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50 Years Of Zanjeer: ‘जंजीर’ की शूटिंग पर राज कपूर की भविष्यवाणी, प्रकाश मेहरा ने प्राण के नाम पर बेची फिल्म

सार

फिल्म ‘जंजीर’ का बनना, उसमें अमिताभ बच्चन का हीरो बनना, फिल्म के लिए किसी हीरोइन के तैयार न होने पर जया का सामने आना और फिर फिल्म में प्राण की बेहतरीन अदाकारी, ये सब अपने आप में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 
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जंजीर - फोटो : अमर उजाला
जी नेटवर्क के लिए सिनेमा के बेहतरीन सितारे अमिताभ बच्चन पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के दौरान उनसे जुड़े रहे तमाम दिग्गजों के इंटरव्यू मेरी टीम ने किए। प्रकाश मेहरा तब जीवित थे और उनसे बातचीत के दौरान किस्सा निकला फिल्म ‘जंजीर’ का। उन्होंने बताया, फिल्म की शूटिंग उन दिनों आर के स्टूडियो में चल रही थी। राज कपूर वहीं पास में कुछ काम कर रहे थे। शूटिंग पर अमिताभ बच्चन की आवाज उन्हें सुनाई दी तो उन्होंने प्रकाश मेहरा को मिलने का बुलावा भेजा। प्रकाश मेहरा बाहर आए, उनसे मिले तो खुद प्रकाश मेहरा के मुताबिक राज कपूर ने कहा, ‘इसकी आवाज में बहुत दम है। देखना ये लड़का एक दिन सुपरस्टार बनेगा।’ फिल्म ‘जंजीर’ ने ही अमिताभ बच्चन के लिए सोलो हीरो के तौर पर फ्लॉप का सिलसिला तोड़ा और वह बने हिंदी सिनेमा के पहले एंग्री यंगमैन। लेकिन, फिल्म ‘जंजीर’ का बनना, उसमें अमिताभ बच्चन का हीरो बनना, फिल्म के लिए किसी हीरोइन के तैयार न होने पर जया का सामने आना और फिर फिल्म में प्राण की बेहतरीन अदाकारी, ये सब अपने आप में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। तो चलिए, बताते हैं आपको फिल्म ‘जंजीर’ का बाइस्कोप जिसने अपनी रिलीज के 50 साल पूरे कर लिए हैं।
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जंजीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

12 फ्लॉप के बाद हुआ धमाका

11 मई 1973 को रिलीज से पहले अमिताभ बच्चन की 12 फिल्में फ्लॉप हो चुकी थीं और इन फिल्मों के बीच ‘बॉम्बे टू गोवा’ और ‘आनंद’ जैसी फिल्में उनके लिए तिनके का सहारा बनीं। अभिनेता धर्मेंद्र के पास फिल्म ‘जंजीर’ की कहानी इसके लेखकों सलीम-जावेद के जरिये पहुंची और धर्मेंद्र ने ही इसे खरीदा भी। धर्मेंद्र ये फिल्म मुमताज के साथ करने की बात निर्देशक प्रकाश मेहरा से तय कर चुके थे। धर्मेंद्र और प्रकाश मेहरा की दोस्ती हुई फिल्म ‘समाधि’ से। इस फिल्म में प्रकाश मेहरा ने धर्मेंद्र के साथ आशा पारेख और जया भादुड़ी को लिया था। धर्मेंद्र उन दिनों तीन तीन शिफ्ट में फिल्में कर रहे थे और ‘जंजीर’ की शूटिंग थोड़ा रुककर शुरू करना चाहते थे। प्रकाश मेहरा के सामने समस्या ये थी कि सुनील दत्त और राखी वाली उनकी पिछली फिल्म ‘आन बान’ ज्यादा चली नहीं थी और उन्हें ‘जंजीर’ छह महीने के भीतर शूट करके किसी तरह रिलीज कर देनी थी ताकि उनका करियर धीमा न पड़े। धर्मेंद्र इसके लिए तैयार नहीं हुए।
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जंजीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

