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Anandji Exclusive: लड़की ने चिट्ठी में भेजा लिपस्टिक से बना दिल, साथ में फूल और इंदीवर ने लिखा, फूल तुम्हें...

सार

हिंदी सिनेमा की मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंद जी ने हिंदी सिनेमा में एक से बढ़कर एक सदाबहार हिट गाने दिए हैं। वहीं, इस जोड़ी के आनंदजी ने अपने करियर और संगीत की दिलचस्पी से जुड़ी कई अहम बातें अमर उजाला के साथ साझा की हैं। 
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आनंदजी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा की मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंद जी ने हिंदी सिनेमा में एक से बढ़कर एक सदाबहार हिट गाने दिए हैं। फिल्म ‘छलिया’ के पोस्टर पर पहली बार इस संगीतकार जोड़ी का नाम दिखा। भारत के लोक संगीत पर आधारित सबसे ज्यादा गीत बनाने वाली इस जोड़ी के आनंदजी से ‘अमर उजाला’ की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात।
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आनंदजी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आनंदजी, संगीत का सिलसिला आपके जीवन में कहां से शुरू होता है?

मुंबई के गिरगांव में जहां हम लोग रहते थे। वहां बहुभाषीय लोग रहते थे। भाषाओं को सीखने का शौक था मुझे। फिल्म इंडस्ट्री में जाने जैसा कोई इरादा तब नहीं था। एक दिन हमें स्कूल से रिकॉर्डिंग में बुलाया गया। उन दिनों लाइव रिकॉर्डिंग के साथ साथ शूटिंग भी होती थी। स्कूल के कुछ बच्चों का चयन करके गाने के लिए बुलाया गया था। स्कूल की म्यूजिक क्लास से हमारा भी चयन हुआ। शूटिंग के माहौल को देखकर हर चीज के बारे में जानने की उत्सुकता हुई। मेरी बातें सुनकर सबको मजा आता था। बड़े भाई कल्याणजी उन दिनों बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे। उनकी संगीत में दिलचस्पी काफी थी।
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आनंदजी-मनोज कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म 'नागिन' के गाने 'मन डोले मेरा तन डोले' में कल्याणजी को नागिन बजाने की क्या कहानी है?

उन दिनों क्लेवियालिन नामक एक नया इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रूमेंट आया था। पहली बार इस इंस्ट्रूमेंट का प्रयोग साउथ की फिल्म 'नागपंचमी' में किया गया था। इस इंस्ट्रूमेंट को मेरे बड़े भाई साहब भी बजाते थे। जब 'नागपंचमी' फिल्म रिलीज हुई तो निर्देशक नंदलाल जसवंतलाल ने सोचा कि क्यों न पूरी फिल्म ही नाग पर बनाई। फिर ‘नागिन’ का निर्माण शुरू हुआ। इस फिल्म का संगीत हेमंत कुमार ने दिया था और इस फिल्म में पहली बार नागिन बीन मेरे बड़े भाई कल्याणजी ने बजाई थी। इस फिल्म के पांचों गाने बिनाका गीतमाला में खूब बजे।  

 

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कल्याणजी-लता मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आप लोगों की संगीतकार के तौर पार शुरुआत कैसे हुई और पहली फिल्म में मौका कैसे मिला?

निर्माता-निर्देशक मनमोहन देसाई के बड़े भाई सुभाष देसाई फिल्म उन दिनों 'सम्राट चन्द्रगुप्त' का निर्माण कर रहे थे। उन्होंने भाई साहब को कई जगह क्लेवियोलिन देखा था। सुभाष देसाई ने ही अपनी फिल्म में संगीत का मौका दिया। इस तरह से संगीतकार के तौर पर 'सम्राट चंद्रगुप्त' से हमारी शुरुआत हुई। मैं भी साथ में जुड़ गया। इस फिल्म का गीत 'चाहे पास हो चाहे दूर हो' चल पड़ा। यह गाना बहुत लोकप्रिय हुआ। उस जमाने के लोग आज भी उस गीत को बहुत याद करते हैं। धीरे धीरे गाने चलने लगे तो हमें लगा कि अब यह काम करना चाहिए।

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कल्याणजी,आनंदजी,राज कपूर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राजकपूर की फिल्मों में से जुड़ना कैसे हुआ क्योंकि उनकी फिल्मों में तो शंकर-जय किशन का ही संगीत रहता था?

