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Avika Gor Interview: ‘बालिका वधू’ से पहले यहां मिला मुझे पहला ब्रेक, साउथ सिनेमा ने दिखाई बड़े पर्दे की राह

Fri, 30 Jun 2023 11:13 AM IST
पलक शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कलर्स चैनल के पहले सुपरहिट धारावाहिक ‘बालिका वधू’ की आनंदी यानी अविका गौर ने प्रिंट विज्ञापन से शुरुआत करके वाया साउथ सिनेमा अब हिंदी सिनेमा में कदम रखा है। उनकी पहली हिंदी फिल्म '1920 हॉरर्स ऑफ द हार्ट' को बॉक्स ऑफिस पर संतोषजनक प्रतिसाद मिला है। एक कम बजट की फिल्म के हिसाब से इसका कलेक्शन भी इसके निर्माता अच्छा मान रहे हैं। 30 जून 1997 को मुंबई में जन्मी अविका गौर ने अपने जन्मदिन पर ‘अमर उजाला’ से ये खास बातचीत की।  

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

हॉरर फिल्मों को लेकर विक्रम भट्ट का एक अलग ही नजरिया रहा है। अपनी पहली हिंदी फिल्म के लिए ये फिल्म चुनने की वजह क्या रही
इस फिल्म के लिए मुझे विक्रम भट्ट जी का फोन आया। फोन पर ही उन्होंने कहानी सुनाई और कहा कि आपके साथ यह फिल्म करनी है। मुझे इतना बड़ा मौका बिना फिल्मी पृष्ठभूमि के। मेरा उनसे यही सवाल था कि मैं ही क्यों? उन्होंने कहा कि मुझे पता कि तुम ही यह रोल कर सकती हो। फिल्म को अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। मैं खुद भी थियेटर में जाकर रिस्पांस देख रही हूं। कुछ बड़ी फिल्में आगे पीछे थी, फिर भी मेरी फिल्म को लोग पसंद कर रहे हैं। कोविड के बाद ऐसा रिस्पॉन्स मिलना बहुत बड़ी बात है।  

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपने चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत की, पहला मौका कब मिला?
एक बार मैं मुलुंड (मुंबई के पास का उपनगर) में अपने डांस क्लास के तरफ से परफॉर्म करने गई थी वहां मुझे एक कास्टिंग एजेंट ने देखा और मेरे पापा समीर गौर से बात की। अगले दिन मेरी फोटो मांगी गई और अगले दिन ही मुझे फोटोशूट पर बुला लिया गया। शूट पर जाने के बाद पता चला था कि सचिन पिलगांवकर और सुप्रिया पिलगांवकर के साथ एक बैंक के विज्ञापन के लिए प्रिंट ऐड शूट करना है। 

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

यानी कि यहीं से एक्टिंग की तरफ आप का झुकाव हुआ?
जब मैं यह विज्ञापन का कर रही थी तो मैंने देखा कि एक एक्टर की जिंदगी कैसी होती है। उनको काम करते हुए देखकर मुझे ऐसा लगा कि ऐसा मैं कर सकती हूं और यही मुझे करना है। इसके बाद मैंने जिद पकड़ ली कि मुझे यही काम करना है। मेरी जिद की वजह से मेरे मम्मी -पापा  ने हर जगह जाकर समझा कि ऑडिशन कहां होता है। मैंने बहुत सारे ऑडिशन दिए। पांच -छह महीने बाद मुझे एक-दो शो में छोटे-छोटे रोल मिले भी। औऱ, फिर 'बालिका वधू' में काम करने मौका मिला। 'बालिका वधू'  के रोल के लिए तीन सौ लड़कियां ऑडिशन दे चुकी थी। उन तीन सौ लड़कियों में से मुझे चुना गया। मेरे लिए जितना भी संघर्ष था, वह मेरे मम्मी पापा ने किया।

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एक्टिंग के साथ- साथ स्कूल के लिए कैसे समय निकाल पाती थीं
मैं रोज सुबह पहले  स्कूल जाती थी, उसके बाद शूटिंग पर जाती थी। प्रोडक्शन टीम ने इतने अच्छे  तरीके से मैनेज किया था कि मेरा कभी स्कूल का नुकसान नहीं हुआ। मेरा स्कूल कांदिवली में था और शूटिंग नायगांव में होती थी। शनिवार और रविवार को स्कूल नहीं होता था तो उस दिन पूरे दिन मेरी शूटिंग होती थी। मेरे पापा के कारोबार में मम्मी चेतना गोर भी शामिल थीं लेकिन 'बालिका वधू' के समय उन्होंने अपना काम कुछ समय के लिए छोड़ दिया था।

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'बालिका वधू' के समय साथ में पढ़ने वाले बच्चों की किस तरह की प्रतिक्रिया होती थी?
सब यह जानने के लिए बहुत ही ज्यादा उत्सुक रहते थे कि अगले एपिसोड में क्या होने वाला है?  मेरी टीचर भी मुझसे कई बार आकर पूछती थी कि कल क्या होने वाला है? अगर शुक्रवार वाले एपिसोड में कुछ ज्यादा ही टेंशन वाला मामला फ्रीज हो गया तो सोमवार तक कोई इंतजार नहीं कर पाता था। मेरे पास फोन भी आते थे यह जानने के लिए कि सोमवार को क्या होने वाला है? मेरे फ्रेंड्स के माता-पिता जब उनको स्कूल में लेने आते थे तो मेरे साथ फोटो खींचते थे। वह सारा माहौल बहुत अच्छा लगता था।