धर्मेंद्र ने प्रकाश मेहरा को दी कहानी

‘जंजीर’ लंबे समय तक अटकी रही तो प्रकाश मेहरा एक दिन पूरे ताव में धर्मेंद्र के घर जा पहुंचे और आर पार की बातें करने लगे। धर्मेंद्र ने देखा कि कहीं फिल्म के चक्कर में दोस्ती न हाथ से निकल जाए तो उन्होंने अपने पैसे से खरीदी फिल्म ‘जंजीर’ की स्क्रिप्ट प्रकाश मेहरा को दे दी और ये भी छूट दे दी कि वह चाहें तो किसी दूसरे अभिनेता के साथ ये फिल्म बना सकते हैं। इसके बाद ये फिल्म देव आनंद से लेकर राजकुमार और दिलीप कुमार तक का चक्कर लगाकर अमिताभ बच्चन की झोली में गिरी। देव आनंद को फिल्म में अपने ऊपर चार पांच गाने चाहिए थे। राजकुमार चाहते थे कि फिल्म मद्रास में शूट हो। दिलीप कुमार को फिल्म के हीरो का किरदार ही नहीं जमा। फिल्म ‘जंजीर’ में धर्मेंद्र, मुमताज के अलावा जो तीसरे कलाकार साइन हुए थे, वह थे प्राण। प्राण ने ही प्रकाश मेहरा को फिल्म का उन्हीं दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ का वह फाइटिंग सीन देखने की सलाह दी, जिसमें अमिताभ चुइंगम चबाते हुए शत्रुघ्न सिन्हा की पिटाई करते हैं। प्रकाश मेहरा ने फिल्म देखी। अमिताभ बच्चन उन्हें जंच गए।

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जंजीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

मुमताज का हीरोइन बनने से इंकार

इधर प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को फिल्म ‘जंजीर’ के लिए साइन किया। उधर मुमताज ने ये फिल्म ये कहते हुए छोड़ दी कि वह शादी करने की योजना बना रही हैं और शूटिंग के लिए तारीखें नहीं दे सकतीं। हालांकि उन्होंने फिल्म छोड़ी थी अमिताभ बच्चन के साथ अपनी एक और फिल्म बंधे हाथ का हश्र देखकर। तब जाकर फिल्म में जया भादुड़ी की एंट्री हुई। फिल्म ‘जंजीर’ से ही अमिताभ का नाम अखबारों में एंग्री यंग मैन पड़ा। वह न किसी से बोलता था। न मुस्कुराता था और न ही ज्यादा किसी से मिलता जुलता था। दीवाली की रात एक हाथ में घोड़े वाला ब्रेसलेट पहने एक अपराधी के हाथों अपने माता पिता खो चुका विजय मनोवैज्ञानिक रूप से बचपन से ही भीतर भीतर घुटता रहता है। बड़ा होकर जब वह पुलिस की नौकरी करता है तो भी ज्यादा तीन पांच नहीं सुनता। जुए के अड्डे चलाने वाले शेर खान से उसका पंगा होता है तो वह वर्दी वाला ताना मार देता है। फिर विजय सादी वर्दी में शेर खान के इलाके में आता है और ये लड़ाई फिर दोस्ती में बदल जाती है। कहानी में ट्विस्ट आता है अमिताभ बच्चन के रिश्वतखोरी के आरोप में निलंबित होने से।

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जंजीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

इंदौर के डॉन से मिले अजीत

फिल्म ‘जंजीर’ में मशहूर अभिनेता अजीत ने तेजा का किरदार किया। उनका असली नाम हामिद अली खान था। उनके पिता  हैदराबाद के निजाम के यहां काम करते थे। इस फिल्म के लिए जब अजीत विलेन बने तो उन्होंने प्रकाश मेहरा से पूछा कि क्या कभी उन्होंने असल जिंदगी के माफिया डॉन से मुलाकात की है। अजीत ने उन्हें बताया कि असल जिंदगी के ये बड़े बड़े डॉन कभी चीखते चिल्लाते नहीं हैं। उनका सर्द लहजा ही काम कर जाता है। और, ऐसे ही इंदौर के एक डॉन का पता सलीम खान को भी मालूम था। सलीम और अजीत दोनों उससे मिले। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले अजीत ने लंबा वक्त इस डॉन के साथ गुजारा और उसके तौर तरीके सीखे। फिल्म में शेर खान का किरदार करने वाले प्राण ने भी इस फिल्म के लिए काफी कुछ तैयारियां कीं। फिल्म में उनका जो गेटअप है, वह उनका खुद का तैयार किया हुआ है। प्राण ने अपनी एक फिल्म का गेटअप कभी किसी दूसरी फिल्म में रिपीट नहीं किया। अगर लुक एक जैसा हुआ तो वह बोली बदल लेते थे। फिल्म जंजीर को बनाने में भी प्राण का ही सबसे बड़ा योगदान रहा। धर्मेंद्र और मुमताज के फिल्म छोड़ देने के बाद भी प्राण ने प्रकाश मेहरा का साथ नहीं छोड़ा। ये इसके बावजूद कि इस फिल्म को छोड़ने पर मनोज कुमार ने उन्हें दो फिल्में देने का लालच भी दिया था।