सुभाष देसाई अपने छोटे भाई मनमोहन देसाई को निर्देशक के रूप में स्थापित करना चाह रहे थे। उन्होंने तय किया कि एक फिल्म राज कपूर के साथ, एक दिलीप कुमार के साथ और एक फिल्म शम्मी कपूर के साथ बनानी है। सभी फिल्मों में संगीत के लिए हमें जिम्मेदारी मिली। राजकपूर की फिल्मों में शंकर-जय किशन का संगीत होता था और मुकेश गीत गाते थे। राज कपूर ने कहा कि गाने मुकेश गाएंगे और उसी स्टाइल में होंगे जिस तरह से वह गाते हैं, लेकिन इस फिल्म में संगीतकार के तौर पर दोनों भाइयों का नाम कल्याणजी आनंदजी डाल देते हैं। यहां से हमारी जोड़ी का नाम कल्याणजी आनंदजी पड़ा। इससे पहले संगीतकार के तौर पर बड़े भाई साहब का ही नाम पोस्टर पर जाता था, कल्याणजी  वीरजी शाह के नाम से। वीरजी शाह हमारे पिता का नाम है। 'छलिया' से पहले फिल्म 'मदारी' का गीत 'दिल ढूंढने वाले जादूगर' खूब लोकप्रिय हुआ था।

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आनंदजी,कल्याणजी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, राज कपूर की दुखांत प्रेम कहानी पर बने गीत का किस्सा क्या है?  

उन दिनों राज कपूर और नरगिस के बीच ब्रेकअप हो गया है। हमने न्यूज पेपर में पढ़ा था। हमें लगा कि अब इसका क्या होगा?  उसी समय दिल से एक बात निकल कर आ गई कि 'मेरे टूटे हुए दिल से कोई तो आज ये पूछे कि तेरा हाल क्या है'। मैंने इसे  लिख कर ऐसे ही रख लिया था। जब राज कपूर के साथ फिल्म 'छलिया' शुरू हुई तो हमने उनको बताया कि  एक गाना आपके लिए सोच कर रखा था। मैने उनको बताया कि जब आपका ब्रेकअप हुआ तो पता नहीं आपको क्या फीलिंग हुई होगी? लेकिन हमने उसी समय यह गाना लिख लिया था। उनको वह गाना बहुत पसंद आया।

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कल्याण,मुकेश,नितिन मुकेश - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म 'छलिया' में आपने मुकेश से 'डम डम डिगा डिगा' गवाकर उनकी गायकी में एक नया प्रयोग भी किया..

आदमी जो करता रहा है उसी का ब्रांड बन जाता है। इसके अलावा उसके अंदर और क्या खूबियां हैं खुद को पता नहीं चलता। उन दिनों फास्ट गाने का दौर आने लगा था। मुकेश जी को लगता था कि वह बहुत ही इत्मीनान से, धीमे गाते हैं, फास्ट गाने नहीं गा सकते। इस तरह के गानों के लिए राज कपूर जी अपनी फिल्मों में मन्ना डे को बुला लेते थे। हमने ही ये गाना मुकेश जी से गवाने का सुझाव दिया। मुकेश जी ने कहा कि वह इस तरह के गाने नहीं गाते। हमने कहा, मुकेश गाता नहीं, यह किसने बोला? कोई गवाता नहीं है। किसी ने गवाया नहीं, इसलिए आपने नहीं गाया। मैंने उनसे ये गाना गाने की दरख्वास्त की। शुरू में तो बहुत धीमे अंदाज में ही उन्होंने ये गाना गाया। लेकिन मैं धीरे-धीरे उनको गरम करता गया और फिर पूरे जोश में आकर वह खुद बोले, यह हो सकता है। हमने कहा कि हो सकता है, इसीलिए तो गवा रहे हैं।

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आनंदजी, राज कपूर,कल्याणजी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, महेंद्र कपूर से आपने दिलीप कुमार के लिए गवाया?

