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Anuradha Paudwal Exclusive: स्टूडियो के घंटे भर के सफर ने बदल दी जिंदगी, इन 10 कहानियों में 50 साल का सफरनामा

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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा के मौजूदा दौर के संगीत में तमाम प्रयोगों के बावजूद ग्रामीण और कस्बाई भारत में आज भी बीती सदी के आखिरी दो दशकों के गाने सबसे ज्यादा बजते हैं। और, इन गानों में जो महिला स्वर अधिकतर सुनाई देता है, वह हैं अनुराधा पौडवाल। मौजूदा दौर की वह इकलौती गायिका हैं जिन्होंने मुकेश, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाया है। गायक कुमार शानू को फिल्मों में ब्रेक भी अनुराधा पौडवाल ने ही दिलाया था। गायकी की गोल्डन जुबली मना रहीं अनुराधा पौडवाल से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात।
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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
साल 1973 में आपका पहला स्वर जो दर्शकों ने सुना फिल्म 'अभिमान' में वह थी एक एक शिव स्तुति और अब आप गायन के 50वें साल में हैं। पहला ब्रेक कैसे मिला याद है आपको?

ये ईश्वर का आशीर्वाद है। ऐसा कभी मैंने सोचा नहीं था कि मैं फिल्म इंडस्ट्री में आऊंगी। मैं पचास साल पहले की बात कर रही हूं जब फिल्म इंडस्ट्री को  एक अलग नजरिए से देखा जाता था। मेरे पिताजी बहुत पढ़े लिखे थे लेकिन वह कहते थे कि अच्छे घर की लड़कियां फिल्मों में नहीं जाती हैं। फिर मेरी शादी हुई। मेरे पति अरुणजी (पौडवाल) संगीतकार एस डी बर्मन के सहायक। उन्होंने यह शिव स्तुति बैक ग्राउंड म्यूजिक के लिए घर पर ही मेरी आवाज में सिर्फ संदर्भ के लिए रिकॉर्ड कर ली थी। बर्मन दा को पता नहीं था कि मैं गाती हूं। उन्होंने श्लोक सुना तो उनका छूटते ही सवाल था, गाया किसने है? तुरंत फाइनल रिकॉर्डिंग का बुलावा आ गया। एक घंटे के अंदर मैं रसोई से निकलकर स्टूडियो के अंदर माइक्रोफोन के सामने खड़ी थी।
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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, ऐसा भी किस्सा है कि आपने एक दिन में 10 भजन रिकॉर्ड कर दिए थे?

नवरात्रि के तीन दिन पहले मैं और अरुणजी दिल्ली गए हुए थे। गुलशनजी ने मुझसे पूछा कि मेरे पास 10 गानों का साउंड ट्रैक तैयार है। ये माता की भेंटें अगर मैं आपको दूं तो क्या आप एक दिन में गा देंगी। मैंने कहा कोशिश करती हूं। तो इधर एक एक गाना रिकॉर्ड हो रहा था। साथ साथ में उसका लूप बनकर मिक्सिंग हो रही थी। कैसेट के कवर छप रहे थे। नोएडा में शाम तक मैं ये भजन गाती रही और उनका साथ ही साथ पोस्ट प्रोडक्शन चलता रहा। उनके पास ऐसी मशीन थी जो एक बार में एक लाख कैसेट बनाती थे। छह बजे मैंने रिकॉर्डिंग खत्म की और सात बजे गुलशनजी ने मेरे हाथ में कैसेट थमा दी। मुझे ऐसा लगा कि जैसे किसी साधु ने झोले से भभूत निकालकर मेरे हाथ पर रख दी हो। सारे कैसेट हाथ के हाथ वहीं फैक्ट्री गेट पर बिक गए।

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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, 'लाल दुपट्टा मलमल का' और 'फिर लहराया लाल दुपट्टा’ का भी अपना अलग ही इतिहास है?

इसकी भी एक कहानी है। गुलशनजी की माता का निधन हो गया था। वह 'ममता का मंदिर' नामक फिल्म बनाना चाह रहे थे। उन्होंने कुछ बड़े संगीतकारों से बात की। एक संगीतकार ने कहा कि कुछ गाने तैयार हैं, आप स्टूडियो आकर सुन लीजिए। उनको ये बात अखर गई कि पैसा मैं लगा रहा हूं और बात ये ऐसे कर रहे हैं। डबल मीनिग गानों का दौर था और जो पहला गाना गुलशनजी को सुनाया गया वह था, 'रात भर पंखा देती रही तेरी मां, मेरे पैर दबाती रही तेरी मां, मेरा सिर दबाती रही तेरी मां'। गुलशनजी को तो जैसे काटो तो खून नहीं। तब हमने फैसला किया कि गानों में लय और शब्दों के चयन बदलने की जरूरत है।
 
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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर...?

