रजनीगंधा
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'सारा आकाश' ने मुख्यधारा की चालू, लार्जर दैन लाइफ और घिसी-पिटी फॉर्मुलों की फिल्मों से अलग राह दिखाई। इस लिहाज से बासु चटर्जी पायनियर निर्देशक हैं। आगे चलकर उन्होंने 'रजनीगंधा', 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'बातों बातों में', 'खट्टा मीठा' और 'स्वामी' जैसी फिल्मों से मिडिल सिनेमा की राह प्रशस्त की। बासु चटर्जी की फिल्मों में मृणाल सेन और मणि कौल की आगामी फिल्मों का 'कला' आग्रह नहीं है। वह मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, दुविधाओं और सपनों की कहानियां लेकर फिल्मों में आये। मध्यवर्गीय परवरिश, सोच और विश्वदृष्टि ही बासु चटर्जी को परिचालित करती रही। अपनी फिल्मों के बारे में बातें करते हुए वे हमेशा यही कहते थे कि मैं निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आता हूं। उन परिवारों के चरित्रों की आशा-निराशा को अच्छी तरह जानता हूं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर मेरी फिल्मों में मध्यवर्गीय चरित्र ही होते हैं। हिंदी फिल्मों के प्रचलित हीरो की अविश्वसनीय मर्दानगी मेरी समझ में नहीं आती। बासु चटर्जी की फिल्मों के नायक और नायिका मध्यवर्गीय समाज और परिवार में आज भी दिखाई देंगे। यूं लगता है कि सीधे जीवन से वे पर्दे पर आ गए हैं। 'सारा आकाश' के नायक समर(राकेश पांडे) और नायिका प्रभा (मधु चक्रवर्ती) के बीच लंबे समय तक अबोला रहता है। समर को लगता है कि उसे पारिवारिक जरूरतों की वजह से एक अनचाहे रिश्ते में बांध दिया गया है, जो उसकी जिंदगी की बाड़ बन गई है। वह अपने दोस्तों से कहता भी है कि 'इन्हीं बाड़ों को कुचल कर हमें आगे बढ़ना होगा'। 'पिया का घर' में छोटे घर की जिंदगी में कसमसाते राम शर्मा(अनिल धवन) और मालती शंकर(जाया भादुड़ी) के दांपत्य की अड़चनों और अंतरंगता को बखूबी दिखाया गया है। 'पिया का घर' राजा ठाकुर जी मराठी फिल्म 'मुंबईचा जंवाई' की रीमेक थी। मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' प्रेमत्रिकोण का मध्यवर्गीय संदर्भ लेकर आती है। फिल्म में नायिका दीपा की भूमिका में विद्या सिन्हा ने प्रचलित हिंदी फिल्मों की नायिका से एक अलग छवि पेश की थी। प्रेमत्रिकोण भी नया था। दीपा(विद्या सिन्हा),नवीन(दिनेश ठाकुर) और संजय(अमोल पालेकर) के बीच का प्रेमत्रिकोण मध्यवर्गीय रोमांस, उम्मीद, स्मृतिदंश को बारीकी से पेश करता है। इस फिल्म में योगेश के गीतों ने मध्यवर्गीय यथार्थ को भावभीनी तरलता और गहराई दी थी। उनकी 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'खट्टा मीठा' और 'स्वामी' जैसी फिल्मों के विषय और चरित्रों की विस्तार में चर्चा की जा सकती है। इन सभी फिल्मों में बासु चटर्जी की कोशिश रही है कि वह हिंदी फिल्म के 'बालकोनी (शिक्षित और मध्यवर्गीय) दर्शकों को करीबी अनुभव और मनोरंजन दे सकें।