फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में दुर्गा खोटे को महारानी जोधाबाई का किरदार निभाने का मौका मिला और उन्होंने इस किरदार को भी हाथों हाथ लिया। जोधा बाई अकबर की पत्नी है जबकि सलीम की मां। उसका दायित्व दोनों की तरफ बराबर है। उसे अपने पति के प्रति कर्तव्य निभाना पड़ता है और अपने बेटे का प्यार भी उसे कुछ गलत नहीं करने देता। जब सलीम अकबर से बगावत करता है तो वहां सबसे ज्यादा पीड़ा जोधाबाई को ही होती है।
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दुर्गा खोटे
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
किरदार : प्रेम की मां
फिल्म : द हाउसहोल्डर (1963)
दुर्गा खोटे ने अपने लंबे करियर में बहुत प्रकार के किरदारों को जीया और उनके किरदारों की खासियत यह रही कि वह तड़क-भड़क से बिल्कुल दूर रहीं। दुर्गा की कायल तो शोभना समर्थ जैसी वरिष्ठ अभिनेत्री भी रही हैं जो अपनी बातचीत में हमेशा दुर्गा का ही उदाहरण देतीं। दुर्गा को जेम्स आइवरी के निर्देशन में बनी फिल्म 'द हाउसहोल्डर' में भी एक अहम भूमिका निभाने का मौका मिला। उन्होंने फिल्म में शशि कपूर के किरदार प्रेम सागर की मां का किरदार निभाया। प्रेम जब इंदु से ब्याह करता है तो उसे शादीशुदा जिंदगी के बारे में कुछ पता नहीं रहता। जब प्रेम अपनी पत्नी को लेकर अपनी मां के पास आता है तो उसकी मां का उनकी शादीशुदा जिंदगी में दखल इंदु को अच्छा नहीं लगता। जब इंदु घर छोड़कर चली जाती है तो प्रेम अपनी गृहस्थी को अच्छे से चलाने के लिए अपनी मां और अपने गुरु से बहुत सी सलाहें लेता है।
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दुर्गा खोटे
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किरदार : दुर्गा मौसी
फिल्म : अभिमान (1973)
अपने करियर के अंत में भी दुर्गा खोटे ने फिल्मों में कुछ ऐसे किरदारों को अंजाम दिया जो उनकी काबिलियत के गीत भी गाते रहे। जब ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में वर्ष 1973 में आई फिल्म 'अभिमान' में दुर्गा को अमिताभ बच्चन के किरदार सुबीर की मौसी के किरदार में देखा गया तो उनके काम की लोगों ने खूब सराहना की। कहानी में सुबीर एक गायक है और उसकी पत्नी उमा भी धीरे धीरे उससे भी बड़ी गायिका बन जाती है। इससे सुबीर को जलन होती है और उनके रिश्ते में खटास भी आ जाती है। तब दुर्गा मौसी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हैं कि सुबीर को समझा बुझा कर इस रिश्ते को टूटने से बचाएं। देर से ही सही लेकिन वह अपने काम में कामयाब भी होती हैं।
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दुर्गा खोटे
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किरदार : मिसेज ब्रगैंजा
फिल्म : बॉबी (1973)
दुर्गा मौसी जैसा ही एक किरदार दुर्गा ने राज कपूर के निर्माण और निर्देशन में बनी फिल्म 'बॉबी' में भी निभाया जिससे ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया ने मुख्य अभिनेता और अभिनेत्री के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इस फिल्म में दुर्गा ने डिंपल के किरदार बॉबी की मां मिसेज ब्रगैंजा का किरदार निभाया। जब ऋषि कपूर के किरदार राज नाथ की मां राज और बॉबी के प्रेम के खिलाफ होती हैं तो वह मिसेज ब्रगैंजा ही हैं जो दोनों प्रेमियों को सही रास्ता चुनने की सलाह देती हैं। इस किरदार के लिए दुर्गा खोटे की समीक्षकों ने खूब तारीफ की।
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दुर्गा खोटे
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किरदार : पार्वती
फिल्म : बिदाई (1974)
एल वी प्रसाद के निर्देशन में बनी फिल्म 'बिदाई' एक पारिवारिक ड्रामा है जिसमें दुर्गा खोटे ने एक घर की मुखिया पार्वती का किरदार निभाया। पार्वती के पति चल बसे और पीछे छोड़ गए दो बेटे और एक दिव्यांग बेटी। पार्वती तीनों को पाल पोस कर बड़ा करती है और उन्हें लायक बनाती है। दोनों बेटे शादियां कर लेते हैं जबकि बेटी को अपनी मर्जी से शादी नहीं करनी दी जाती इसलिए वह आत्महत्या कर लेती है। एक बेटा शादी करके कहीं दूर रहने लगता है जबकि दूसरा बेटा एक बड़े घराने की लड़की को ब्याहकर अपने घर ले आता है। यहां से पार्वती का जीना दुर्लभ हो जाता है। दुर्गा ने पार्वती के किरदार को शुरू से लेकर अंत तक बहुत बेहतरीन बनावट दी। दुर्गा के कुछ दृश्य तो दर्शकों को रुला देते हैं। इस बेहतरीन अभिनय के लिए दुर्गा को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।
दुर्गा के करियर का अंत अब निकट था। सुभाष घई की वर्ष 1980 में आई फिल्म 'कर्ज' में उन्होंने अपना अंतिम यादगार काम किया। इस फिल्म में दुर्गा ऋषि कपूर के किरदार रवि वर्मा की मां के किरदार में नजर आईं। रवि जब अपनी जालसाज प्रेमिका कामिनी से शादी करने की जिद करता है तो उसकी मां इजाजत दे देती है। लेकिन, जब शादी की बारी आती है तो रवि की मां को सुनने में आता है कि रवि की मौत हो गई। ऐसे में मां रवि की मौत से आहत होती है और भगवान से अपने बेटे को किसी भी रूप में वापस देने की मांग करती है। मां की इस मांग को काली मां सुन लेती हैं और मोंटी ओबेरॉय के रूप में पुनर्जन्म लेकर रवि फिर से लौट आता है।