मैंने एक हफ्ते का समय मांगा और संगीतकार आनंद मिलिंद से संपर्क किया। उनको मैने बताया कि ऐसे ऐसे गाने हैं। उन्होंने तमाम सवाल किए। मैंने कहा कि न तो फिल्म तय है, न हीरो हीरोइन, बस गाने तय हैं। फिर मजरूह सुल्तानपुरी साहब आए। उन्होंने पहला गाना लिखा, 'क्या करते थे साजना तुम हमसे दूर रहके', एक और गाना बना और उसी दिन गाने रिकॉर्ड करके अगले दिन सुबह इसे गुलशनजी ने विविध भारती के चित्रलोक कार्यक्रम में चलवा दिया। एक हफ्ते के अंदर गाना सुपरहिट। अगले 15 दिनों में हमने 10 गाने बना लिए। कैसेट रिलीज हुई तो हाथों हाथ बिक गई। फिर 'जीना तेरी गली' कैसेट तैयार हुआ। उसके बाद 'फिर लहराया लाल दुपट्टा' का।
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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और यहीं से शुरुआत हुई म्यूजिक वीडियोज की?

हां, इन गानों के आडियो तो बहुत हिट हुए। लेकिन, दूरदर्शन के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम चित्रहार में गाने चलाने के लिए उनका फिल्मांकन जरूरी था। गाने फटाफट बने तो ये हुआ कि दूरदर्शन पर चलाने के लिए तो सेंसर सर्टिफिकेट चाहिए। खाने की मेज पर ही बैठे बैठे फिल्म बनाने का फैसला हुआ और फिल्म बनी 'लाल दुपट्टा मलमल का'।
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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और फिर ‘आशिकी’, ‘दिल है के मानता नहीं’ और ‘सड़क’ के गानों में भी ऐसा ही कुछ नवाचार हुआ?

नदीम श्रवण और हमने इस बीच 27 गाने बना लिए थे। मैंने सुझाव दिया कि इस बार ये गाने किसी बाकायदा बनी फिल्म में होने चाहिए। महेश भट्ट का नाम मैंने ही सुझाया और कहा कि वह बहुत अच्छे निर्देशक हैं, अगर वह चाहेंगे तो इसे सोना बना देंगे। महेश भट्ट गाने सुनकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गुलशनजी के साथ ये तीन फिल्में बनाईं। और, यहीं से शुरू हुई गायकों की पब्लिसिटी। वे हम लोगों के ऊपर गाने शूट करते थे। हर तरफ हमारी फोटो। यहां तक कि पंखे और वाशिंग पाउडर के पैकेट पर भी अनुराधा पौडवाल की फोटो छपने लगी थी।

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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, फिल्मों में सिलसिला कैसे शुरू हुआ?

'अभिमान' के बाद फिल्मों का पहला ऑफर संगीतकार जयदेव जी का आया। वह बहुत सारे कंपटीशन में जज हुआ करते थे और उनके हाथों मुझे बहुत सारे अवार्ड मिले हैं। वह कहा करते थे कि अनु फिल्मों में जब तुम गाना शुरू करेगी तो तुमसे जरूर गवाऊंगा। मैंने उनके लिए 'जिंदगी मेरे घर आना' गाया। लेकिन मेरे करियर का सबसे मुश्किल गीत रहा फिल्म 'उत्सव' में। संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ पहली बार मैंने 120 म्यूजिशियन के साथ लाइव गाना रिकॉर्ड किया था। लोग अलग- अलग सुर में बजा रहे थे औऱ मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किस सुर के साथ संगत बिठाऊं। इस गाने के फिल्मांकन में रेखा मेले में भाग रही हैं और हर पल दृश्य बदल रहे हैं तो गीत उसी तरह का था। लक्ष्मीकांत जी ने मुझे समझाया कि अगर आप ध्यान से सुनेंगे तो सभी सुर आपको एक जैसे ही लगेंगे। वह मेरे करियर का सबसे मुश्किल गाना था जिसमें ध्यान लगाना बहुत जरूरी था। इसके लिए मुझे पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला।

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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, इसके बाद आपको तीन फिल्मफेयर लगातार तीन साल मिले और नामित गानों में भी आपका अपने ही गानों से कंपटीशन होने लगा। संगीत कहां से सीखा आपने?

