रवींद्र दुबे
एक अलग ही दुनिया है, जहां गोली है, खून है, पैसा है, रूतबा है और रिश्ता भी है, लेकिन कानून के खिलाफ है। बॉलीवुड अभिनेताओं ने जब-जब लोगों की हत्याएं कीं, परदे पर जमकर खून बहाया। उनका नाम अंडरवर्ल्ड से जुड़ा तो खूब तालियां बजीं और खूब पैसे बरसे। वैसे बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड के किरदार हमेशा से सफलता की गारंटी देते रहे हैं। सफलता के नए फार्मूले सामने आए। यह फार्मूला आज भी जिंदा है और अंडरवर्ल्ड के असली किरदारों की कहानियां नए सिरे से ढूंढी जा रही हैं। खबर है कि फिल्म 'रईस' के बाद और लगभग दो साल के सन्नाटे के बाद चार ऐसी फिल्में आ रही हैं, जो किसी न किसी देशी डॉन की जिंदगी पर आधारित है।
विज्ञापन
2 of 10
फाइल फोटो
- फोटो : file photo
अमिताभ बच्चन, दीवार
चार दशक से ज्यादा समय पहले, पटकथा लेखक सलीम जावेद की जोड़ी ने ‘दीवार’ जैसी फिल्मों के जरिये हिंदी फिल्मों में डॉन या गिरोह के सरगना के जीवन को जिस तरह महिमा मंडित किया है, उससे फिल्म निर्माता बॉक्स ऑफिस पर इस थीम के सफल होने के प्रति आश्वस्त हो गए और ऐसी फिल्में बहुतायत से बनने लगीं। या यूं भी कहा जा सकता है कि एक तरह से गैंगस्टर फिल्मों बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी हो गईं। कला तो कला है। वह हमेशा जिंदगी की नकल करती है।
अंडरवर्ल्ड जब समाज का एक अभिन्न अंग हो गया, तो उसका प्रतिबिंब फिल्मों में भी झलकने लगा। जिस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को महानायक बनाया, उसी का उदाहरण लें। ‘दीवार’ फिल्म में अमिताभ बच्चन का किरदार सत्तर के दशक में पनपे माफिया डॉन हाजी मिर्जा मस्तान से प्रेरित है। वह शुरू में मुम्बई की गोदी पर कुली का काम करता था और वहां से उठकर सोने चांदी की तस्करी करने लगा। यह और बात है कि मस्तान का अंत फिल्म के नायक जैसा नहीं हुआ। फिल्मी पंडितों का कहना है कि फिल्मों में अंडरवर्ल्ड के चरित्रों का प्रवेश इसी फिल्म से हुआ। इसके बाद तो यह सिलसिला चल निकला।
विज्ञापन
3 of 10
daddy
- फोटो : file photo
अर्जुन रामपाल, ‘डैडी’
‘डैडी’ और ‘हसीना पारकर’ इस शृंखला की नवीनतम फिल्में थीं। दोनों 2017 में रिलीज हुईं। ‘डैडी’ मुंबई के डॉन और दगड़ी चाल के बादशाह अरुण गवली पर बनी है। एक बार फिर दर्शकों ने एक ‘गैंगस्टर’ को देखा, जो बाद में राजनीति में आया और मुंबई के चिंचपोकली इलाके से विधायक भी चुना गया। हालांकि, यह एक अलग मुद्दा है वास्तविक जीवन में अरुण गवली कहीं से कहीं तक भी गैंगस्टर नहीं लगता।
अर्जुन रामपाल ने उसका किरदार बखूबी निभाया है। केंद्रीय मुंबई के ऊबड़-खाबड़ रास्तों और छोटी-छोटी गलियों से शुरू होती है अरूण गवली की दास्तान, जो अपनी तकदीर खुद लिखता हुआ भारत का सर्वाधिक खतरनाक गैंगस्टर बन जाता है। कामगार वर्ग के अपने आस-पास के लिए वह एक आधुनिक रॉबिनहुड है। उसका और एक पुलिस इंस्पेक्टर का संघर्ष उसे चार दशकों में कहां से कहां ले जाता है, यह इस फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है।
4 of 10
shraddha kapoor
- फोटो : file photo
श्रद्धा कपूर, ‘हसीना पारकर’
