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Studios Of Bombay 3: आउटसाइडर्स का पसंदीदा ठिकाना फिल्मालय स्टूडियो, इन दिग्गज कलाकारों को यही मिले पहले मौके

Sun, 30 Apr 2023 07:44 PM IST
साक्षी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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सशधर मुखर्जी और फिल्मालय स्टूडियो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी, मराठी और भोजपुरी सिनेमा का गढ़ माने जाने वाले शहर मुंबई के फिल्म स्टूडियोज के बनने बिगड़ने की कहानी किसी फिल्म की तरह ही दिलचस्प है। प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई वेब सीरीज 'जुबली' की कहानी बॉम्बे टॉकीज के उत्थान और पतन की कहानी है। मुंबई जब बंबई था, उस दौर में बने फिल्म स्टूडियोज के बारे में हम आपको सिलसिलेवार तरीके से बता रहे हैं। पिछली दो कड़ियों में आपने जानी कहानी बॉम्बे टाकीज और फिल्मिस्तान स्टूडियो की। आज बारी फिल्मालय स्टूडियो की।

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फिल्मालय स्टूडियो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्मालय स्टूडियो वाया फिल्मिस्तान

फिल्मालय स्टूडियो के संस्थापक सशधर मुखर्जी भी पहले बॉम्बे टॉकीज से जुड़े रहे। साल 1940 में हिमांशु राय की मृत्यु के बाद सशधर मुखर्जी ने साल 1943 में में अशोक कुमार, ज्ञान मुखर्जी और संगीतकार के मदन मोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल के साथ साझेदारी में गोरेगांव में फिल्मिस्तान स्टूडियो की शुरुआत की। फिल्मिस्तान स्टूडियो में उन्होंने देव आनंद को लेकर 'मुनीम जी' और 'पेइंग गेस्ट' का निर्माण किया। इन दोनो फिल्मों का निर्देशन उनके छोटे भाई सुबोध मुखर्जी ने किया। फिल्मिस्तान में ही सशधर मुखर्जी ने शम्मी कपूर को लेकर फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' का निर्माण किया जिसे नासिर हुसैन ने निर्देशित किया था। फिर, साल 1950 में सशधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान स्टूडियो से अलग होकर अंधेरी पश्चिम में फिल्मालय स्टूडियो की स्थापना की।

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फिल्मालय स्टूडियो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सशधर मुखर्जी का वंशवृक्ष
अंधेरी रेलवे स्टेशन से निकलकर एसवी रोड पर आने के बाद दाहिनी तरफ करीब एक किमी चलने के बाद अंबोली की तरफ जो रास्ता बाईं तरफ मुड़ता है, उसी रास्ते पर थोड़ी दूर चलकर आता है फिल्मालय स्टूडियो। इस स्टूडियो के तहत सशधर मुखर्जी ने 'दिल देके देखो', 'लव इन शिमला', 'एक मुसाफिर एक हसीना' और 'लीडर' जैसी कई सफल फिल्मों का निर्माण किया। झांसी के रहने वाले सशधर मुखर्जी चार भाई थे, उनके बड़े रविंद्र मोहन मुखर्जी का फिल्म उद्योग से बहुत कम संपर्क था। रानी मुखर्जी उनको पोती हैं। सशधर मुखर्जी के छोटे भाई फिल्म निर्देशक सुबोध मुखर्जी और फिल्म निर्माता प्रबोध मुखर्जी थे। सशधर मुखर्जी के चार बेटे हुए, जॉय मुखर्जी, देब मुखर्जी, शोमू मुखर्जी और शुबीर मुखर्जी थे। देब मुखर्जी की दूसरी पत्नी के बेटे अयान मुखर्जी हैं। अभिनेत्री काजोल के पिता शोमू थे।

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फिल्मालय स्टूडियो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

बिखर गया सशधर का साम्राज्य

एक जमाने में फिल्मालय स्टूडियो में खूब रौनक हुआ करती थी। इस स्टूडियो से बहुत सारी यादें जुड़ी हुई हैं जिसे हम आगे शेयर करेंगे। इससे पहले हम फिल्मालय स्टूडियो की आज की दशा के बारे में बता दें। इस स्टूडियो के एक तिहाई भाग पर गगनचुंबी इमारत बन चुकी है और स्टूडियो के एक हिस्से में स्टूडियो का बस एक फ्लोर बचा हुआ है जहां पर शूटिंग होती रहती है। इसके अलावा बिल्डिंग के बेसमेंट और तीसरे मंजिल पर शूटिंग का एक फ्लोर है। ग्राउंड फ्लोर में मेकअप रूम और पहली मंजिल पर स्टूडियो का ऑफिस और मेकअप रूम हैं।

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उषा खन्ना - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राजा मेहंदी हसन और उषा खन्ना का डेब्यू

