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Apna Adda 23: पहली ही फिल्म में ओडिशा की इस छोरी ने जड़ा सिक्सर, अब निगाहें यशराज की नई सीरीज पर

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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला
भारत के नक्शे पर ओडिशा में जाजापुर जिले का नानपुर गांव तलाशना आसान नहीं है। वहां से मुंबई जैसे चकाचौंध भरे शहर आकर सोनाली शर्मिष्ठा ने जिस पहली फिल्म में काम किया, उसे अपनी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। और, ये नाम पहली बार हिंदी फिल्म जगत में अभी हाल ही में तब झलका जब खबर आई कि किसी मलयालम फिल्म की अभिनेत्री को यशराज फिल्म्स ने अपनी नई सीरीज में मौका दिया है। कोई महीने भर की तलाश के बाद इनका पता चला और देश की अलग अलग भाषाओं की फिल्मों में लगातार काम कर रहीं सोनाली ही हैं, इस हफ्ते की अपना अड्डा’ स्टार।
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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कृति सेनन की तरह आपने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद अभिनय में कदम रखा? कब लगा कि इंजीनियरिंग नहीं एक्टिंग ही करनी है?
जब तक बालचंद्रपुर में स्कूल में थे, सिनेमा क्या होता है ज्यादा पता नहीं था। फिर भुवनेश्वर आकर इंजीनियरिंग के दौरान ही मुझे स्मिता पाटिल के बारे में पता चला। गणेश पूजा, सरस्वती पूजा वगैरह में मेरे अभिनय और नृत्य से लोग बहुत प्रभावित होते थे, लेकिन मैं बहुत ही अंतर्मुखी किस्म की लड़की थी। इंजीनियरिंग के बाद नौकरी भी लग गई लेकिन मुझे लगा कि मैं शायद रचनात्मक कार्यों के लिए बनी हूं। इस दौरान संजय पटनायक ने मेरे भीतर का डर निकालने में बहुत मदद की।
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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपके पिता नंदकिशोर मोहंती बड़े कारोबारी हैं, उन्होंने टोका नहीं कि हमारे घर की बेटियां हीरोइन नहीं बनतीं?
हमारा संयुक्त परिवार है। पापा, उनके बड़े भाई और छोटे भाई, सबके परिवार साथ रहते हैं। आपको यकीन नहीं होगा कि मेरी मां मुझे मुंबई छोड़ने आई थीं नौकरी के सिलसिले में और मैंने यहां आकर फैसला किया कि मुझे अभिनय करना है। सब एकदम से चौंक गए। लेकिन बचपन से ही मेरी बुआ चिन्मयी मोहंती और दीदी निवेदिता ने बहुत सराहा और मुझे हौसला दिया। घरवालों को लगा कि ये मेरा सपना है, मैं इसे देखूंगी और फिर वापस आ जाऊंगी। लेकिन, छह साल हो गए मुझे मुंबई आए। तकलीफें खूब झेलीं लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। और, अब लगता है कि गाड़ी पटरी पर आ रही है।

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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मुंबई का पहला दिन कैसा रहा?
पहले दिन तो हम खूब घूमे। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस का सारा इलाका छान मारा। ताज होटल गए। उसके सामने खूब फोटो खींचे। गेटवे ऑफ इंडिया घूमे और वहां से पुणे चले गए। मुंबई में मैंने जस्ट डायल के जरिये एक हॉस्टल बुक किया था, मुंबई लौटने पर वहां गए तो चला कि वह तो बॉयज हॉस्ल है तो ऐसा ऑन लाइन फ्रॉड हुआ मेरे साथ पहले ही दिन। फिर, मैंने जो प्लान बी बना रखा था, वह काम आया। 
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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बाहर से आकर मुंबई में संघर्ष करना कितना मुश्किल है और घर वालों का साथ कितना जरूरी?
मुझे लगता है कि एक बार अगर हमने कुछ ठान लिया है तो फिर उसे पाने के रास्ते बनते जाते हैं। मेरे साथ ये था कि मेरे आसपास के सब लोगों को पता था कि ये लड़की कमाल की एक्टर है, बस मुझे ही नहीं पता था। तो मुझे खुद को पहचानने में समय काफी लगा। घर वालों का समर्थन ऐसे में बहुत जरूरी होता है। इंसान मानसिक रूप से कभी भी टूट सकता है, ऐसे में घरवालों का हौसला बढ़ाना काम आता है। 
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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, आपकी पहली ही फिल्म ने सिक्सर जड़ दिया?
मेरी पहली फिल्म जो मैंने मुंबई आने के बाद की, उसके निर्देशक नील माधब पांडा हैं। वह ओडिशा से हैं लेकिन ‘कलीरा अतीता’ उनकी पहली उड़िया फिल्म रही। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ उड़िया फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। ऑस्कर में भी ये सामान्य श्रेणी की फिल्मों में नामित हुई। इस फिल्म ने मेरे लिए सिनेमा के दरवाजे खोल दिए। तब से मैं राजस्थानी, मगही और मलयालम भाषाओं में फिल्में कर चुकी हूं।
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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हां, मलयालम फिल्म द फेस ऑफ द फेसलेस’  के बारे में तो मैंने भी सुना है और मुझे तो ये भी पता चला है कि यशराज फिल्म्स की किसी वेब सीरीज में आपको इस फिल्म के जरिये ही काम मिल चुका है?
ये सब आपको कैसे पता चल जाता है। प्लीज, यशराज फिल्म्स की सीरीज के बारे में कुछ मत पूछिए। अभी मैं इस बारे में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूं। इस फिल्म ने मेरे जीवन में तकदीर बदलने वाले मौके का काम किया है। यह फिल्म सिस्टर रानी मारिया के जीवन पर बनी है, जिनकी मध्य प्रदेश में हत्या कर दी गई थी। ये फिल्म इस साल हुए ऑस्कर समारोह की बेस्ट ओरिजनल स्कोर कैटेगरी में सबमिट हुई थी।
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सोनाली शर्मिष्ठा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अच्छा, मुंबई में पहली बार कैमरे का सामना जब किया, वह दिन तो याद होगा?
ये भी अच्छा सवाल पूछा आपने। मैं तब बेरोजगार थी और मेरी रूममेट एयरलाइंस में एयर होस्टेस का काम कर रही थी। खाली समय में वह मॉडलिंग भी करती थी तो एक दिन खूब बारिश हो रही थी तो वह जिद करके मुझे अपने साथ फिल्म सिटी ले गई। वह भारतीय जीवन बीमा निगम का कोई विज्ञापन था और विज्ञापन में जितनी लड़कियों की जरूरत थी, वे बरसात के चलते पहुंच नहीं पाईं थी। इसके चलते मुझसे भी विज्ञापन में दिखाई गई क्लास की छात्राओं के बीच बैठने को कहा गया। अपनी सहेली की बात को मैं न भी नहीं कर पाई। यही मेरा पहला ऑन कैमरा ब्रेक बना।
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