छावा के एक सीन में विक्की कौशल
- फोटो : Youtube @Maddock films
आखिर कहां कमजोर हो गई फिल्म?
फिल्म इतनी तेजी से भागती है कि आपको स्वराज्य के मतवालों की जीत का जश्न मनाने का भी मौका नहीं मिलता। एक सीन इमोशनल, फिर एक सीन एक्शन और फिर उसी बीच में फ्लैशबैक जो आपको कहीं कन्फ्यूज कर देता है तो कहीं-कहीं आपका फ्लाे भी बिगाड़ देता है। वहीं कुछ दृश्य तो साेच से परे हैं।
जैसे एक सीन में विक्की कौशल शेर से भिड़ते हैं। सीन का वीएफएक्स तो जबरदस्त है पर एक पल में विक्की को तहखाने में शेर का जबड़ा पकड़े दिखाते हैं और अगले ही पल वो बाहर आकर दुश्मन की गर्दन पकड़ लेते हैं।
फिल्म के एक सीन में तो जब अकबर बने नील भूपलम, विक्की से मदद मांगने आते हैं तो विक्की उनकी गर्दन कुछ यूं पकड़ते हैं जैसे उन्हीं की सेना का कोई गुप्तचर हो। महाराज की शहजादे से मुलाकात वाले इस दृश्य का चित्रण अटपटा सा लगा।
फिल्म के कुछ सीन वीभत्स हैं जो कमजोर दिल वाले नहीं देख पाएंगे। क्लाइमैक्स देखकर दुख यह होता है कि सबकुछ अच्छा बनाया गया, बस मेकर्स उसे अच्छे से पेश नहीं कर पाए। न जाने ऐसी क्या हड़बड़ी थी कि न किरदारों को बिल्ट अप हाेने दिया और न ही इमोशंस को। रही सही कसर बैकग्राउंड म्यूजिक ने पूरी कर दी। आधी फिल्म में सीन कुछ और है.. और म्यूजिक कुछ और ही।