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Adipurush: विभीषण की पत्नी को बना दिया सुषेण वैद्य, बिना बाधा समुद्र लांघ गए बजरंग, ऐसे लगी फिल्म की लंका

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म ‘तानाजी द अनसंग वॉरियर’ के बाद इसके निर्देशक ओम राउत ने जब दक्षिण के सितारे प्रभास के साथ फिल्म ‘आदिपुरुष’ बनाने का एलान किया, तभी से सबके मन में एक ही प्रश्न रहा और वह रहा कि आखिर रामकथा पर बनने वाली फिल्म का नाम भला ऐसा क्यों हैं? सनातन धर्म में आदिपुरुष मनु माने जाते हैं और प्रथम महिला शतरूपा। लेकिन, मर्यादा पुरुषोत्तम को एक नया नाम देने की कोशिश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के एक समूह के साथ विचार मंथन ने ओम को ये नाम सुझाया। उद्देश्य रहा कि राम को 140 करोड़ जन मानस के समक्ष एक ऐसे पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया जाए जहां से मानव अवतारों की श्रृंखला का प्रारंभ माना जा सके। दूषित विचार बीज से जन्मी ये कल्पना अब सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है और इसका खाद पानी ऐसा है कि दर्शकों को इसमें हरियाली तलाश करने पर भी नहीं मिल रही। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस फिल्म का तारतम्य दर्शकों से क्यों नहीं बंध पा रहा...

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राम के बालरूप का अभाव

फिल्म ‘आदिपुरुष’ वहां से शुरू होती है जहां राम को वनवास मिलता है। फिल्म में राम के बालरूप का गुणगान ही नहीं है जबकि उनका जन्म, माता और पिता का स्नेह, बाल रूप राम की चंचलता, उनको मिला वात्सल्य और उनका ऋषियों के साथ जाकर तपस्थली की रक्षा करना ही राम कथा का मूल आधार रहा है। बालरूप की लीलाओं का विस्तार न होने से फिल्म के साथ जो एक स्वाभाविक जुड़ाव दर्शकों का होना चाहिए, वह यहां लापता है।

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राम, सीता, लक्ष्मण के नाम

‘जहां राघव वहां विजय’ का नारा प्रतिस्थापित करने की कोशिश करने वाली फिल्म का कथा विस्तार करते समय इसके पटकथा लेखकों ने जनमानस में व्याप्त लोकाचारों को भी पूरी तरह अनदेखा किया। यहां तक कि फिल्म में प्रमुख चरित्रों के नाम भी राम, सीता, लक्ष्मण के स्थान पर राघव, जानकी और शेष रखे गए हैं। इन कम प्रचलित नामों से चरित्रों का एक दूसरे को संबोधन भी दर्शकों को भाव विह्वल होने के मौके कम ही देता है। हनुमान को भी पूरी फिल्म में बार बार बजरंग कहकर ही संबोधित किया गया है।

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कथा के विस्तार में विसंगतियां

एक बात तो तय है कि फिल्म ‘आदिपुरुष’ बनाने वालों ने न तो वाल्मीकि रामायण ढंग से पढ़ी है और न ही रामचरित मानस। फिल्म के नेपथ्य में बजने वाली चौपाइयां समय से पहले ही संदर्भ में आ जाती हैं और जब इनका प्रसंग आता है तो इनका कहीं कोई अता पता नहीं। जैसे, हनुमान जब सीता का पता लगाने समुद्र लांघने के लिए उछलते हैं तो फिल्म में उनकी यात्रा निर्बाध संपन्न होती है। और, प्रचलित कथाओं के अनुसार मैनाक को स्पर्श करते हुए आने वाली दोहे का अंश ‘राम काजु कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम’ फिल्म में किसी दूसरे संदर्भ में बज जाता है।

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अजय-अतुल का संगीत ज्ञान

मराठी और हिंदी फिल्मों के संगीतकार अजय-अतुल लोक धुनों के जानकार माने जाते हैं। लेकिन, अवध से शुरू होकर दण्डकारण्य होते हुए दक्षिण में रामेश्वरम तक यात्रा करने वाली रामकथा के मूल संगीत तत्व को पहचानने में अजय-अतुल चूक गए। वह राम और सीता के बीच के प्रेम को दिखाने के लिए जो गाना रचते हैं, उसमें साढ़े सात हजार साल पहले की संगीत ध्वनियां नहीं है। पार्श्वसंगीत में भी जिस तरह के जयघोष या दंभ नाद सुनाई देते हैं, वे पौराणिकता से दूर और पाश्चात्य फिल्मों  के संगीत के करीब लगते हैं।

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

विभीषण, कुंभकर्ण, मेघनाद आदि

युद्ध की विकटता के बीच ‘आदिपुरुष’ में एक स्थान पर सैनिक कुंभकरण को जगाते नजर आते हैं लेकिन उसने उठकर युद्ध में ऐसा कुछ नहीं किया जिसे दर्शक याद रख सकें। मेघनाद का चरित्र चित्रण भी बहुत हास्यास्पद है। उसकी अमोघ शक्ति फिल्म में नागपाश में बदल जाती है। सौ हाथियों के बल वाले मेघनाद के किरदार में वत्सल सेठ को लेना भी गलत फैसला रहा। विभीषण बने सिद्धांत कर्णिक भी रामभक्त जैसी छवि के साथ नजर नहीं आते हैं। उनकी पत्नी के जरिये लक्ष्मण का उपचार कराना, और सुषेण वैद्य के चरित्र को फिल्म से गायब कर देना भी खटकता है।

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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

हॉलीवुड की नकल दिखे स्पेशल इफेक्ट्स

फिल्म ‘आदिपुरुष’ की बड़ी विफलता फिल्म में इंटरवल के बाद नजर आती है। पूरी फिल्म के स्पेशल इफेक्ट्स किसी न किसी हॉलीवुड फिल्म से कॉपी किए नजर आते हैं। ‘प्लेनेट ऑफ एप्स’ से लेकर ‘हैरी पॉटर’, ‘जंगल बुक’ और ‘ब्लेड’ सरीखी फिल्मों से प्रेरित ये स्पेशल इफेक्ट्स एक भारतीय फिल्म की आवश्यकता के अनुरूप नहीं हैं। इन दृश्यों में दर्शकों के चूंकि अधिकतर दूसरी फिल्मों में देखे हुए दृश्य ही हैं, लिहाजा इन्हें देखकर न रोमांच होता है और न ही किसी तरह का उत्साह ही संचारित होता है।

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