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Dilip Shukla: ‘दबंग’ के लेखक दिलीप शुक्ला बोले, ‘अभी सब छापने में लगे हैं, अच्छे लेखकों का दौर फिर वापस आएगा’

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दिलीप शुक्ला - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
'घायल', 'दामिनी', 'अंदाज अपना अपना' और 'दबंग' जैसी हिट फिल्मों के लेखक दिलीप शुक्ला फिल्म 'गंगा: द निर्णायक' के जरिए निर्देशन के क्षेत्र में कदम रख रहे हैं। जल्द ही इस फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश में शुरू होगी। दिलीप शुक्ला के लिखे जुमले 'ढाई किलो का हाथ' और 'तारीख  पे तारीख' लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। खास बात ये रही है कि दिलीप शुक्ला की लिखी फिल्मों ने सनी देओल से लेकर सुनील शेट्टी, अक्षय कुमार और सलमान खान जैसे सितारों के करियर में समय रहते नई जान फूंकी। उत्तर प्रदेश के रहने वाले दिलीप शुक्ला से ‘अमर उजाला’ संवाददाता वीरेंद्र मिश्र की एक खास मुलाकात।
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दिलीप शुक्ला - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपको कब लगा कि आपके अंदर एक लेखक है और आप को सिनेमा जगत में जाना चाहिए

रायबरेली जिले में दलीपुर एक गांव है, वहीं की पैदाइश है। आठवीं तक की पढ़ाई गांव के  स्कूल में की। लखनऊ में पिताजी रेलवे में थे तो लखनऊ आ गए। लखनऊ में पढ़ाई के साथ साथ रंगमंच से जुड़ गया। वहां पर मैंने दो तीन नाटक लिखे और निर्देशित किए। इनमें अभिनय भी किया। मैंने पहला नाटक मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'मंत्र' पर किया था। 'मंत्र' का जब मैंने नाट्य रूपांतरण किया तो लेखन में मेरा यह पहला कदम था। अखबार में फोटो छप गई, अब 17 साल की उम्र में अखबार में फोटो छप जाए तो वह मुंबई की ही तरफ ही भागेगा। 1982 में मैं मुंबई आ गया। सात साल तक इधर उधर कुछ कुछ करता रहा। और, फिर मिली फिल्म 'घायल'।

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घायल - फोटो : सोशल मीडिया
'घायल' के लिए मौका कैसे मिला?
उन दिनों मैंने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के लिए एक लघु फिल्म लिखी थी और राजकुमार संतोषी उसे देखने आए थे। उनको फिल्म अच्छी लगी। तभी उन्होंने बताया था कि मैं फिल्म निर्देशक बनने के लिए एक फिल्म बनाने की योजना पर काम कर रहा हूं। अगर बात बनी तो संवाद तुमसे ही लिखवाऊंगा। सात-आठ महीने बाद मुझे उन्होंने बुलाया और 'घायल' के बारे में बताया। सनी देओल को फिल्म से बहुत फायदा हुआ। ऐसा लगा कि फिल्म लिखी ही उनके लिए गई थी।

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दामिनी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, आपके लिए भी ये सगुन अच्छा रहा। फिर 'दामिनी' की शुरुआत कैसे हुई?

'घायल' के बाद हमारी टीम बन गई। राज जी को मेरी लेखनी पर भरोसा हो गया। 'घायल' के बाद विचार विमर्श चल रहा था कि अब किस तरह की फिल्म बनानी चाहिए। उस समय एडिटर सुतानु गुप्ता ने 'दामिनी' का आइडिया सुनाया। कहानी सबको पसंद आई। इस फिल्म के मैंने संवाद ही लिखे थे। और आपको यकीन नहीं होगा कि फिल्म का सबसे चर्चित संवाद 'ये ढाई किलो का हाथ' मैंने सेट पर ही लिख दिया था। राज जी ने कहा कि सनी के दमदार हाथ पर कुछ लिखो तो मैंने सेट पर ही 'ये ढाई किलो का हाथ' लिखा और यह डायलॉग हिट हो गया। 'तारीख पे तारीख' तो कोर्ट का सीन था इसलिए वह पहले से ही लिखा हुआ था।

