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‘इस इलाके में नए आए हो बरखुर्दार…’, आइकॉनिक डायलॉग देने वाले प्राण ऐसे बन गए थे खलनायिकी की जान

Sun, 25 Apr 2021 05:33 PM IST
अमरीन हुसैन एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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प्राण - फोटो : Social media

'इस इलाके में नए आए हो बरखुर्दार, वरना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता...' पढ़कर आप समझ ही गए होंगे ये किसके वाक्य हैं। दरअसल, यह महज एक बात नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा जगत के दिग्गज अभिनेता प्राण का वो आइकॉनिक डायलॉग है, जो लोगों के जहन के किसी कोने में अब भी जगह बनाए हुए है। प्राण फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा नाम रहे। उनको खलनायक बनकर जो प्रसिद्धी मिली शायद वो किसी को हीरो बनकर भी नहीं मिलती। कहा जाता है कि उनकी जबरदस्त खलनायिकी का ये कमाल था कि कोई मां अपने बेटे का नाम प्राण नहीं रखना चाहती थी। फिल्म इंडस्ट्री में उनका लगभग छह दशक लंबा करियर रहा और इस दौरान उन्होंने साढ़े तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया। आज हम आपको उनके जीवन के ऐसे ही कुछ किस्सों को बताने जा रहे हैं।

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प्राण - फोटो : Social media
विलेन के अलग-अलग किरदारों के जरिए दर्शकों में दहशत पैदा करने वाले प्राण ने अभिनेता बनने के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। आजादी से पहले 12 फरवरी 1920 को दिल्ली में जन्में प्राण मैट्रिक की पढ़ाई करने के बाद फोटोग्राफर बनना चाहते थे। दिल्ली की एक कंपनी में प्राण फोटोग्राफी का काम करने भी लगे थे। उनको इस समय काम के 50 रुपये मिलते थे। वह एक फोटोग्राफर के असिस्टेंट बने थे। इसी दौरान कंपनी ने उन्हें लाहौर कार्यालय भेजा।
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प्राण - फोटो : Social media
एक दिन पान की दुकान पर उनकी मुलाकात लेखक वली मोहम्मद से हुई। वली मोहम्मद उस समय 'यमला जट' नाम से एक पंजाबी फिल्म बना रहे थे। इस फिल्म का एक कैरेक्टर प्राण से मिल रहा था। लेखक ने ये प्रस्ताव प्राण को दिया, लेकिन प्राण ने इस बात को हल्के में लिया। बाद में वली मोहम्मद के कहने पर फिल्म में बतौर खलनायक काम करना स्वीकार कर लिया। इसके बाद प्राण ने लगभग छह दशकों तक खलनायिकी की लंबी पारी खेली।

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प्राण, अमिताभ बच्चन - फोटो : Social media
उस जमाने में हर अभिनेता का अपना तकिया कलाम होता था। उनके इस डायलॉग पर फैंस दीवाने हो जाया करते थे। प्राण का भी तकिया कलाम था। वो बात-बात पर 'बरखुर्दार' बोला करते थे। बॉलीवुड में प्राण की इतनी डिमांड थी कि उन्हें अभिनेता से ज्यादा पैसे मिला करते थे। फिल्म 'डॉन' इसका सटीक उदाहरण है, जिसमें उन्हें अमिताभ बच्चन से ज्यादा पैसे मिले थे।
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प्राण - फोटो : फाइल
अपने अभिनय के दौरान प्राण विलेन के किरदार से भी बाहर निकले। इसका जिम्मा उठाया था मनोज कुमार ने। फिल्म 'उपकार' में प्राण को मलंग चाचा का किरदार मिला। मलंग चाचा का ये किरदार प्राण के लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हो गया। प्राण ने इस किरदार को इतनी शिद्दत से निभाया कि उन्हें इसके लिए पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था। एक तरफ प्राण के किरदार से लोग खौफ खाते थे तो दूसरी ओर 'उपकार' के मंगल चाचा, 'जंजीर' के शेर खान और 'परिचय' में नरम दिल दादा जी के किरदार से दर्शकों के दिलों को भी छू लिया था।
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प्राण - फोटो : Social media
प्राण ने अपने जीवनकाल में एक से बढ़कर एक फिल्मों में काम किया। इनमें 'कश्मीर की कली', 'खानदान', 'औरत', 'बड़ी बहन', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'हाफ टिकट', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'जंजीर', 'चक्कर पर चक्कर', 'कालिया', 'राजतिलक', 'सीतापुर की गीता', 'तूफान' और 'डॉन' शामिल हैं।
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प्राण, अमिताभ - फोटो : Social media
प्राण ने अपने जीवनकाल में खूब पुरस्कार हासिल किए थे। उनको तीन बार सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था। पहली बार 'उपकार', दूसरी बार 'आंसू बन गए फूल' और तीसरी बार 'बेईमान' के लिए उन्हें यह पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1997 में उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार भी दिया गया। 12 जुलाई 2013 को प्राण ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

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प्राण

प्राण के कुछ आइकॉनिक डायलॉग को लोग आज भी याद करते हैं। इन्हें सुनकर आज भी उनकी याद ताजा हो जाती है। उपकार फिल्म में ‘ये पाप की नगरी है यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है’, ‘राम ने हर युग में जन्म लिया लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ’, ’भारत तू दुनिया की छोड़ पहले अपनी सोच’, ‘लाशें जो खरीदा करते हैं, वो कौन बड़ा व्यापारी है’, ‘आसमान पे उड़ने वाले मिट्टी में मिल जाएंगे, ’राशन पर भाषण बहुत है, भाषण पर कोई राशन नहीं’, ‘सिर्फ ये जब भी बोलता हूं ज्यादा ही बोलता हूं, समझे…’

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प्राण - फोटो : social media

शीश महल फिल्म में ‘मैं भी पुराना चिड़ीमार हूं पर कतरना अच्छी तरह से जानता हूं।’ शहीद फिल्म में ‘ओय भगतसिंह, ये भारत माता की होंदी है मैंने इतने खून कित्ते भगतसिंह।’ कश्मीर की कली पिक्चर में ‘शता ले-शता ले मेरा भी समय आएगा।’ एक अन्य मशहूर पिक्चर जिस देश में गंगा रहता है में ‘सरदार मैं फिर कहता हूं ये पुलिस का आदमी है’,  ‘तेरा बाप राका।’ धर्मा फिल्म में ‘कालाय तस्मे नम:’ और अराउंड दि वर्ल्ड में टोक्यो में रहते हो पर टोकने की आदत नहीं गई।

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