दूसरी ओर ‘हसीना पारकर’ दाऊद इब्राहिम की बड़ी बहन हसीना पारकर के जीवन पर आधारित है, जो दाऊद की गैर मौजूदगी में लोगों के संपत्ति से संबंधित झगड़े निपटाया करती है। 2007 में हसीना पारकर के खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट जारी होता है, जिसके बाद वह गायब हो जाती है। सुनवाई के दिन वह कोर्ट में आत्मसमर्पण कर देती है। हसीना पर एक बिल्डर से पैसा ऐंठने और दुबई में जा बसे अपने भाई के अवैध व्यापार की देखभाल करने का आरोप है, जिससे वह इनकार करती है। चूंकि कोई गवाह सामने नहीं आता, इसलिए जज उसे जमानत दे देता है।
श्रद्धा कपूर ने हसीना के चरित्र को पर्दे पर जिया और काफी हद तक अपनी भूमिका के साथ न्याय करने में सफल रहीं। मजेदार बात तो यह है कि हसीना के पति इब्राहिम पारकर की हत्या अरुण गवली गैंग के लोगों ने की थी। उन्होंने अरुण गवली के बड़े भाई पापा गवली की हत्या का बदला लिया था। यह भी एक संयोग ही है कि ये दोनों फिल्में एक ही साल कुछ समयांतर से रिलीज हुईं।
विज्ञापन
5 of 10
dayavan
- फोटो : social media
फिरोज खान, ‘दयावान’
अगर हाजी मस्तान किसी चरित्र की प्रेरणा हो सकता था, तो मुंबई पर दो दशक यानी 1960 से 1980 तक राज करने वाला वरदराजन मुदलियार क्यों नहीं होता। फिरोज खान की ‘दयावान’ के नायक का चरित्र पूरी तरह वरदराजन मुदलियार के चरित्र पर आधारित था। मुदलियार का मुख्या धंधा अवैध शराब का था, जिसकी कई भट्टियां उन दिनों मुंबई के उपनगरों में हुआ करती थीं।
लेकिन इस फिल्म में उसे तस्करी करते दिखाया गया है। इस फिल्म में गॉडफादर का भी पुट है। लोग अपने-अपने मसले और समस्याएं लेकर नायक के पास आते हैं, जिनका वह फैसला करता है। वह गरीब लोगों का मसीहा भी है, जो हर तरह से उनकी मदद करता है। बाद में 1983 में बनी ‘अर्ध सत्य’ के खलनायक रामा शेट्टी के चरित्र में भी वरदराजन मुदलियार का समावेश किया गया था। बाद में विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ में नाना पाटेकर द्वारा अभिनीत अन्ना का किरदार भी मुदलियार से ही प्रेरित बताया जाता है।
विज्ञापन
6 of 10
Satya
- फोटो : social media
मनोज वाजपेयी, सत्या
जब यह स्पष्ट हो गया कि अंडरवर्ल्ड के चरित्रों पर बनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट होती हैं, तो फिर ऐसी अनेकों फिल्में बनीं। और मांजरेकर की ‘वास्तव’ के नायक रघु पर भी छोटा राजन का असर देखा जा सकता है। दरअसल, गिरोहबाजी की फिल्मों का सही मतलब समझाया रामगोपाल वर्मा ने। उन्होंने अंडरवर्ल्ड या गैंगस्टर फिल्म को बॉलीवुड में पूरी तरह स्थापित कर दिया। ‘सत्या’ (1999) और ‘कंपनी’ (2002) ने सारे आदर्श नियमों और एंटी-हीरो या विलेन के आस-पास के सिद्धांतों को ताक पर रख दिया। इन फिल्मों में कैमरा अंधेरी गलियों में ही नहीं, बल्कि अंधेरे चरित्रों पर भी घूमता है। ‘सत्या’ में भीखू म्हात्रे का किरदार भी अरुण गवली पर ही आधारित बताया जाता है।
विज्ञापन
7 of 10
Company
- फोटो : social media
अजय देवगन, कंपनी
2002 में आई ‘कंपनी’ में मलिक (अजय देवगन) माफिया डॉन असलम भाई का आदमी है, जो एक सरफिरे चंद्रकांत (विवेक ओबेरॉय) को अपने गिरोह में भर्ती कर लेता है। दोनों मिलकर काफे कहर बरपा करते हैं और अपने सब दुश्मनों को मौत के घाट उतार देते हैं। मुंबई में उनका आतंक छा जाता है। जैसे-जैसे उनके साम्राज्य का विस्तार होता है, दोनों एक-दूसरे से अलग होते चले जाते हैं। दरअसल, यह फिल्म माफिया सरगना दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन की दुश्मनी पर आधारित है। इस फिल्म में मलिक (अजय देवगन) का चरित्र दाऊद इब्राहीम पर और चंद्रकांत (विवेक ओबेरॉय) का किरदार छोटा राजन पर आधारित है।