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अंदाज अपना अपना - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
'घायल' और 'दामिनी' के बाद आप लोगों ने 'अंदाज अपना अपना' बनाई, एक्शन से कॉमेडी की तरफ कैसे जाना हुआ?
हम लोगों ने पहले की दोनों फिल्मों से अलग एक ऐसी दुनिया रचते का फैसला लिया जिसमे लोगों को मजा आए। राज जी ने जब 'अंदाज अपना अपना' का आइडिया बताया तो सब लोगों को अच्छा लगा। कॉमेडी फिल्म थी तो शूटिंग के दौरान भी माहौल बहुत अच्छा था। फिल्म ऐसी थी कि कोई लेखक वैसी फिल्म लिख नहीं सकता था। फिल्म की कास्टिंग बहुत अच्छी थी। इस फिल्म में छोटे मोटे जो भी किरदार थे सबको देखकर लोगों ने आनंद उठाया। फिल्म में शक्ति कपूर का किरदार उनके करियर का बेहतरीन किरदार रहा। 'अंदाज अपना अपना' एक ऐसी फिल्म थी, जिसमें आप बंधकर काम नहीं कर सकते थे। राज जी वैसे भी शूटिंग के बीच में ही चीजें बदलते रहते थे। इस बार ये एक ऐसा प्रयोग था जो एक मिसाल बन गया।
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दिलीप शुक्ला - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अभी हाल में राजकुमार संतोषी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि 'अंदाज अपना अपना' का सीक्वल मैं खुद नहीं बनाना चाहता, एक बार जो चीज बन चुकी है, उसमें दोबारा हाथ नहीं लगाना चाहिए। आपका क्या कहना है, इस बारे में?

'अंदाज अपना अपना' का सीक्वल अगर कोई बना सकता है तो वह राजकुमार संतोषी ही बना सकते हैं। किसी दूसरे डायरेक्टर के बस की बात नहीं। और, राज जी जिस दिन मन बना लेंगे, वह बना भी सकते हैं। उनको मैं बहुत करीब से जानता हूं, उनके अंदर ज्ञान का विशाल सागर है। वह इतनी जल्दी खर्च होने वाला नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि इस फिल्म का सीक्वल बनने की संभावनाएं अब भी बाकी हैं।

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मोहरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इन सब फिल्मों के बीच आपकी फिल्म 'मोहरा' का जिक्र इसलिए करना चाहूंगा कि यह फिल्म आपके मिजाज से बिलकुल ही अलग फिल्म थी?

सुनील शेट्टी की 'अंत' के बाद मैंने उनकी फिल्म 'मोहरा' की थी। राजीव राय फिल्म के निर्देशक थे। मेरी फिल्म 'दामिनी' रिलीज हो गई थी। वह मेरे काम से काफी प्रभावित भी थे। राजीव ने मुझ पर भरोसा जताते हुए मुझे ‘मोहरा’ लिखने का आमंत्रण दिया। 'मोहरा' में मैंने अलग तरह के संवाद लिखे जो फिल्म के किरदारों के मूड के हिसाब से थे। उन दिनों रवीना टंडन की कोई फिल्म नहीं चल रही थी फिर भी राजीव जी ने उन्हें साइन किया । उनका मानना था कि कोई भी काम किसी के भी जीवन का एक टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है। फिल्म रिलीज हुई। 'तू चीज बड़ी है मस्त मस्त' गाना सुपरहिट हुआ और रवीना टंडन सुपरस्टार बन गईं।

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मोहरा - फोटो : सोशल मीडिया

करियर तो उन दिनों सुनील शेट्टी और अक्षय कुमार का भी डांवाडोल ही चल रहा था, 'मोहरा' उनके करियर के लिए भी टर्निंग प्वाइंट साबित हुई..