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'बालिका वधू' के समय ही आपकी फिल्म 'पाठशाला' भी आई...
जब 'पाठशाला' में काम करने का मौका मिला तब तक मैं 'बालिका वधू' के लिए प्रोमो शूट कर चुकी थी। शाहिद कपूर की फैन हूं और इस फिल्म शूटिंग पर सिर्फ शाहिद कपूर को देखने जाती थी। मुझे याद है कि जब 'पाठशाला' की शूटिंग खत्म ही होने वाली थी तभी 'बालिका वधू' के प्रोमो शुरू हो गए थे। सेट पर सबको अचानक से पता चला कि मेरा  टीवी सीरियल भी आ रहा है। सेट पर ही हमारे प्रोड्यूसर अहमद खान ने फैसला किया कि मुझे पोस्टर में रखते है। उस फिल्म में मेरा किरदार छोटा सा था लेकिन अहमद खान ने मुझे पोस्टर में जगह दी थी। 

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अविका गौर - फोटो : सोशल मीडिया

इसी बीच आपकी एक और फिल्म भी 'तेज' आई, उसमें काम करने के कैसे अनुभव रहे?
उस फिल्म में मेरे ज्यादातर सीन बोमन ईरानी के साथ थे। उसमे उन्होंने मेरे पिता की भूमिका निभाई थी। ट्रेन सीक्वेंस में मेरा सीन मोहन लाल जी के साथ था। उस फिल्म में मेरा काम करने का अनुभव बहुत ही अलग रहा, क्योंकि दोनों बहुत बड़े नाम हैं। अपने वास्तविक जिंदगी में बहुत ही विनम्र हैं। उन सब चीजों से मुझे बहुत प्रेरणा मिली। उस फिल्म की शूटिंग के दौरान मोहन लाल सर के साथ मैंने ज्यादा समय बिताया था।

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अविका गौर - फोटो : insta

रोहित शेट्टी के साथ 'खतरों के खिलाड़ी सीजन 9' के दौरान क्या सीखा? 
'खतरों के खिलाड़ी' में जब रोहित सर के साथ अर्जेंटीना में शूट किया, तब बहुत मजा आया था। वह लोगों का बहुत ख्याल रखते हैं, सबकी बहुत मदद करते हैं। एक ऐसे शो पर जहां आप थ्रिल का सामना करते हो, तो आपको लगता है कि सेट पर एक ऐसा आदमी हो जिसको उन सब चीजों का अनुभव हो। जब आप किसी अनुभवी डायरेक्टर के साथ काम करते हैं, तो आपको एक सुरक्षा की भावना महसूस होती है कि यहां कुछ गलत नहीं होने वाला है।

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अविका गौर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और फिर साउथ में सबसे बड़ा मौका आप को नागार्जुन की तेगुलू फिल्म 'उय्याला जाम्पाला' में मिला। इस फिल्म से जुड़ना कैसे हुआ ? 
'बालिका वधू' की वजह से काफी लोकप्रियता मिल गई थी। उसके बाद एक शो 'ससुराल सिमर का' कर रही थी। उस शो में मेरा किरदार काफी बड़ा था। लोगों ने देखा कि अब मैं बड़ी हो गई हूं। वह फिल्म भी ऑडिशन के माध्यम से ही मिली थी। उस फिल्म में किरदार भी 16- 17 साल की लड़की का था। फिल्म के निर्देशक विरिंचि वर्मा और निर्माता राम मोहन पी  ने मेरा ऑडिशन देखा तो उन्होंने सोचा कि आनंदी की शोहरत का उन्हें फायदा मिल सकता है। यह चीज काम कर गई। फिल्म बनने के बाद जब नागार्जुन जी ने फिल्म देखी तो तब उन्होंने सोचा कि वह फिल्म को प्रजेंट करेंगे और फिल्म में सह -निर्माता के तौर पर जुड़े।

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अविका गौर - फोटो : social media

और, अब तो आप खुद फिल्म निर्माता बन चुकी हैं?
जब मैं 21 साल की हो गई तब मुझे ख्याल आया कि अब प्रोड्यूसर बन सकती हूं। तेलुगू में काफी फिल्में कर रही थी और भी बहुत सारी स्क्रिप्ट मेरे पास आ रही थी। उसमे से कुछ स्क्रिप्ट ऐसी थी कि डायरेक्टर अप्रोच करते थे, लेकिन उनके पास प्रोड्यूसर नहीं होते थे। ऐसी सिचुएशन में मेरे पास एक स्क्रिप्ट आई, तो मुझे लगा कि यह फिल्म मुझे खुद ही प्रोड्यूस करनी चाहिए। मैंने पापा  से पूछा कि क्या ऐसा कर सकते हैं। पापा ने साथ दिया और मैं निर्माता बन गई।

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