8 of 10
shootout at lokhandwala
- फोटो : social media
विवेक ओबेरॉय, ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’
‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ में तो दाऊद इब्राहीम के लिए काम कर रहे एक मामूली से प्यादे माया डोलस को लाखों में खेलते दिखाया गया है। माया का किरदार विवेक ओबेरॉय ने बखूबी निभाया है। 1991 में गर्मी के एक दिन मुंबई स्थित लोखंडवाला कॉम्पलेक्स की स्वाती बिल्डिंग के फ्लैट 32 बी में पांच अपराधी 70 लाख रुपया गिन रहे थे तब एसीपी. खान के नेतृत्व में 286 पुलिसकर्मियों ने बिल्डिंग के बाहर अपनी पोजीशनें ले लीं। गोलीबारी हुई और पूरे देश ने छह घंटों तक दिनदहाड़े चलने वाला बहुचर्चित एनकाउंटर देखा, जिसने उपनगरीय मुंबई को एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया। बाद में खान के खिलाफ मनवाधिकारों के उल्लंघन के सिलसिले में एक विभागीय जांच हुई।
9 of 10
shootout at wadala
- फोटो : social media
जॉन अब्राहम, तुषार कपूर, सोनू सूद, मनोज वाजपेयी
महेंद्र उर्फ माया डोलस और उसके निशानेबाज साथी दिलीप बुवा ने 90 के दशक की शुरुआत में जबरिया वसूली को आम बात बना दिया था। ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ की सफलता ‘शूटआउट एट वडाला’ (2013) की प्रेरणा साबित हुई। दरअसल, ‘शूटआउट एट वडाला’ मुंबई पुलिस द्वारा अंडरवर्ल्ड के खिलाफ पहले पुलिस एनकाउंटर की कहानी है। ये दोनों फिल्में सीरियल क्वीन एकता कपूर ने बनाई हैं। मनोहर अर्जुन सुर्वे उर्फ मन्या सुर्वे कॉलेज का एक छात्र है, जो विद्या से प्रेम करता है। वह अपने सौतेले भाई भार्गव और अपनी मां के साथ रहता है।
भार्गव एक स्थानीय गुंडा है। एक दिन उसका किसी दुसरे गुंडे से झगड़ा होता है, जो उसके हाथों मारा जाता है। पुलिस इंस्पेक्टर अम्बोलकर मन्या को घटनास्थल पर मौजूद होने के कारण कॉलेज से गिरफ्तार कर जेल में डाल देता है, जहां भार्गव को एक गुंडा मार देता है और शेख मुनीर ( तुषार कपूर) मन्या को बचा लेता है। वे दोनों जेल से भागकर मुंबई वापस आ जाते हैं और जुबेर (मनोज वाजपेयी) के गिरोह में शामिल होने की कोशिश करते हैं। जुबेर का भाई दिलावर (सोनू सूद) उनकी खिलाफत करता है। तब मन्या शेख मुनीर और तीन अन्य के साथ अपना गिरोह बनाता है और मुंबई में इतना कहर बरपा कर देता है कि पुलिस को उसे रोकने के लिए रास्ता निकालना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि हाजी मिर्जा मस्तान का चरित्र सिर्फ ‘दीवार’ में ही इस्तेमाल हुआ है।
अजय देवगन, इमरान हाशमी
एकता कपूर निर्मित ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई’ में सुलतान मिर्जा ( हाजी मस्तान) का किरदार अजय देवगन ने निभाया है और इमरान हाशमी ने शोएब खान (दाऊद इब्राहीम) का। यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और इसी से प्रेरित होकर एकता कपूर ने ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा’ भी बनाई। दोनों ही फिल्में सफल रहीं।