बिलकुल सही कह रहे हैं आप। उनके भी करियर की यह कामयाब फिल्म रही। आप कह सकते हैं कि कई कलाकारों का करियर मेरी फिल्मों से रिचार्ज हुआ है। अगर सलमान खान की चर्चा होगी तो मेरी फिल्म 'दबंग' की भी चर्चा होगी। जब सनी देओल की चर्चा होगी तो 'दामिनी' की बात भी करनी ही पड़ेगी।

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दबंग - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
'दबंग' से पहले भी आप पुलिस की पृष्ठभूमि पर कई फिल्में लिख चुके थे, जब 'दबंग' का ऑफर आया तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
मेरे मन में आया कि पुलिस पर कुछ अलग लिखना चाहिए। आम तौर होता यही है फिल्मों में कि एक ईमानदार पुलिसवाला है और उसको ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन 'दबंग' में ऐसा पुलिस वाला लाया जो दबंग भी है ,मजेदार भी है और अपने ही ढंग से काम करता है। इस तरह के पुलिस वाले को फिल्मों में किसी ने देखा नहीं था। आमतौर हिंदी फिल्मों में पुलिसवाला इस तरह की हरकतें करता नहीं है। सलमान खान पर यह किरदार पूरी तरह फिट था। ये किरदार एक्शन भी करता है, डांस भी करता है और पंच लाइन भी मरता है। वह ज्यादा सोचने वाली नहीं मजा देने वाली फिल्म थी। अभिनव कश्यप ने मेरी पटकथा सलमान तक पहुंचाई थी। सीरीज की दूसरी फिल्म का ऑफर मेरे पास अरबाज खान लेकर आए।

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दबंग 3 - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

लेकिन 'दबंग 3' में ऐसा क्या हो गया कि इसमें सलमान खान भी लेखक बनकर आ गए?

यह भ्रांतियां खामखां लोगों के मन में है। सच्चाई यह है कि कहानी सलमान खान की थी, पटकथा में भी उनका काफी हद तक सहयोग रहा। फिल्म के निर्देशक प्रभु देवा का भी पटकथा में काफी सहयोग रहा। 'दबंग 3' कई लोगों ने मिलकर लिखी है। मै यह कह सकता हूं कि 75 प्रतिशत बाकी लोगों का काम है और मैं सिर्फ 25 फीसदी हूं। 'दबंग 3' के लेखन में जिस जिसने भी काम किया, उन सबका नाम ही क्रेडिट में है।

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दिलीप शुक्ला - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अब फिल्मों में वैसे संवाद क्यों नहीं सुनाई देते जो लोगों के दिलो तक पहुंचे?

आजकल सारी चीजें डिजिटल हो गई हैं। सबके पास बताने को दिखाने को कुछ न कुछ है। तो हर जगह से कुछ कुछ लेकर कुछ कुछ बन जा रहा है। आजकल सिर्फ यही हो रहा है, ओरिजिनल राइटिंग नहीं हो रही है। बनाने वालों को भी जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है। बाजार में जिस तरह की हवा चल रही है, उसी के हिसाब से सब चल रहे हैं। आज लेखनी में मौलिकता नहीं है। लेखन एक जिम्मेदारी का विषय है। यह बात खत्म हो चुकी है। अब तो यही चल रहा है कि कुछ भी लिखो, छापो, परोसो और बेचो। लेकिन मेरा मानना है कि अच्छे लेखकों का दौर फिर वापस आएगा। अच्छी चीजों की खुशबू कभी खत्म नहीं होती है।

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दिलीप शुक्ला - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, इसी जिम्मेदारी को निभाने के लिए आप निर्देशक बन रहे हैं?
हां, मेरी बतौर निर्देशक पहली फिल्म का नाम है 'गंगा: द निर्णायक'। इसके निर्माता साउथ के सी एच मोहम्मद हैं जो मलयालम सुपरस्टार ममूटी को लेकर फिल्में बना चुके हैं। फरवरी से इस फिल्म की कास्टिंग शुरू होगी। इसके अलावा एक टीवी शो 'वाह वाह रामजी- राम आ रहे हैं आपके घर' की भी प्लानिंग कर रहा हूं।  इसमें राम जी की कथाओं के साथ साथ मनोरंजन की बहुत सारी बातें होगी।
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