नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति
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अश्वनी बताती हैं कि नारायण और सुधा मूर्ति ही वे आखरी इंसान हैं जिनसे वह लॉकडाउन के पहले मिली थीं। वह कहती हैं, 'मैंने उनके साथ बेंगलुरु में पांच दिन बिताए हैं। वह ऐसे इंसान हैं कि उन्होंने मुझे भी एक बेहतर इंसान बना दिया है। मेरी नजर में सुधा एक वास्तविक हीरो हैं। उनकी तस्वीर मेरे मोबाइल फोन के वॉलपेपर पर लगी हुई है। वह जानती हैं कि वह कौन हैं, फिर भी वह अभी भी सीखने की चाह रखती हैं। वह एकदम बच्चे की तरह हैं और उसी की तरह जीना भी पसंद करती हैं।'