फिल्मालय स्टूडियो के बैनर तले सशधर मुखर्जी ने कई यादगार फिल्में बनाईं। वह एक ही नजर में किसी भी कलाकार की प्रतिभा का आकलन करके उसे सही मार्ग दर्शन भी देते थे। मशहूर गीतकार, कवि और लेखक राजा मेहंदी हसन फिल्मों में हीरो बनने आए थे, लेकिन सशधर मुखर्जी ने उन्हें गीतकार बनने की सलाह दी और गीतकार के रूप में राजा मेहंदी हसन ने फिल्मिस्तान स्टूडियो की फिल्मों 'दो भाई' और 'शहीद' से अपने करियर की शुरुआत की। मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर उषा खन्ना भी सिंगर बनने आई थी, लेकिन सशधर मुखर्जी ने ही उन्हें संगीतकार बनने का सुझाव दिया और पहला मौका भी दिया फिल्म 'दिल देके देखो' में।

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लता मंगेशकर और आशा भोसले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

लता मंगेशकर को मिला पहला मौका

हास्य अभिनेता महमूद को सबसे पहला मौका सशधर मुखर्जी ने फिल्म 'किस्मत' में दिया था। इस फिल्म में महमूद ने अशोक कुमार के बचपन का रोल निभाया था। उन दिनों सशधर मुखर्जी बॉम्बे टॉकीज में थे। किशोर कुमार पहले बहुत बेसुरा गाते थे। अभिनेता अशोक कुमार और उनके बहनोई सशधर मुखर्जी ने ही उन्हें सुर में गाने के लिए प्रेरित किया। किशोर कुमार पहले बॉम्बे टॉकीज की फिल्मों में कोरस गाते थे। बतौर गायक उनको पहला मौका सशधर मुखर्जी  ने साल 1946 में रिलीज फिल्म 'शिकारी' में दिया था। इस फिल्म के संगीतकार एस डी बर्मन थे। यह फिल्म फिल्मिस्तान स्टूडियो के बैनर तले बनी थी। स्वर कोकिला लता मंगेशकर को भी हिंदी सिनेमा में सबसे पहले मौका 1947 में रिलीज फिल्म 'शेरनी' में सशधर मुखर्जी ने दिया। इस फिल्म में लता मंगेशकर ने सिर्फ दो लाइनें गाईं जिनके बोल थे, 'जवानी की रेल चली जाए रे'।

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संजीव कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संजीव, साधना और आशा पारेख

फिल्मालय स्टूडियो के साथ साथ सशधर मुखर्जी ने इसी कैंपस में एक्टिंग स्कूल भी चलाया। आशा पारेख, साधना और संजीव कुमार जैसे कई सितारों ने फिल्मालय एक्टिंग इंस्टीट्यूट से एक्टिंग सीखी है। सशधर मुखर्जी ने संजीव कुमार को सबसे पहला मौका फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' में दिया था। इस फिल्म में संजीव कुमार ने इंस्पेक्टर की छोटी सी भूमिका निभाई थी। धर्मेंद्र को सशधर मुखर्जी ने 'लव इन शिमला' के लिए ट्रेन का टिकट भेज के ऑडिशन के लिए बुलाया था लेकिन धर्मेंद्र इस फिल्म के लिए सिलेक्ट नहीं हुए तो उन्होंने अपने बेटे जॉय मुखर्जी को फिल्म 'लव इन शिमला' में लांच कर दिया। धर्मेंद्र को सशधर मुखर्जी ने साल 1961 में रिलीज फिल्म 'शोला और शबनम' में मौका दिया हालांकि इससे पहले धर्मेंद्र को अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' मिल चुकी थी।

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देव आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जब देव आनंद को फिल्म से निकाला 

और अब किस्सा भारत सरकार का सर्वोच्च सिनेमा सम्मान पाने वाली अभिनेत्री आशा पारेख का। फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' में सशधर मुखर्जी ने आशा पारेख को रिजेक्ट करके राजेंद्र कुमार के साथ अमिता को कास्ट कर लिया था। इसी तरह से 'अनारकली' में राजकुमार और शम्मी कपूर को रिजेक्ट करके प्रदीप कुमार को कास्ट किया। फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' में जब देव आनंद ने फिल्म की हीरोइन के साथ काम करने से मना कर दिया तो सशधर मुखर्जी ने देव आनंद को ही फिल्म से हटाकर शम्मी कपूर को कास्ट कर लिया। उस समय शम्मी कपूर के सितारे गर्दिश में चल रहे थे। फिल्म के निर्देशक नासिर हुसैन भी फिल्म में शम्मी कपूर को लेने के पक्ष में नहीं थे लेकिन सशधर मुखर्जी ने फिल्म में शम्मी कपूर को मौका दिया और यह फिल्म सफल रही।

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फिल्मालय स्टूडियो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

काम किया और नाम लेने से बचते रहे

अभिनेत्री साधना का हेयर कट स्टाइल भी फिल्मालय स्टूडियो से ही मिला था। आज भी साधना के हेयर स्टाइल की चर्चा होती है। सशधर मुखर्जी को पुरस्कारों में विश्वास नहीं था, उन्होंने साल 1953 में रिलीज फिल्म 'जागृति' के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार लेने से मना कर दिया था। 1967 में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया। सशधर मुखर्जी फिल्म के क्रेडिट्स में अपना नाम देने से भी बचते थे और अपनी जगह अपनी टीम के साथियों एन आर आचार्य और ज्ञान मुखर्जी आदि का नाम दे दिया करते थे।

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