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EXCLUSIVE: हां, मेरा सिनेमा बदला है लेकिन इसकी वजह मेरा ब्लड कैंसर से जूझना नहीं है: अनुराग बसु

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अनुराग बसु - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अनुराग बसु का करियर टेलीविजन से शुरू होकर बड़े परदे से होते हुए मोबाइल तक पहुंच गया है। वह अब डिजिटल के लिए अलग से भी कुछ करने के पक्षधर हैं। उनके पास संवेदनाओं का खजाना है और रुपहले परदे पर बिखेरने को लाखों रंग। पर, अनुराग शुरू से ऐसे नहीं थे। कैसे समय के साथ बदला अनुराग बसु का सिनेमा और परदे पर कहानियां कहने के क्या हैं उनके कारक? बता रहें अनुराग बसु इस खास बातचीत में वरिष्ठ फिल्म समीक्षक पंकज शुक्ल को।
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अनुराग बसु, अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘लूडो’ में जो लोग भी अभिषेक बच्चन को देख रहे हैं, उनको इस किरदार में ‘युवा’ का लल्लन दिख रहा है। आपको भी ऐसा लगता है क्या?
अभिषेक बच्चन एक बेहतरीन अभिनेता हैं। किरदारों में वह रम जाते हैं। फिल्म ‘लूडो’ में उन्होंने खुद को एक नए आयाम के साथ पेश किया है। लेकिन, हां अगर लोगों को बिट्टू में लल्लन की छवि नजर आती है तो मैं ये बात स्वीकार करता हूं कि ये किरदार लिखते समय मेरे मन में लल्लन का काफी प्रभाव था। निर्देशक मणिरत्नम की ये फिल्म थी ही ऐसी और अभिषेक बच्चन ने लल्लन का किरदार जिया भी बहुत शानदार तरीके से था।

पढ़ें: Ludo Netflix Review: चौकड़ी भरने में कामयाब अनुराग बसु की ‘लूडो’, त्योहारी मौसम में रंगों की मुस्कान


 
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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, राजकुमार राव को मिथुन चक्रवर्ती का फैन बनाने की वजह?
राजकुमार राव के किरदार में मिथुन दा के फैन का अंश बाद में आया। पटकथा लिखते समय ये था नहीं लेकिन बाद में शूटिंग के वक्त उनके किरदार में ये रंग धीरे धीरे आता गया। लंबे बाल, चलने का एक अलग स्टाइल, बात करने का अलहदा अंदाज और प्रेम में निभाई गईं प्रतिज्ञाएं। पश्चिम बंगाल में मिथुन दा का एक अलग आभामंडल रहा है तो ये किरदार धीरे धीरे ऐसा बनता चला गया।

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अनुराग बसु - फोटो : file photo
आपके शुरूआती सिनेमा पर महेश भट्ट का काफी असर रहा और फिर आपने एकदम से अपने सिनेमा की धुरी ही बदल दी, ऐसा क्या जीवन में आए किसी बड़े मोड़ की वजह से है?
मैं समझ रहा हूं कि शायद आप मुझे हुए ब्लड कैंसर की तरफ इशारा कर रहे हैं। लेकिन, मैं कहूंगा कि नहीं। मेरे जीवन में और मेरे सिनेमा में असल बदलाव मेरी शादी के बाद आया। मेरी दो बेटियों के जन्म के बाद आया। इशाना और अहाना की आंखों में मैंने जितने भी जीवन के रंग देखे हैं, वे सब अब मेरी कल्पनाओं का हिस्सा हैं।

पढ़ें: अमर उजाला से खास बातचीत में अभिषेक बच्चन ने बताया, कैसे मिली ‘लूडो’
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अनुराग बसु - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपकी फिल्में बनाने की गति थोड़ी सुस्त सी जान पड़ती है, एक फिल्म से दूसरी फिल्म के बीच इतना लंबा अंतराल रखने की वजह?
मेरे पास जीवन में सिनेमा के अलावा भी बहुत कुछ है। मैं सिर्फ सिनेमा के लिए नहीं जीता हूं। हां, मेरे सिनेमा की गति सुस्त है और वह इसलिए कि मैं एक आलसी फिल्ममेकर हूं। जब तक कोई विचार या वस्तु मुझे मजबूर न कर दे, मैं उसे सिनेमा में ढाल नहीं पाता हूं। कोशिश कर रहा हूं कि ये गति थोड़ा बढ़े। अपनी अगली फिल्म में मैं ये अंतराल कम रखने की पूरी कोशिश कर रहा हूं।
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अनुराग बसु - फोटो : Amar Ujala
आपने टेलीविजन पर तमाम डरावनी कहानियां बनाई हैं। आपके सिनेमा में हॉरर देखना काफी दिलचस्प रहेगा, नहीं?
आपने मेरे भीतर ये एक नया बीज डाल दिया है। हां, ये सच है कि मैंने टेलीविजन पर बहुत काम किया है। हॉरर कहानियां भी इसका हिस्सा रही हैं। लेकिन, सिनेमा मैं संवेदनाओं की अनुभूति पर बनाता हूं। आपका ये कहना कि मेरे टीवी के दिनों की कहानियों में मेरे सिनेमा की संवेदनाएं मिल जाएं तो इसमें लोगों को नई दिलचस्पी हो सकती है, मेरे लिए विचार का एक नया प्रस्थान बिंदु है। इस पर मैं ज़रूर विचार करूंगा।
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बर्फी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपकी फिल्म ‘बर्फी’ से लोगों को बहुत उम्मीद थी कि ये फिल्म ऑस्कर लेकर आएगी, क्या हम ऑस्कर में मार्केटिंग से चूक जाते हैं?
मेरी नई फिल्म ‘लूडो’ नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है। इनकी मार्केटिंग टीम काफी मजबूत है। ये किसी भी सिनेमा को एक साथ करीब दो सौ देशों में पहुंचा देते हैं। किसी भी फिल्मकार के लिए उसका सिनेमा इतने विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में देखा जाना एक अलग अनुभव है। नेटफ्लिक्स का अनुभव जरूर मेरे ही नहीं दूसरे फिल्मकारों के भी काम आएगा ही।
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अनुराग बसु, रणबीर कपूर - फोटो : Mumbai, Amar Ujala
एक जुमला इन दिनों हिंदी सिनेमा में खूब सुनने को मिलता है कि अब ‘हिंदी हार्टलैंड’ की फिल्मों का जमाना है, क्या आप भी ये मानते हैं?
हिंदी प्रदेश की कहानियां कभी हिंदी सिनेमा से गई ही नहीं। हां, बीच में एनआरआई रोमांस की कहानियों ने जरूर कुछ साल यहां माहौल बदलने की कोशिश की लेकिन हिंदी सिनेमा हिंदी प्रदेश की कहानियों से पहले भी सांसें पाता था और अब भी पा रहा है। एक बात इस बीच ये जरूर हुई कि दर्शकों की पसंद में बदलाव आया है। अब हिंदी सिनेमा के दर्शक को अपने आसपास की कहानियों में रस आने लगा है।

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