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गुदड़ी का लाल: सात रुपये की दिहाड़ी करने वाला दिलीप ऐसे बना हीरो, ‘अमर उजाला’ को सुनाई राम कहानी

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Dilip Arya - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
उत्तर प्रदेश का जिला फतेहपुर आमतौर पर सुर्खियों में कम ही रहता है, यहां के शांत लोग अपने काम से काम रखते हैं और मुख्यता खेती किसानी में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। लेकिन, फतेहपुर के खेतों में मजदूरी करने वाले एक किशोर के सपने बड़े थे। उसने अपने गांव के सरसों के जैसे खेत ही बड़े परदे पर देखे और इन सरसों के पीले फूलों के बीच एक दिन शाहरुख खान की तरह हाथ फैलाकर खड़े होने का अरमान उसे मुंबई ले आया। ये मजदूर अब हिंदी मनोरंजन जगत का चर्चित सितारा बन चुका है। पूरा कोरोना काल उन्होंने गुमनामी में बिता दिया, जबकि मोबाइल और स्मार्ट टीवी पर उनकी पहली वेब सीरीज देख लोग तालियां बजा रहे थे।
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Dilip Arya - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फर्श से अर्श तक जैसी कहानी का ये नायक है दिलीप। दिलीप कुमार वैसे उनका प्रचलित नाम रहा है लेकिन हिंदी सिनेमा के महान सितारे दिलीप कुमार को अपना गुरु मान उनके एकलव्य ने मुंबई आने के बाद अपना नाम बदलकर दिलीप आर्या कर लिया। पिता राज मिस्त्री का काम करते थे। वो गुजर गए तो मां ने खेतों में मजदूरी करके तीन बेटों और तीन बेटियों को पाला। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में दिलीप अपनी राम कहानी खुलकर बताते हैं। वह कहते हैं, “मुझे इस बात पर गर्व है कि हमारे परिवार के हर सदस्य ने मजदूरी की। लेकिन, अपने आत्मसम्मान पर कभी चोट नहीं आने दी।”

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Dilip Arya - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिर, दिलीप आर्या कैसे मजदूरी से आगे बढ़ पाए? इस सवाल पर वह भावुक हो जाते हैं। बताते हैं, “सबसे पहले हमारे बड़े भाई ने ये बीड़ा उठाया कि छोटे भाइयों को मजदूरी के मकड़जाल से बाहर निकाला जाए। लेकिन, शुरूआत हुई जब मैंने भैया से ज्यादा मजदूरी कमाने की ठानी। तब मुझे रोज के सात रुपये मिलते थे और भैया को 11 तो पहले मैंने टेलरिंग सीखी और उनसे ज्यादा कमाने लगा। फिर मुझे लगा कि पढ़ाई करने से पैसा भी आएगा औऱ इज्जत भी, तो काम के साथ पढ़ाई भी करने लगा।”

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Dilip Arya - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

दिलीप आर्या की लगन आपको चौंका सकती है। उन्होंने मजदूरी करने करते करते ही 12वीं तक की पढ़ाई कर डाली और फिर घरवालों के हौसला बढ़ाने पर ग्रैजुएशन कर डाला। आज की तारीख में वह जब फ़ख्र से बताते हैं कि मैं अंग्रेजी साहित्य से एमएम हूं तो उनके चेहरे का तेज देखने लायक होता है। छोटे भाई ने इतना सब कर डाला और इसी बीच उसे दिल्ली में थिएटर का चस्का लग गया। बड़े भाई का सीना तो वैसे ही चौड़ा हो चुका था, उसने छोटे से कहा, “तू अपने सपनों को पूरा कर, घर मैं संभालता हूं।” 

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Dilip Arya - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनय की यात्रा के बारे में पूछने पर दिलीप बताते हैं, “मैंने पढ़ रखा था कि एनएसडी में पढ़ाई करने वाले तमाम अभिनेता सिनेमा में बड़े स्टार बने। मैंने वहां भी एडमीशन की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ तो लखनऊ पहुंच गया भारतेंदु नाट्य अकादमी में किस्मत आजमाने। वहां दो साल खूब अच्छे से बीते फिर वहां से मैं पुणे पहुंच गया। वहां भी सब ठीक ही रहा। और इसके बाद 16 साल पहले मैंने मुंबई की धरती पर कदम रखा।“
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Dilip Arya - फोटो : Instagram: @dilip.arya001
दिलीप को ये बताने में कोई संकोच नहीं होता कि मुंबई में भी उन्होंने खूब पापड़ बेले हैं। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, "लेकिन, फतेहपुर का पानी यहां भी काम आया। मजदूरी करने की आदत थी ही सो खर्चा किसी न किसी तरह से निकाल ही लेता था। इस बीच समझ में मुझे ये भी आया कि बड़ी बड़ी कंपनियां जो उत्पाद बनाती हैं, उनके बारे में लोगों को बताना भी एक पेशा है। बस फिर तो मैंने महिंद्रा, जेके और तमाम दूसरी कंपनियों की गाड़ियों के साथ घूमना शुरू कर दिया। यहां से लाइव शो मिलने लगे। तमाम चैनलों में काम मिलना शुरू हो गया। और फिर एक दिन उन पर नजर पड़ी निर्देशक रितम श्रीवास्तव की। और मौका मिला  कुख्यात डकैत ददुआ के जीवन पर बनी वेब सीरीज ‘बीहड़ का बागी’ में लीड रोल करने का।“
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Dilip Arya - फोटो : Instagram: @dilip.arya001
वेब सीरीज ‘बीहड़ का बागी’ कोरोना संक्रमण काल में रिलीज हुई तो इसके चलते इसका ज्यादा शोर नहीं मच पाया। दिलीप आर्या तक भी लोग अब तक कम ही पहुंचे हैं। वह कहते हैं, “अभी तो बस मुंबई में पैर रखकर सीधे खड़े हो पाने की अपनी जगह बना पाया हूं। मुझे पता है कि मेरे पास पीआर कंपनियों को देने के पैसे नहीं हैं। कुछ लोग अपने मन से आकर मुझे मदद करना चाह रहे हैं। एक दिन किसी ने फोन किया कि सर, आज से मैं आपका मैनेजर हूं। मैंने कहा, भाई बन जाओ। लोग मुझमें कुछ तो आगे का देख ही रहे होंगे जो अपना समय और श्रम मेरे ऊपर निवेश कर रहे हैं। अब जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इस भरोसे पर खरा उतरूं और उसके लिए मेहनत से मैं कभी पीछे नहीं हटूंगा।”
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