टीम इंडिया ने कानपुर में न्यूजीलैंड को ऐतिहासिक 500 वें टेस्ट में चित कर दिया है। संयोग ही है कि इसी हफ्ते टीम इंडिया के सबसे बड़े ब्रांड रहे कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जिंदगी पर बनी फिल्म भी रिलीज हो रही है। फिल्म में धोनी का रोल सुशांत सिंह राजपूत र रहे हैं। उनके पेट में भी बटरफ्लाइज़ दौड़ रही हैं, और दौड़ें भी क्यूं न आखिर बॉलीवुड में क्रिकेट पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन जो इतना खराब रहा है। लगान, इक़बाल और जन्नत जैसी फिल्मों को छोड़ दें तो मैदान और टीवी पर क्रिकेट देखने वाले दर्शक सिनेमाघरों में क्रिकेट देखने कम ही गए हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि क्रिकेट के सब्जेक्ट पर फिल्म बनाना कोई नई बात नहीं, ये फिल्में 1959 से बनती आ रही हैं। बड़े बड़े सितारों ने क्रिकेट पर फिल्में बनाने की कोशिश की और ज्यादातर बार हिट विकेट हुए।
आगे की स्लाइड्स में हम आपको बताएंगे कुछ ऐसी ही फिल्मों के बारे में जिनमें क्रिकेट कहानी का अहम हिस्सा थीं।
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एम एस धोनी – द अनटोल्ड स्टोरी (2016)
अपने हेलीकॉप्टर शॉट्स से चर्चा में आए महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट के वो धूमकेतु हैं जिसने आते ही अपनी रोशनी से बड़े बड़े दिग्गजों को चौंधिया दिया। उनके कैप्टन बनते ही तमाम सीनियर खिलाड़ियों की एक के बाद एक टीम से छुट्टी होती गई। कभी अपने दोस्त की ब्रांड मैनेजमेंट कंपनी तो कभी अपने साथी खिलाड़ियों से अनबन के चलते धोनी को लेकर ग्रीन रूम से अक्सर ऐसी खबरें आती रहीं, जिन पर बीसीसीआई ने कभी तवज्जो नहीं दी। उनकी कप्तानी वाली आईपीएल की टीम के मैच फिक्सिंग में फंसने के बाद से धोनी का करियर ढलान पर है। और, ये फिल्म उनके ब्रांड का आखिरी आंकलन हो सकती है।
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अजहर (2016)
इमरान हाशमी ने इस फिल्म में क्रिकेटर अजहरुद्दीन की भूमिका निभाई थी। फिल्म को एकता कपूर ने प्रोड्यूस किया था। फिल्म के प्रमोशन से खुद अजहर जुड़े रहे। इसके बावजूद फिल्म दर्शकों के प्यार से महरूम रह गई। आलम तो यह हुआ कि खुद इमरान हाशमी अब यह कह रहे हैं कि अजहरुद्दीन को अदालत से भले माफी मिल गई, मगर लोगों के जहन में अब तक अजहर की छवि निगेटिव ही है। ऐसे में फिल्म में अजहर को बेकसूर दिखाना फिल्म के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ।
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फरारी की सवारी (2012)
विधु विनोद चोपड़ा के असिस्टेंट रहे राजेश मापुसकर ने यह फिल्म बनाई थी। यह क्रिकेट की पृष्ठभूमि में बाप, बेटे और पोते के रिश्तों पर थी। एक बाप अपने बेटे को क्रिकेट टीम में सेलेक्ट करवाने को कैसे सचिन तेंदुलकर की फरारी कार चुराता है, यह फिल्म उस बारे में थी। शरमन जोशी, बमन ईरानी और रित्विक साहोरे फिल्म में मुख्य भूमिका में थे। कहानी समीक्षकों को बहुत पसंद आई थी, पर यह बॉक्स ऑफिस पर जलवे बिखेरने में नाकाम रही।
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विक्ट्री (2009)
ऋतिक रोशन की कार्बन कॉपी कहे जाने वाले हरमन बावेजा ने भी अपनी किस्मत बदलने की खातिर क्रिकेट का सहारा लिया। उनके लिए अजित पाल मंगत ने यह फिल्म बनाई। इसमें असल क्रिकेटरों की फौज खड़ी कर दी गई। मिसाल के तौर पर एलन बॉर्डर, टोनी ग्रेग, मोहिंदर अमरनाथ, वकार युनूस, मुरलीधरन और सनथ जयसुर्या। हरमन उसमें विजय शेखावत की भूमिका में थे, जो अपनी अकड़ की वजह से टीम से हाथ धो बैठता है। उसके बाद वह कैसे वापसी करता है, यह फिल्म उस बारे में थी। फिल्म हरमन की सोई किस्मत जगा नहीं पाई।
