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Anup Jalota Interview: सात साल की उम्र में पहली बार पुलिस लाइन में गाया, इस्कॉन में गाए भजनों का बना अलबम

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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
29 जुलाई 1953 को जन्मे भजन सम्राट अनूप जलोटा आज अपना 70वां जन्मदिन मना रहे हैं। अनूप जलोटा ने भजन गायन को ऐसे समय में चुना जब मुकेश, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार जैसे गायकों के प्रभावित होकर लोग इनके जैसा गायक बनना चाह रहे थे। अनूप जलोटा के मुताबिक, उन्होंने भजन गायकी को इसलिए चुना क्योंकि यह अध्यात्म से जुड़ा है। वह कहते हैं, जब गायन की विधा अध्यात्म से जुड़ती है तो उसका स्थान प्रथम हो जाता है। अनूप जलोटा ने फिल्मों में कुछ रोमांटिक गाने भी गाए हैं, लेकिन उनका झुकाव भजन और गजल गायकी की तरफ ही रहा है। अपने जन्मदिन पर अनूप जलोटा ने ‘अमर उजाला’ से ये खास बातचीत की। 
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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जिस दौर में सारे गायक मुकेश, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसा बनना चाह रहे थे, आपका झुकाव भजनों की तरफ कैसे हो गया?  

मेरे पिता पुरुषोत्तम दास जलोटा जब मुझे संगीत सिखाते थे तो कहते थे कि गायन विधा को सबसे प्रमुख विधा माना गया है। गायन, वादन, नृत्य में गायन को प्रमुख माना गया है, नृत्य को द्वितीय और नृत्य को तृतीय। गायन में भी अगर आध्यात्मिक गायन हो, तो वह और भी प्रथम हो जाता उसमें हम अध्यात्म की बात करते हैं। पिताजी ने मुझे सबसे पहला गीत 'ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया' सिखाया था। सात साल की आयु में मुझे स्टेज पर बैठा दिया, तभी से हम गाने  लगे और अभी तक गा रहे हैं। सात साल से 70 वर्ष की यह जो यात्रा है, अभी तक चल रही है। 

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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सात साल की उम्र में कहां बैठे पहली बार स्टेज पर?

पहली बार स्टेज पर लखनऊ में जन्माष्टमी के दिन पुलिस लाइन में गाया था। हर साल पुलिस लाइन में पुलिस वाले जन्माष्टमी बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं। मानते हैं कृष्ण हमारे जेल में पैदा हुए थे। हमेशा जेल और पुलिस स्टेशन में बहुत भव्य तरीके से जन्माष्टमी मनाते हैं। पिता जी छह वर्ष की उम्र से संगीत सिखा ही रहे थे और मंच पर गाने से यह सीखने को मिला कि दर्शकों को दोस्त कैसे बनाते हैं। 

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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

पिताजी के अलावा और किन भजन गायकों का प्रभाव आपके जीवन में रहा है?

पंडित जसराज, भीमसेन जोशी जी, ओमकार नाथ ठाकुर, हरिओम शरण जैसे भजन गायकों का मेरे जीवन पर काफी प्रभाव रहा है। इन सबके भजन मुझे बहुत भाते हैं। उनकी गायकी का जो  स्टाइल है। उसे कहीं न कहीं अपनी गायकी में उतरता हूं। हरिओम शरण का गाया भजन 'मैली चादर ओढ़कर' मेरा बहुत ही पसंदीदा भजन है, इस भजन को अक्सर स्टेज कार्यक्रम के दौरान गाता रहता हूं। 

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जगजीत सिंह, अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, रेडियो पर कैसे शुरुआत हुई? मैं लखनऊ से मुंबई 20 वर्ष की उम्र में आ गया। मेरे पिता जी मुझसे दो साल पहले आए थे। ऑल इंडिया रेडियो में एक ग्रुप था जहां  मुझे 320 रुपये महीने की नौकरी मिल गई। मैने दो वर्ष तक नौकरी की। ऑल इंडिया रेडियो में एक ग्रुप था जिसमें  30 गायक थे। उनमें से एक मैं भी था। उषा मंगेशकर जी, महेंद्र कपूर जी के अलावा और भी कई गायक आते थे। उनके लिए हम कोरस में गाते रहे। फिर धीरे- धीरे हमारे गाने की महक लोगों तक बाहर पहुंची, लोगों को अच्छा लगा। मनोज कुमार जी ने 'शिरडी के साईं बाबा' फिल्म में पहली बार मोहम्मद रफी साहब के साथ गाने का मौका दिया। 'एक दूजे के लिए' में दो पंक्तियां गाई, इस तरह से हमारे गानों की चर्चा होने लगी। और, अभी तक सफर चल रहा है।
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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मोहम्मद रफी के साथ पहली बार गाने का कैसा अनुभव रहा?

