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EXCLUSIVE: अपने बदले किरदारों पर बोले अभिषेक ए बच्चन, ‘होश तो एक समय गुजरने के बाद ही आता है!’

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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिषेक बच्चन अब वह अभिषेक बच्चन नहीं रहे जो वह अपने करियर की शुरूआत में हुआ करते थे। अब उन्होंने अपना नाम अभिषेक ए बच्चन कर लिया है और पूरी कोशिश इस बात की कर रहे हैं कि लोग उन्हें उनके नाम की बजाय उनके काम से जानें। अभिषेक बच्चन से अमर उजाला के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की खास मुलाकात।
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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अपने करियर की पटरी बदलना कितना रास आ रहा है इन दिनों? काफी चुन चुन के रोल कर रहे हैं आप?
हां, और प्रयास भी यही है कि अब जो भी मैं कर रहा हूं वह पहले से अलग भी हो और मेरी उम्र के हिसाब से भी हो। जवानी में सबसे गलतियां होती हैं। उस समय जोश में काम होता है। होश तो एक समय गुजरने के बाद ही आता है। तो मैं इन दिनों वैसा ही कुछ काम कर रहा हूं जिसमें जोश से ज्यादा होश की जरूरत होती है।
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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेकिन, किरदारों के नाम तो आपके पहले भी काफी मशहूर हुए। ‘युवा’ का लल्लन लोग अब भी नहीं भूले हैं, ‘गुरु’ का गुरुकांत देसाई लोगों को याद है...
एक कलाकार को बस यही चाहिए होता है। और, उसे ज्यादा कुछ चाहिए भी नहीं होता। एक कलाकार को उसके किरदारों के नाम से लोग याद रखें यही उसके अभिनय का सबसे बड़ा इनाम होता है। मैं इरादतन ऐसे किरदार करना चाहता हूं जिसे लिखते समय सबसे पहले लेखक के मन में ही आए कि इस किरदार के साथ कोई न्याय कर सकता है तो वह होगा, अभिषेक बच्चन।

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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तो कभी किसी किरदार को करते समय ऐसा भी कुछ ख्याल जेहन में आता है कि ये किरदार कुछ कुछ मेरे उस फिल्म के किरदार जैसा है तो उसमें जो छूट गया हो, उसे इस फिल्म में पूरा करने की कोशिश रहती हो? जैस ‘युवा’ का लल्लन और ‘दसवीं’ का गंगाराम चौधरी!
नहीं, लल्लन और गंगाराम के किरदार एकदम अलग हैं। दोनों की शख्सियत पूरी तरह जुदा है। दोनों की कहानियों का भी एक दूसरे से कोई लेना देना नहीं है। तो इसमें किसी पहले के किरदार को बेहतर करने वाली बात नहीं है। लेकिन, हां। अगर हम किसी सीक्वल की बात करें तो ऐसा हो सकता है। पहली ‘धूम’ में जय दीक्षित का किरदार करते समय मुझसे जो चीजें छूट गईं उन्हें हमने इसकी सीक्वल में पूरा करने की कोशिश जरूर की है।  
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धूम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मुझे याद है कि ‘धूम’ का ट्रेलर देखने के बाद आपके पिता अमिताभ बच्चन ने ये फिल्म बनाने वाली कंपनी के मालिक यशराज चोपड़ा के सामने आपकी तारीफ की थी। कितने अच्छे समालोचक हैं आपके पिता आपके काम के बारे में?
मेरा अपने पिता से रिश्ता मित्रवत है। हम एक दूसरे के काम के बारे में आराम से बातें कर सकते हैं। वह मेरा काम देखते हैं और ऐसा नहीं है कि हर बार तारीफ ही करते हों। जहां उन्हें मेरे काम में कमी दिखती है, वह टोकते भी हैं। पास बिठाकर बताते भी हैं कि यहां कुछ ऐसा किया जाता तो बेहतर हो सकता था। वह एक अच्छे सकारात्मक समालोचक हैं। उनकी सलाह मैं मानता भी हूं।

और, माताजी?
मां तो बस मां ही होती है। उनको मेरा सारा काम अच्छा ही अच्छा लगता है।

 
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फिल्म- बिग बुल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपकी एक फिल्म ‘द बिग बुल’ के इन दिनों काफी चर्चे हैं। इस फिल्म का लीड किरदार करने के लिए कितनी तैयारियां करनी पड़ीं आपको?
इस किरदार के लिए मेरे पास सबसे पहले अजय देवगन का फोन आया था। उनके पास एक कहानी थी और उन्हें लगता था कि मैं इस रोल को अच्छे से कर सकता हूं। ये 2019 की बात है। फिर फिल्म के निर्देशक मेरे पास पटकथा लेकर आए। इसे पढ़ने के बाद मुझे भी लगा कि ये किरदार चुनौती भरा हो सकता है। मैं अब ऐसे ही किरदार करना चाहता हूं जिन्हें पढ़ने के बाद लोगों को मेरा नाम याद आए।
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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, ऐसा होता तभी है जब कहानी लिखने वालों को फोकस में रखा जाए..
जी बिल्कुल, अब कहानी ही तो स्टार है। अब लोगों को ऐसी कहानियां पसंद आ रही हैं जो वास्तविकता से जुड़ी हों। अब जो कहानियां दर्शक पसंद कर रहे हैं वे जीवन को बिल्कुल श्वेत और श्याम रंग में नहीं देखतीं। ये कहानियां जीवन की है। अच्छा है कि अब लेखक फिर से फोकस में आ रहे हैं और कहानियां की तरफ लोगों का ध्यान गया है। बदलता दौर वास्तविकता के करीब कहानियों का है, ‘द बिग बुल’ भी ऐसी ही एक कहानी है।

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अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन - फोटो : फाइल
बात लेखकों की निकली है तो अरसा पहले आपके पिता अमिताभ बच्चन ने अपने बाबूजी यानी हरिवंश राय बच्चन का स्मारक उत्तर प्रदेश में बनाने की बात मुझसे कही थी, क्या वह योजना अब भी सक्रिय है और आप ऐसी किसी योजना को लेकर कितना उत्साहित होंगे?
उत्तर प्रदेश हमारा अपना प्रदेश है। हमारा इससे खून का नाता है। जब भी मैं यहां आता हूं तो इसकी मिट्टी की खूशबू मेरा मन मोह लेती है। आपने बाबूजी की रचनाओं का संग्रह और उनकी प्रयोग की हुई वस्तुएं एक साथ किसी स्थान पर स्मारक के तौर पर रखने की जो बात कही, वह नि:संदेह एक अच्छा विचार है और ऐसे किसी विचार का हिस्सा बनने में मुझे खुशी ही होगी।
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फिल्म चेहरे के ट्रेलर का दृश्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आप निर्माता भी बन गए हैं, अमिताभ बच्चन की अगली फिल्म ‘चेहरे’ के आप निर्माता हैं? क्या बतौर कलाकार उन पर आपका जोर चल पाता है?
बिल्कुल, मैं एक निर्माता के तौर पर जब उनसे बात करता हूं कि फिल्म का बजट इतना ही है और हमें इतने में ही काम चलाना है, तो वह तुरंत मेरी बात मान जाते हैं।
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