हमने महेंद्र कपूर से 'मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती' फोक स्टाइल में गवाया था। फिर मैने दिलीप कुमार की फिल्म 'गोपी' में उनसे गवाने के लिए सोचा। इससे पहले दिलीप कुमार की फिल्मों में महेंद्र कपूर ने कभी नहीं गया था। फिल्म के प्रोड्यूसर ने इस पर सवाल भी उठाया। तब मैंने उनको समझाया और इस तरह से 'गोपी' में हमने महेंद्र कपूर से 'रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलजुग आएगा..' गवाया। दिलीप कुमार को भी यह गाना बहुत अच्छा लगा।

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आनंदजी-आशा भोसले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संख्या की बात करें तो आप लोग इकलौते संगीतकार रहे जिन्होंने लता मंगेशकर और आशा भोसले दोनों से बराबर का काम लिया। लताजी से जुड़ी कोई खास यादें?

मैंने आशा भोसले से बहुत सारे कैबरे गीत गवाए हैं, लेकिन जब 'मुकद्दर का सिकंदर' के गाने ‘ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना' के फीमेल वर्जन की बात आई तो लोगों के दिमाग में यही आया कि इसे लता जी से बेहतर कोई नहीं गा सकता। लेकिन, मैंने आशा जी को समझाया कि इस तरह के गाने आप भी गा सकती हैं। फिर इस गाने को आशा जी से गवाया।

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कल्याण,आनंद,किशोर कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, किशोर कुमार की गायकी को लेकर क्या कहना चाहेंगे?

वह सदाबहार गायक थे। वह भी ज्यादा सीखे नहीं थे हमारी तरह। सिर्फ देखकर सुनकर वह काम करते थे। वह आम जीवन से जुड़े किरदार को ध्यान में रखकर गाते थे। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी। थे हमें वह हमेशा महाराज कहकर ही बुलाते थे। जब हम लोग 'डॉन' का म्यूजिक दे रहे थे तो लोग पूछते थे कि ये डॉन का मतलब क्या होता है। मराठी में इसे लोग दोन कहकर पढ़ते और मराठी में इसका मतलब दो होता है। लोग अपनी अपनी भाषा के हिसाब से इस शब्द का मतलब निकाल रहे थे। किशोर कुमार ने भी पूछा कि इस शब्द मतलब क्या होता है? बस, इसी बात से हमें मौका मिल गया कि एक गाना बनाने का, 'अरे दीवानों मुझे पहचानो, कहां से आया, मैं हूं कौन? मैं हूं डॉन, मैं हूं डॉन, मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं डॉन'।

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कल्याणजी-आनंदजी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

किशोर कुमार के लेन-देन के किस्से बहुत मशहूर रहे हैं उनके, आपके साथ कभी कोई दिक्कत आई?

मैंने एक बार किशोर कुमार से पूछा था कि पैसों को लेकर पहले से ही इतनी चिंता क्यों करते हो। पैसे तो मिल ही जाएंगे। तब उन्होंने बताया, ‘शुरू शुरू में मेरे बंगाली रिश्तेदार गाना गवाते थे और गाना गवाने के बाद मिठाई का डिब्बा पकड़ा कर चल देते थे। फिर मैंने अपना दिमाग चलाया। रिकॉर्डिंग में चला जाता था और गला खराब होने का बहाना बनाकर चला आता था। प्रोड्यूसर पूछता था क्या होगा अचानक, गला कैसे खराब हो गया? तो मेरा सेक्रेटरी बोलता कि जब तक पहले पैसे नहीं मिलते, गला ठीक नहीं होता है।’ हमारे साथ तो उनका बहुत ही मित्रवत व्यवहार था। कभी कोई समस्या आई भी तो कल्याण जी भाई उनको समझा देते थे कि ज्यादा पैसा कमाना है तो कुछ और काम करना पड़ेगा। उन दिनों एक गाने के पांच से सात हजार रुपये मिलते थे। कल्याणजी भाई ने ही उन्हे स्टेज शो करने की सलाह दी।

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आनंदजी,प्रकाश,मन्ना डे - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपने मन्ना डे की गायकी के साथ भी खूब प्रयोग किए। 'उपकार' में 'कसमें वादे प्यार वफा' और 'जंजीर' में चार्टबस्टर कव्वाली 'यारी है ईमान मेरा'...

