फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

घर से भागकर मुंबई में गुंडागर्दी करता था ये एक्टर, ऐसे बना फिल्मों का 'लॉयन'

Mon, 27 Jan 2020 04:48 AM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 6
Ajit Khan - फोटो : सोशल मीडिया
'लेकिन एक बात मत भूलिये डीएसपी साहब...कि सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है। और, इस शहर में मेरी हैसियत वही है, जो जंगल में शेर की होती है।' 
साल 1976 में रिलीज हुई फिल्म कालीचरण का ये डायलॉग सुनकर आज भी अभिनेता अजीत खान याद आते हैं। ये वो दौर था जब हीरो और विलेन बराबर की टक्कर के हुआ करते थे। तब तक विलेन का रूप बदल चुका था। न ही उसके गले रुमाल बंधा होता और न ही उसके बिखरे बाल होते। अजीत साहब के बोलने का अंदाज सधा था कि लोग उन्हें देखकर बस 'वाह' कह पाते। आज ही दिन 1992 में उनका जन्म हुआ था।
विज्ञापन

2 of 6
अजीत
हिंदी सिनेमा को शायद पहली बार एक ऐसा विलेन मिला था जो काफी सौम्य और प्रभावशाली ढंग से विलेन के किरदार को फिल्मी पर्दे पर जीवित कर देता था। अजीत का असली नाम हामिद अली खान था। वो बचपन से ही एक्टर बनना चाहते थे और इसी का सपना लिए वो घर से भागकर मुंबई आ गए थे। अजीत पर अपने इस सपने को पूरा करने का जुनून इस कदर सवार था कि उन्होंने अपनी किताबें तक बेच डाली थीं। 1940 में उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। कुछ समय तक उन्होंने बतौर हीरो फिल्मों में काम किया, लेकिन वो फ्लॉप रहे। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में विलेन की भूमिका निभाना शुरू कर दिया। 
विज्ञापन

3 of 6
अजीत
विलेन के तौर पर ना सिर्फ उनके किरदारों को सराहा गया बल्कि उनके कई डायलॉग और वन लाइनर जबरदस्त हिट हुए। आज भी जब अजीत के नाम का जिक्र होता है तो अनायास ही 'मोना डार्लिंग', 'लिली डोंट बी सिली' और 'लॉयन' जैसे डॉयलॉग जुबां पर आ जाते हैं। अजीत ने विलेन और उसके किरदार की ऐसी परिभाषा और लुक गढ़ा जो हमेशा के लिए हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया है।

4 of 6
अजीत
अजीत का फिल्मी सफर आसान नहीं रहा। मुंबई आने के बाद अजीत का कोई ठोस ठिकाना नहीं था। काफी वक्त तक उन्हें सीमेंट की बनी पाइपों में रहना पड़ा, जिन्हें नालों में इस्तेमाल किया जाता है। उन दिनों लोकल एरिया के गुंडे उन पाइपों में रहने वाले लोगों से भी हफ्ता वसूली करते थे और जो भी पैसे देता उसे ही उन पाइपों में रहने की इजाजत मिलती।
विज्ञापन

5 of 6
अजीत
एक दिन एक लोकल गुंडे ने अजीत से भी पैसे वसूलने चाहे। अजीत ने मना कर दिया और उस लोकल गुंडे की जमकर धुनाई की। उसके अगले दिन से अजीत खुद लोकल गुंडे बन गए। इसका असर ये हुआ कि उन्हें खाना-पीना मुफ्त में मिलने लगा और रहने का भी बंदोबस्त हो गया। डर की वजह से कोई भी उनसे पैसे नहीं लेता था।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
अजीत
अजीत ने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। नास्तिक, मुगल ए आजम, नया दौर और मिलन जैसी फिल्मों को अजीत ने अपने किरदार से सजाया। 22 अक्टूबर 1998 में अजीत ने हैदराबाद में अंतिम सांस ली। बॉलीवुड में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

आलिया ने कंगना को दी पद्मश्री की बधाई तो रंगोली बोलीं- बहुत मजा आ रहा है
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें