अनुराग कश्यप
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विदेशी फिल्मों ने बदला अनुराग का नजरिया
अनुराग जिन कहानियों पर आधारित फिल्में बनाते हैं, वह एकदम अलग ही होती हैं। अनुराग हिंदी फिल्में देखकर ही बड़े हुए। जिस तरह की कहानियां वह अपने दिमाग में सोचते थे उस तरह की कहानियां कभी हिंदी फिल्मों में पर्दे पर नहीं दिखाई जाती थीं। इससे उन्हें समझ आया कि सिनेमा में उनकी जगह नहीं है। हालांकि, जब उन्होंने वर्ष 1993 में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया के दौरान विदेशी फिल्मों को देखा, तब उन्हें समझ आया कि जिस तरह की कहानियां बहुत सोचते हैं, वह कहानियां दूसरी जगहों पर तो बनती हैं लेकिन अपने देश में नहीं। तब उन्होंने फैसला किया कि वह भी अब फिल्मों की तरह बढ़ेंगे और जो कहानियां यहां पर्दे पर नहीं दिखाई जाती हैं, उसी तरह की कहानियां दिखाएंगे।