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63 साल की हुईं किरण खेर, उनकी जिंदगी से जुड़े 10 अनकहे राज...पढ़िए

Sun, 17 Jun 2018 09:54 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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Kirron Kher
बॉलीवुड एक्ट्रेस और बीजेपी सांसद किरण खेर की निजी जिंदगी के बारे में सब कुछ और 10 खास बातें। बॉलीवुड की दिग्गज अदाकारा किरण खेर ने अपने करियर की शुरुआत चंडीगढ़ में थिएटर से की। यहां पर अपनी कला और टैलेंट को निखारने के बाद वह मुंबई आ गईं।
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किरण खेर
बैडमिंटन खिलाड़ी रही हैं
किरण एक हुनरमंद अभिनेत्री होने के साथ एक कामयाब बैडमिंटन खिलाड़ी भी रही हैं। किरण ने दीपिका पादुकोण के पिता प्रकाश पादुकोण के साथ नेशनल लेवल बैडमिंटन खेला है।
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चंडीगढ़ की सांसद किरण खेर
चंडीगढ़ से बीजेपी की सांसद हैं
आजकल किरण खेर चंडीगढ़ से बीजेपी की सांसद हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में किरण खेर चंडीगड़ से लोकसभा सांसद चुनीं गईं। किरण खेर का जन्म 14 जून 1955 को पंजाब के चंडीगड़ में एक सिख परिवार में हुआ था।

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Kirron Kher
इकलौते भाई की एक्सीडेंट में मौत
किरण ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई चंडीगढ़ से की है। उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से डिपार्टमेंट ऑफ इंडियन थिएटर में स्नातक किया है। इनके पति बॉलीवुड के जाने-माने कलाकार अनुपम खेर है। इनकी दो बहनें और एक भाई भी है। भाई अमरदीप की 2003 में एक एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई थी। बहन कंवल ठक्कर कौर हैं, जो अर्जुन अवार्ड विनर बैडमिंटन खिलाड़ी हैं। दूसरी बहन का नाम शरणजीत कौर संधु है।
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सांसद खेर भड़कीं - फोटो : अमर उजाला
अनुपम खेर के साथ दूसरी शादी की
अनुपम खेर के साथ किरण खेर की दूसरी शादी है। पहली शादी गौतम बेरी से हुई थी, जो एक बिजनेस मैन हैं। यह शादी कुछ ही साल चली और तलाक हो गया। उसके बाद किरण ने अनुपम खेर से शादी कर ली। किरण खेर के एक बेटा है, सिकंदर खेर। किरण खेर ने अपने करियर कि शुरुआत साल 1973 में पंजाबी फिल्म ‘असर प्यार दा’ से की थी।
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सांसद किरण खेर
भंसाली की फिल्म ‘देवदास’ से अमिट छाप छोड़ी
किरण खेर ने 1996 में अमरीश पुरी के साथ श्याम बेनेगल की ‘सरदारी बेगम’ में काम किया, जो काफी चर्चित भी रही। इस फिल्म के लिए उन्हें स्पेशल जूरी अवार्ड से सम्मनित किया गया। उसके बाद उन्होंने ऋतुपर्णा घोष की बंगाली फिल्म बैरीवाली की, जिसके लिए उन्हें नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया। किरण ने अपनी एक्टिंग की असली छाप 2002 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘देवदास’ से छोड़ी।
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किरण खेर, सांसद - फोटो : amar ujala
बुरे फिल्मी सफर में छोटे पर्दे का सहारा लिया
किरण खेर ने मंगल पांडे, रंग दे बसंती, वीर-जारा, देवदास, कर्ज, हम, मै हूं ना, दोस्ताना, सरदारी बेगम, कभी अलविदा ना कहना, मिलेंगे-मिलेंगे, कमबख्त इश्क, कुर्बान, फना, एहसास, अजब गजब लव, खूबसूरत, टोटल सियापा जैसी कई फिल्में की। जब किरण का फिल्मी सफर बुरे दौर से गुजर रहा रहा था, तब उन्होंने छोटे पर्दे का सहारा लिया। उन्होंने कई टेलीविजन शो में काम किया।

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किरण खेर, सांसद - फोटो : file photo
कई साल सामाजिक कार्यों से जुड़ी रही
किरण खेर कई सालों से सामाजिक कार्यों से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने भ्रूण हत्या के खिलाफ चलाए गए अभियान ‘लाडली’ में अहम भूमिका निभाई थी। इसके साथ वे कैंसर के खिलाफ चलाए गए अभियान ‘रोको कैंसर’ से भी जुड़ी रहीं। साल 2009 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं। उन्होंने 2011 में चंडीगढ़ में हुए नगर निगम चुनाव में उन्होंने पार्टी के लिए अहम रोल निभाया।

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Kirron Kher - फोटो : अमर उजाला
अन्ना हजारे के आंदोलन का हिस्सा रहीं
2011 में भी उन्होंने अन्ना हजारे द्वारा चलाए गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भी हिस्सा लिया। किरण ने चंडीगढ़ में इस आंदोलन का समर्थन किया। जब अन्ना के आंदोलन के बाद टीम के कुछ सदस्यों ने आम आदमी पार्टी (AAP) बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने इस बात का विरोध किया था। साल 2014 में किरण ने भाजपा के नेतृत्व में चंडीगढ़ से सांसद का चुनाव लड़ा था, जिसमे वह विजयी साबित हुई थीं।

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बीजेपी की सांसद किरण खेर
अवॉर्ड्स और सम्मान
1997: नेशनल फिल्म अवॉर्ड (सरदारी बेगम) 2000: नेशनल फिल्म अवॉर्ड बेस्ट एक्ट्रेस (बारीवाली) 2003: IIFA बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड (देवदास) 2003: लोकार्नो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ब्रॉन्ज लेपर्ड अवॉर्ड (साइलेंट वाटर) 2003: कराची इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट एक्टर फॉर लीडिंग रोल (साइलेंट वाटर) 2006: स्टार स्क्रीन अवॉर्ड बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस (रंग दे बसंती) 2010: अप्सरा अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्ट्रेस सपोर्टिंग रोल (कुर्बान) 2011: कलर्स गोल्डन पेटल अवॉर्ड फॉर मोस्ट मनोरंजक पर्सनैलिटी
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सांसद किरण खेर
1984 के दंगों का दौर सबसे अहम
किरण खेर 1984 के दंगों को अपनी जिंदगी के अहम मोड़ों में गिनती हैं। किरण खेर ने खुद बताया कि वह या तो अपनी बहन की तरह बैडमिंटन स्टार बनने के बारे में सोचती थीं या फिर बलवंत गार्गी जी के ग्रुप के साथ अभिनय के अहसासों में डूबी रहती थीं। उन्हीं दिनों 84 के दंगों के मंजर उभरे और वे सोचने लगीं कि अगर चीजें राजनीति से ही बदलती हैं तो राजनीति को क्यों नहीं समझना चाहिए!
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