शोले
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अगर वह फोन न आता तो बसंती हां न करती
हेमा मालिनी ने भी पहले तो यही मन बनाया था कि उन्हें ‘शोले’ नहीं करनी है। वह बताती हैं, ‘मैंने उनको तो ना नहीं कहा। बस यही कहा कि सोच के बताती हूं। मैं सोच रही थी कि फिल्म ‘सीता और गीता’ करने के बाद ये ‘शोले’ का ऑफर आ रहा है और क्या है, एक तांगेवाली का रोल है। मैं पूछ रही हूं कि रोल में है क्या? तो कहते हैं कि मैं बाद में बताता हूं। रमेश जी कहने लगे कि वह बहुत बात करती है, ऐसा ही है बस। चार पांच सीन हैं। मैंने कहा, चार पांच सीन हैं! उन्होंने ये भी याद दिलाया कि हमने साथ में ‘अंदाज’ की, ‘सीता और गीता’ की, इसमें थोड़ा छोटा रोल है तो क्या हुआ, कर लेना। मुझे बहुत गुस्सा आया कि ये कैसा ऑफर है।’ फिर रमेश सिप्पी ने एक दिन हेमा मालिनी के घर पर फोन कर दिया और उनके फोन उठाते ही पूछा, ‘कर रहे हैं कि नहीं।’ हेमा बताती हैं, ‘मम्मी मेरी बात सुन रही थीं। मम्मी ने ही कहा कि करो। तुमको करना चाहिए। रोल छोटा होने से क्या होता है, इन्होंने इतनी अच्छी पिक्चरें तुम्हारे साथ की हैं। दो-दो पिक्चर, इसको भी तुम कर लो। न मत कहो। तब मैंने कहा कि ओके ठीक है। मम्मी ने कहा, तो फिर न कैसे कह सकते हैं। मम्मी की बात सुनना जरूरी होता है।’