मैंने कभी बाकायदा गाना सीखा नहीं है। मैंने लता (मंगेशकर) जी को सुनकर गाना सीखा और ये भी सीखा कि कला के क्षेत्र में विनम्रता ही कलाकार को लंबे समय तक क्षेत्र में बनाए रखती है। लताजी की गाई गीता को आज भी मैं गाती हूं। उससे आवाज में स्पष्टता आती थी। एक बार मैं चालीस दिन बीमार रही और उस दौरान लताजी की गाई श्रीमद्भगवत गीता ही सुनती रही। यहां तक कि ये मुझे याद हो गई। सरस्वती की कृपा मुझ पर लता मंगेशकर के जरिये ही हुई।

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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मौजूदा दौर की आप इकलौती ऐसी गायिका है जिसने मुकेश, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार तीनों के साथ गाया है। क्या यादें हैं सिने संगीत के इन महान गायकों की?

मुकेश जी बहुत तेजस्वी व्यक्तित्व के थे। उनका आभा मंडल कमाल का था। मुझे याद है जब पहली बार मैं उनसे मिली थी और उनका चेहरा देखा था तो मुझे ऐसा लगा कि कोई देवदूत या फिर भगवान हैं। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मेरा पहला गाना उनके साथ था। हालांकि, वह फिल्म रिलीज नहीं हुई, लेकिन मुझे हमेशा उनका बहुत प्यार मिला। रफी साहब के साथ भी ऐसा रहा। उस समय मैं 18-19 साल की ही थी। बहुत डरती थी उनसे। वह बहुत प्यार से और धीरे से बोलते थे कि डरना नहीं, बहुत अच्छा हो रहा है। किशोर दा के साथ तो मैंने 250 शोज किए हैं। अरुणजी उनके साथ बजाते थे। किशोर कुमार से मैंने लाइव शो के दौरान दर्शकों से संवाद बनाना सीखा।

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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
गुरु किसको मानती हैं आप?

मेरी गुरु सुमति टनक तो अभी नहीं रही, उनको अंबाजी की सिद्धि प्राप्त थी। वह मेरे पति अरुणजी की बुआ लगती थीं। उन्होंने ही मुझे बोला था कि तुमको गाना है। मेरे कुछ गाने सुनकर मुझे हृदयनाथ मंगेशकर ने भाव सरगम में गाने का आमंत्रण दिया था लेकिन मैंने मना कर दिया। तब गुरुजी ने कहा कि गाने वाली तुम कौन हो? गाने वाली तो मैं हूं, तुम जाकर वहां बैठो, मुझे तुम्हें वहां देखना है। मुझे आज तक नहीं पता चला कि मुझे कैसे गाना आया। मंच पर बैठने के बाद गुरु के शब्द मेरे कान में गूंजते हैं और मैं गा देती हूं। मैंने गाना कभी सीखा नहीं, हां, रियाज जरूर लताजी के गानों पर किया। 
 
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अनुराधा पौडवाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, चलते चलते आखिरी सवाल, आपकी जनसेवा के कार्य गिफ्टिंग ऑफ साउंड के बारे में। इसे कैसे आप दूर दराज के गांवों तक पहुंचाना चाहती हैं?

मेरी तो केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों से यही विनती है कि बच्चे का जन्म होते ही उसकी श्रवणशक्ति का परीक्षण होना चाहिए। सुनने में मदद करने वाली मशीन बनाने वाली कंपनी वायडेक्स के साथ मिलकर मैं ऐसे बच्चों को तलाशती रहती हूं जिनको सुनने में दिक्कत है। इन बच्चों को हम मुफ्त में मशीनें और बैटरी बांटते हैं। अपने सूर्योदय फाउंडेशन के जरिये ये काम मैं ईश्वर के आशीर्वाद से ही कर पाई हूं। मेरी बड़ी इच्छा है कि और भी संगठन मेरे साथ जुड़ें ताकि मैं ऐसे हर बच्चे को आवाज का उपहार दे सकूं, जिसे सुनने में तकलीफ होती है।


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