पहली बार तो बहुत डर लग रहा था। उन दिनों एक ही माइक पर गाना होता था। मैं और मोहम्मद रफी साहब आमने सामने खड़े और बीच में माइक। जब रफी साहब ने मुझे डरते देखा तो उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और कहा कि परेशान मत हो। मनोज कुमार जी ने भी कहा कि ये पंजाब का शेर है। वह मेरी पहली मुलाकात  मोहम्मद रफी  साहब के साथ थी।

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लता मंगेशकर, अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

लता मंगेशकर से पहली मुलाकात कब हुई?

लता जी से पहली बार मिलने उनके घर पर ही गया था। उनको मैंने अपना गाना 'सोलह बरस की उमर को सलाम' सुनाया। तो उन्होंने कहा कि बहुत अच्छा है, खूब तैयारी करो, मेहनत करो सब अच्छा होगा। उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहा। लेकिन मेरी रुचि सबसे ज्यादा भजन और गजल गायकी में ही रही है। और, आज भी वही है। लता जी से  नियमित रूप से व्हाट्सएप और फोन पर बातें होती रही, लेकिन जब दो ढाई महीने तक बात नहीं हुई तो समझ में आ गया की उनकी तबीयत ठीक नहीं है। कभी उनको कोई तस्वीर मिल जाती थी तो व्हाट्सएप पर भेज देती थी। मुझे कोई तस्वीर मिलती थी तो मैं भी उनको भेजता था। फोन पर उनको कुछ -कुछ सुना देता था। वह मां सरस्वती की ही वह रूप थी। वह आईं और लोगों को सिखा गईं कि संगीत ऐसे होता है।

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किशोर कुमार, अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

किशोर कुमार के गाने आप स्टेज पर गाते रहते हैं, किशोर कुमार से पहली मुलाकात कब हुई?

किशोर कुमार जी से मैंने अपनी एक फिल्म 'पत्तों की बाजी' में एक गीत 'नहीं दूर मंजिल, दूर नहीं तुमसे' गवाया था। यह गाना सुनकर तो पहले उन्होंने गाने से मना कर दिया। मैंने पूछा क्यों नहीं गाएंगे? किशोर कुमार जी ने कहा कि तुम क्लासिकल गाते हो, इस गाने को क्लासिकल बना दोगे। मैंने कहा, नहीं आपकी  स्टाइल का गीत बनाएंगे। फिर उनकी स्टाइल का गाना बनाया, उनको बहुत अच्छा लगा, फिर हमारी  फिल्म में उन्होंने पहली बार गाया।

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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अभी हाल ही में पार्श्वगायक मुकेश का 100 वां जन्मदिन था? उनसे जुड़ी कुछ यादें साझा करना चाहें?

मुकेश जी, मोहम्मद रफी जी, जो भी हमसे बेहतर सिंगर हैं, उनके गाने स्टेज पर गाता रहता हूं। मुकेश जी के जन्मदिन के अवसर पर  हम लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के आमंत्रण पर दिल्ली में थे। मैं, सोनू निगम, शान, जसपिंदर नरूला, नितिन मुकेश वहां थे। हम सबने मिलकर मोहम्मद रफी साहब का एक गाना गाया। कुछ गाने मुकेश जी के भी हमने गाए। एक बार लखनऊ में कुछ लोग मुकेश जी का  कार्यक्रम कराना चाह रहे थे, मुझे कुछ लोगो ने कहा कि मुकेश जी से मिलाइए। मैंने  मुकेश जी को फोन किया। उन्होंने अगली सुबह आठ बजे मिलने के लिए बुलाया। मैं पहुंचा तो वह तानपुरा लेकर रियाज कर रहे थे। मुकेश जी के साथ यह मेरा पहला मुलाकात थी, उनसे हमेशा मिलकर बहुत अच्छा लगता था। 

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अनूप जलोटा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपको कब लगा कि भजन गायकी में आपकी पहचान बन गई है?

मेरा एक म्यूजिक एलबम 'भजन संध्या' रिलीज हुआ था। उसमें 'ऐसी लागी लगन' , 'रंग दे चुनरिया' जैसे हिट भजन आ गए थे।  इस एलबम के रिलीज के एक हफ्ते के बाद ही भजन घर घर पहुंच गया। वह भजन बना नहीं था, उस पर कृपा हो गई थी। हम जुहू के इस्कॉन मंदिर  में एक कार्यक्रम करके आए। मैं हारमोनियम पर था, तबले पर रूप कुमार राठौड थे और गुरदीप सिंह गिटार पर थे। एक महीने के बाद हमारे पास फोन आया कि आपकी रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी लगी। इसको हम पॉलिडोर  को रिलीज करने के लिए दे रहे हैं। हमने कहा कि हमें एक बार सुनने को तो दो। हम सुनने गए। मैंने कहा कि अच्छी लग रही है, लेकिन इसमें मजीरा फिट करो। फिर इंदू आत्मा जी से संपर्क किया। उन्होंने मजीरा बजाया। फिर उसे रिलीज किया गया और एक हफ्ते बाद सब मुझे भजन सम्राट कहने लगे। 

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