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जन्नत (2008)
मैच फिक्सिंग और बेटिंग यानी सट्टेबाजी को केंद्र में रखकर कुणाल देशमुख ने यह फिल्म बनाई। इमरान हाशमी इसमें सट्टेबाज अर्जुन के रोल में थे। अर्जुन शॉर्ट कट से जिंदगी की हर खुशी खरीदना चाहता है। उसकी यह सोच उस पर कितनी भारी पड़ती है, फिल्म उस बारे में थी। फिल्म में पाकिस्तान के कोच बॉब वूल्मर की हत्या का भी प्लॉट इस्तेमाल किया गया। कर्णप्रिय गानों और चुस्त पटकथा की वजह से यह इमरान हाशमी के करियर की सफल फिल्मों में शुमार हुई। ध्यान देने की बात ये है कि फिल्म क्रिकेट के निगेटिव पहलू को उजागर करती है और दर्शकों का ध्यान खींच लेती है।
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मीराबाई नॉट आउट (2008)
चंद्रकांत कुलकर्णी ने मंदिरा बेदी, महेश मांजरेकर, अनुपम खेर और ऐजाज खान को लेकर यह फिल्म बनाई। मीरा अचरेकर के रोल में मंदिरा बेदी थीं। मीरा क्रिकेटर अनिल कुंबले की बहुत बड़ी फैन है। इतनी बड़ी की कुंबले का मैच देखने के चक्कर में वह अपनी ही शादी में देर से पहुंचती है। उसके पिता को यह नागवार गुजरता है। बाद में मीरा की शादी अनिल कुंबले खुद कैसे बचाते हैं, इसकी कहानी उसी बारे में है। फिल्म का प्लॉट अतरंगी था, मगर वह टिकट खिड़की का कप नहीं जीत पाई।
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चैन कुली की मैन कुली (2007)
इसका भी हाल बुरा रहा। यह तो बॉक्स ऑफिस पर जीरो रन बनाकर आउट हो गई। इसे किट्टु सालुगा ने बनाया था। कहानी 13 साल के करण की है। उसे कहीं से कपिल देव का बैट मिल जाता है। वही बैट जिससे कपिल देव ने 83 के वर्ल्ड कप में 175 रन बनाए थे। वह बैट करण के लिए लकी साबित होता है। वह ताबड़तोड़ रन बनाने लगता है। उसका सेलेक्शन टीम इंडिया में हो जाता है। अचानक एक दिन बल्ला गायब और करण का आत्मविश्वास रसातल में चला जाता है। फिर क्या होता है, फिल्म उस बारे में है। कपिल देव का फिल्म में कैमियो था। करण का रोल जाएन खान ने किया था, जबकि राहुल बोस बने थे करण के कोच।
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हैट्रिक (2007)
मौजूदा दौर के सफल फिल्मकार मिलन लूथरिया ने डैनी, परेश रावल और कुणाल कपूर को लेकर यह फिल्म बनाई। तीनों के किरदारों का क्रिकेट से नाता है,मगर उन्हें लगता है कि क्रिकेट वक्त की बर्बादी है। आखिर में क्रिकेट उन तीनों की समस्याएं कैसे हल करता है, यह फिल्म उस बारे में थी। फिल्म में एक गाना था विकेट बचा। वह जरूर पॉपुलर हुआ। वह क्रिकेट कमेंटेटर हर्ष भोगले पर फिल्माया गया था, पर दर्शकों ने हैट्रिक को बॉक्स ऑफिस पर टिकने नहीं दिया।
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से सलाम इंडिया (2007)
यह भी साल 2007 में ही आई थी। इसे फंस गए रे ओबामा और जॉली एलएलबी जैसी फिल्मों के डायरेक्टर सुभाष कपूर ने बनाया था। संजय सूरी फिल्म में हरि साडू के रोल में थे। हरि साडू एक स्कूल में क्रिकेट कोच है। अपने सुस्त रवैये के चलते वह वहां से हटा दिया जाता है। उसके बाद वह कैसे वापसी करता है, यह फिल्म उस बारे में थी। फिल्म को दर्शकों का ठंडा रेस्पॉन्स ही मिला।
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इकबाल (2005)