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जब परदे पर नाचे गुलशन बावरा

अभिनेता प्राण जुबान के पक्के इंसान के तौर पर मशहूर रहे हैं। लेकिन, फिल्म ‘जंजीर’ के अपने ऊपर फिल्माए गए गाने ‘यारी है ईमान मेरा, यार मेरा जिंदगी... ’ की शूटिंग के वक्त वह इतना गुस्सा हुए कि शूटिंग बीच में छोड़ घर चले गए। बाद में बड़ी मुश्किल से वह ये गाना करने को राजी हुए, पूरी फिल्म में इसी गाने के दौरान अमिताभ बच्चन थोड़ी देर के लिए परदे पर मुस्कुराते हैं। फिल्म में मन्ना डे का गाया ये गाना और लता मंगेशकर व मोहम्मद रफी का गाया गाना, ‘दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए’ सुपरहिट रहे। इस दोगाने में तो गाने के गीतकार गुलशन बावरा खुद नाच रहे हैं हारमोनियम बजाते हुए। फिल्म जंजीर में कुल पांच गाने हैं। इनमें से तीन गाने तो सुपर डुपर हिट रहे। चौथा गाना ‘दिलजलों का दिल जला के’ भी खूब बजा जिसे लिखा था फिल्म के निर्देशक प्रकाश मेहरा ने। फिल्म जंजीर में संगीत दिया था कल्याणजी आनंदजी ने।

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संगीत से लेकर पुरस्कार तक सियासत

बताते हैं कि फिल्म ‘जंजीर’ के गाने उन दिनों रेडियो पर तो खूब बज रहे थे लेकिन इनके रिकॉर्ड्स ढूंढने में लोगों को खूब परेशानी हुई। गानों के कैसेट्स बनने भी तब बस शुरू ही हुए थे भारत में। और कहते हैं कि उसी साल रिलीज हुई एक और सुपरहिट फिल्म के संगीतकारों ने बाजार से फिल्म ‘जंजीर’ के सारे रिकॉर्ड्स और कैसेट्स उठवा लिए थे। फिल्म ‘जंजीर’ के लिए अमिताभ बच्चन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार नामांकन भी मिला लेकिन ये अवार्ड उस साल गया ऋषि कपूर की झोली में फिल्म ‘बॉबी’ के लिए। कैसे उनको ये पुरस्कार मिला था, इसका खुलासा वह खुद अपनी आत्मकथा में कर चुके हैं। अमिताभ बच्चन को इस साल का फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पुरस्कार मिला था फिल्म ‘नमक हराम’ के लिए।

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जंजीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आम आदमी की आवाज

फिल्म ‘जंजीर’ को हिंदी सिनेमा की ट्रेंड सेटर फिल्म माना जाता है। ये फिल्म उस दौर में बनी जब हीरो परदे पर सिर्फ इश्क करता दिखाई देता। अपने आसपास समाज में हो रहे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अराजकता से वह लड़ता भी था तो बीच बीच में लौटकर अपनी माशूक के पास जरूर आ जाता था। यहां उसे बाकी दुनिया से कुछ लेना देना ही नहीं है। अपना घर तोड़ने की हद तक जाकर विजय खन्ना जमाने से भिड़ जाता है। एक बुजुर्ग के हाथ की खाली बोतल और उसके तीन बेटों की जहरीली शराब से मौत उसे चैन से जीने नहीं देती। फिल्म को समाज की सच्चाई से जोड़ने की ये कोशिश ही फिल्म ‘जंजीर’ की कामयाबी का असली राज है।

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जंजीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

प्राण के नाम पर बेची गई फिल्म

कुछ राज फिल्म ‘जंजीर’ के ऐसे भी हैं जो अमिताभ बच्चन को भी बहुत बाद में पता चले। फिल्म का कलकत्ता (अब कोलकाता) में प्रीमियर हुआ तो वहां इकट्ठा हुजूम प्राण की जय जयकार कर रहा था। फिल्म के वितरकों ने इसका प्रचार ही प्राण की फिल्म के तौर पर कर रखा था। इसे देख अमिताभ की आंखें नम हो आईं। प्रकाश मेहरा ने तब अमिताभ का कंधा दबाया और कहा, ‘पिक्चर खत्म होने दो। यही लोग थोड़ी देर में तुम्हारे नारे लगाते नजर आएंगे।’ 11 मई 1973 को फिल्म रिलीज हुई। इसकी कामयाबी मनाने अमिताभ और जया विदेश जाना चाहते थे। दोनों को घर वालों की इसके लिए मंजूरी भी मिल गई लेकिन शर्त यही थी कि पहले दोनों शादी करेंगे और फिर साथ में विदेश जाएंगे। सो 3 जून 1973 को दोनों की हुई और फिर दोनों ने मनाया फिल्म ‘जंजीर’ का जश्न। 
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