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किस आधार पर CBFC जारी करता है सर्टिफिकेट? दूरदर्शन को क्यों नहीं है किसी सेंसर की जरूरत?

Thu, 16 Jan 2020 12:49 PM IST
अपूर्वा राय एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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सेंसर बोर्ड - फोटो : amar ujala
भारत में हर साल छोटी-बड़ी हजारों फिल्में बनती हैं। आकंड़ों की मानें तो भारत में हर दिन लगभग 15 मिलियन लोग किसी न किसी माध्यम से सिनेमा देखते हैं। ऐसे में समाज को क्या दिखाना उचित है क्या नहीं, इसका निर्णय भारत में एक संस्था करती है जिसका नाम है सेंसर बोर्ड यानी की केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड। केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड या भारतीय सेंसर बोर्ड भारत में फिल्मों, टीवी सीरियलों, टीवी विज्ञापनों की सामग्री की समीक्षा करने के लिए है।
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Film Festival - फोटो : Pixabay
कई बार ऐसा होता है फिल्म देखने के बाद सेंसर बोर्ड इसे तुरंत हरी झंडी दे देता है तो कई बार फिल्मों में लगने वाले कट इस बात का प्रमाण होते हैं कि हमारी ऑडियन्स फिल्म से कुछ अच्छा उम्मीद करती है। कई बार फिल्म मेकर्स फिल्मों के माध्यम से कुछ ऐसा परोस देते हैं जिसे सेंसर बोर्ड कतई पास नहीं कर सकता। आसान भाषा में समझाएं तो इस संस्था का काम है हमारे समाज को ये बताना कि क्या देखना सही है और क्या गलत। 
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प्रसून जोशी
सेंसर बोर्ड को पूरा ध्यान देना होता है कि कोई भी ऐसा संदेश फिल्मों के जरिए लोगों तक न पहुंचे जिससे देश की शांति भंग हो। सेंसर बोर्ड भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन है। इस वक्त सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की स्थापना सिनेमैटोग्राफ एक्ट 1952 के तहत की गई है। वर्तमान में सेंसर बोर्ड के मुंबई, चेन्नई, कलकत्ता, बैंगलोर, हैदराबाद, तिरुवनंतपुरम, दिल्ली, कटक और गुवाहाटी में नौ कार्यालय हैं।

जानिए एक फिल्म को कब तक और किस आधार पर सर्टिफिकेट मिलता है?

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Year Ender 2019 these bollywood film are based on women - फोटो : amar ujala
भारत में फिल्मों को 4 तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं। यह सर्टिफिकेट फिल्म की शुरुआत में दिखाया जाता है। किसी फिल्म को सर्टिफिकेट मिलने में 15 दिन से एक महीने तक का समय लग जाता है। इस दौरान इन फिल्मों का बारिकी से निरीक्षण करने के लिए रिव्यूअर की एक टीम बैठती हैं जो इस बात का पूरा ख्याल रखती है कि फिल्म से किसी खास वर्ग की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। अगर फिल्म में कहीं पर भी जानवरों को दिखाया गया है, तो उसके लिए 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' लेने की भी जरूरत होती है।
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vivek oberoi - फोटो : Twitter
आइए आपको बताते हैं भारत में कितने तरीके के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं। 

'यू' 

'यू' यानी ऐसी फिल्मों को हर कोई देख सकता है। क्योंकि सेंसर बोर्ड को इस फिल्म के किसी भी सीन से आपत्ति नहीं होती। इसमें गालियां अश्लीलता, धूम्रपान जैसी कोई सामाग्री नहीं होती। उदाहरण के तौर पर अमिताभ बच्चन की फिल्म 'बागबान', फरहान अख्तर की फिल्म 'भाग मिल्खा भाग'। पिछले साल रिलीज हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक 'पीएम नरेंद्र मोदी' को यू सर्टिफिकेट मिला था।

'ए'

'ए' कैटेगरी की फिल्में केवल व्यस्कों यानी की 18 साल से अधिक उम्र वाले व्यक्ति ही देख सकते हैं। जैसे ग्रैंड मस्ती, जिस्म 2
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Tanhaji The Unsung Warrior - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

यू/ए

फिल्म को देखने के लिए 12 साल से छोटे बच्चों के साथ अभिभावकों का होना जरूरी है। आपको बता दें इसी सर्टिफिकेट को सबसे ज्यादा जारी किया जाता है। हाल ही में रिलीज हुई अजय देवगन की फिल्म तानाजी को भी यही सर्टिफिकेट मिला है।

'एस'

'एस' कैटगरी की फिल्में कुछ खास वर्ग के लोगों को दिखाने की अनुमति होती है। इस तरह के सर्टिफिकेट भारत में कम ही दिए जाते हैं।

इसके अलावा अगर फिल्म में डबिंग हुई है तो उसके लिए डब सर्टिफिकेट भी चाहिए होता है। 
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doordarshan
आपको बता दें केवल दूरदर्शन के लिए बनाई गई फिल्मों के लिए CBFC के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं पड़ती है क्योंकि दूरदर्शन को इस प्रकार के सर्टिफिकेट से छूट प्रदान की गयी है। इसके अलावा दूरदर्शन के पास ऐसी फिल्मों की जांच करने की अपनी प्रणाली है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए किसी भी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं पड़ती। 
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