फिल्म 'उपकार' का गाना 'कसमें वादे प्यार वफा' ऐसा  गाना है जिसे किरदार अपने लिए गा रहा है। तो, वह चिल्लाकर नहीं गाएगा। मन्ना डे के गाए गीत 'ए मेरे प्यारे वतन' से प्रभावित होकर हमने यह गाना बनाया था। 'जंजीर' का गाना एक अलग ही पठानी स्टाइल का था। इस तरह के प्रयोग तो हमने बहुत किए हैं। धर्मेंद्र कभी म्यूजिकल हीरो नहीं रहे। वह फाइटर मैन हैं। लेकिन हमारे तीन चार गाने उनके साथ भी सुपरहिट हो गए। चाहे वह फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' का गीत 'मुझको इस रात की तन्हाई में' हो या फिल्म 'कहानी किस्मत की' का 'रफ्ता रफ्ता देखो आंख मेरी लड़ी है', या फिर फिल्म 'ब्लैकमेल' का गीत 'पल पल दिल के पास' हो। धर्मेंद्र की किस्मत देखिए वह म्यूजिकल हीरो नहीं हैं, लेकिन इस गाने की वजह से उन्हें खूब लोकप्रियता मिली। प्राण जी को पांच छह गाने हमारे मिले जिसमें 'कसमें वादे प्यार वफा', 'यारी है ईमान मेरा', 'हम बोलेगा तो बोलेगा कि बोलता है' और 'दो बेचारे बिना सहारे' शामिल हैं। 

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जब जब फूल खिले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म 'जब जब फूल खिले' आपके करियर की पहली रंगीन फिल्म थी और आपकी जोड़ी संगीतकार के तौर पर इस फिल्म से स्थापित हो गई, इस फिल्म से जुड़ी कुछ यादें?

हम दोनों भाइयों में थोड़ा सा फर्क था। बड़े भाई क्लासिकल गाने बहुत ही अच्छी तरह से संगीतबद्ध करते थे। मेरा नजरिया  हमेशा लोक संगीत पर रहता था जैसे कि उत्तर प्रदेश का लोक संगीत क्या है? महाराष्ट्र और गुजरात के लोक संगीत की क्या खासियत है। किस वजह से लोक संगीत में बदलाव आता है, दिन के गाने अलग क्यों होने चाहिए और अगर रात के गाने होंगे तो वह कैसे होंगे? इस बात को ध्यान में रखकर गाने बनाते थे। फिल्म 'जब जब फूल खिले' की खासियत यही है कि इसमें हमने लोक संगीत को ज्यादा तवज्जो दी। यही वजह है फिल्म का गीत 'परदेसियों से ना अखियां मिलाना' या फिल्म का और कोई गीत हो, लोग आज भी याद करते हैं।  
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आनंदजी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार आपको फिल्म 'सरस्वतीचंद्र' के लिए मिला। इस फिल्म के संगीत के बारे में कुछ बताइए।

'जब जब फूल खिले' के बाद रंगीन फिल्मों का दौर शुरू हो गया था। ‘सरस्वतीचंद्र’ ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म थी। पिताजी कहा करते थे कि कोई भी काम आए, उसे मना नहीं करना है। जब ‘सरस्वतीचंद्र के प्रोड्यूसर विवेक और निर्देशक गोविन्द सरैया ने बताया कि इसे ब्लैक एंड व्हाइट में बनाना है तो हमें लगा कि ये लोग पागल हो गए हैं क्या? उन्होंने बस इतना कहा कि कहानी पुरानी है तो ब्लैक एंड व्हाइट में ही बनेगी। हमने सोचा कि फ्लॉप होने को तो रंगीन फिल्म भी हो सकती है। इस फिल्म को करके देखते हैं, यह फिल्म गुजराती उपन्यास पर आधारित है। 'चंदन सा बदन', 'फूल तुम्हे भेजा है खत में' जैसे फिल्म के सभी गाने खूब लोकप्रिय हुए। ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’ गीत का भी एक कमाल का किस्सा है। एक लड़की ने  लिपस्टिक से दिल बनाकर एक फूल के साथ मुझे पत्र भेज दिया। मैंने अपनी पत्नी को दिखाया कि कोई पागल लड़की दिखती है जिसने यह भेजा है। इतने में गीतकार इंदीवर जी आ गए। बोले, यह पत्र तुम लोगों के लिए नहीं मेरे लिए है। इसपर गाना बन सकता है 'फूल तुम्हे भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है'...!
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