Dilip Arya
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिर, दिलीप आर्या कैसे मजदूरी से आगे बढ़ पाए? इस सवाल पर वह भावुक हो जाते हैं। बताते हैं, “सबसे पहले हमारे बड़े भाई ने ये बीड़ा उठाया कि छोटे भाइयों को मजदूरी के मकड़जाल से बाहर निकाला जाए। लेकिन, शुरूआत हुई जब मैंने भैया से ज्यादा मजदूरी कमाने की ठानी। तब मुझे रोज के सात रुपये मिलते थे और भैया को 11 तो पहले मैंने टेलरिंग सीखी और उनसे ज्यादा कमाने लगा। फिर मुझे लगा कि पढ़ाई करने से पैसा भी आएगा औऱ इज्जत भी, तो काम के साथ पढ़ाई भी करने लगा।”