हिंदी में क्रिकेट पर बनी तमाम फिल्मों में से ये एक फिल्म इसलिए अलहदा क्योंकि ये बहुत कम बजट में बनी और दर्शकों और समीक्षक बिरादरी का ढेर सारा प्यार बटोरने में सफल रही। नागेश कुकूनूर की इस फिल्म में गूंगे-बहरे इकबाल बने श्रेयस तलपड़े ने यादगार परफॉरमेंस दी। इकबाल अपने पिता की मर्जी के खिलाफ क्रिकेट खेलता है। वह अच्छा खिलाड़ी है, मगर रणजी टीम में उसका चयन नहीं हो पाता। तब उसकी मदद को पूर्व क्रिकेटर मोहित आता है। मोहित के रोल में नसीरुद्दीन शाह थे।
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स्टंप्ड (2003)
गौरव पांडे ने यह फिल्म बनाई थी। अली खान और रवीना टंडन फिल्म के मेन लीड थे। अली खान मेजर राघव सेठ के रोल में थे। राघव कारगिल की जंग में गुम हो जाता है, पर उसके घर व मोहल्ले वाले उस वक्त 1999 का वर्ल्ड कप देख रहे होते हैं। राघव की बीवी बनी रीना का साथ देने वाला कोई नहीं होता। फिल्म में कपिल देव, सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह का कैमियो रोल था। इसकी कहानी अच्छी थी, पर यह दर्शकों को अचंभित और एंगेज नहीं कर पाई।
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लगान (2001)
इस फिल्म ने कामयाबी का इतिहास रचा था। हालांकि इसके लिए निर्माता ढूंढने में आशुतोष गोवारिकर को काफी मशक्कत करनी पड़ी। बाद में आमिर खान खुद बतौर प्रोड्यूसर आगे आए। एक अनकन्वेंशनल फिल्म पर दांव लगाया। वह दांव सही लगा। नायक भुवन किस तरह खेल के जरिए ब्रितानी हुकूमत से लगान माफ करवाता है, यह फिल्म उस पर थी। फिल्म में अमिताभ बच्चन की आवाज़ का इस्तेमाल सूत्रधान के तौर पर किया गया था।
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अव्वल नंबर (1990)
आमिर खान ने लगान से पहले भी क्रिकेट को केंद्र में रखकर बनी फिल्म में काम किया था। वह यह फिल्म थी। आमिर खान फिल्म के हीरो विकी थे,जबकि आदित्य पंचोली विलेन रॉनी के रोल में थे। यह फिल्म खेल और बदले की भावना को समर्पित थी। रॉनी विकी से बदला लेने की आग में इतना जल चुका होता है कि वह वानखेड़े स्टेडियम में बैठे 50,000 दर्शकों को बम धमाके में उड़ाने की साजिश रच लेता है। बतौर डायरेक्टर देव आनंद की ये सबसे कमज़ोर फिल्म थी।
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ऑल राउंडर (1984)
हिंदी सिने इतिहास में क्रिकेट पर बनी यह दूसरी फिल्म थी। मोहन कुमार इसके डायरेक्टर थे। यह फिल्म 1984 में आई थी। तब, जब भारत ने उससे एक साल पहले वर्ल्ड कप जीता था। विनोद मेहरा और कुमार गौरव फिल्म के हीरो थे। विनोद बिरजू के रोल में थे। कुमार गौरव बने अजय। दोनों भाई थे। बिरजू किन मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद अजय को क्रिकेटर बनाता है, यह उस फिल्म की मूल कहानी थी। इसे भी दर्शकों ने प्यार नहीं दिया। कुमार गौरव की हिट फिल्म लव स्टोरी की कामयाबी को भुनाने की ये कोशिश नाकाम रही।
लव मैरेज (1959)
सुबोध मुखर्जी इस फिल्म के डायरेक्टर थे। यह हिंदी की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसके केंद्र में क्रिकेट था। इसमें उस वक्त के सुपरस्टार देव आनंद ने क्रिकेटर सुनील कुमार की भूमिका निभाई थी। माला सिन्हा एक जमींदार की बेटी गीता के किरदार में थीं। गीता सुनील की बॉलिंग की दीवानी हो जाती है। वह सुनील को दिल दे बैठती है, पर क्यों दोनों का प्यार परवान चढ़ नहीं पाता है, यह फिल्म उस बारे में थी।