हिंदी सिनेमा में जिस साल ‘शोले’, ‘दीवार’, ‘धरम करम’, ‘जमीर’, ‘चुपके चुपके’, ‘खेल खेल में’, ‘रफू चक्कर’, ‘चोरी मेरा काम’ जैसी सुपरहिट फिल्में रिलीज हुई, उसी साल 1975 में एक फिल्म ‘धर्मात्मा’ ऐसी भी रिलीज हुई जिसमें हेमा मालिनी का ओष्ठ चुंबन लेने पर हंगामा हो गया। जी हां, आमिर खान ने तो बहुत बाद में बताते हैं कि अपने एग्रीमेंट में फिल्म हीरोइन के साथ किसिंग सीन होने की शर्त रखनी शुरू की, हिंदी सिनेमा में इसके करीब तक अभिनेता फिरोज खान साल 1972 फिल्म ‘अपराध’ में ही पहुंच गए थे, जिसमें मुमताज की नाक पर लिया गया उनका चुंबन सुर्खियां बना गया था और फिल्म को भी इससे खूब फायदा पहुंचा। बतौर निर्माता-निर्देशक फिरोज खान की ये पहली फिल्म रही, अपनी दूसरी फिल्म में फिरोज खान ने ऐसा ही कुछ फिल्म की हीरोइन हेमा मालिनी के साथ करने की कोशिश की, लेकिन हेमा मालिनी की मां ने सेट पर ही फिरोज खान की तबीयत हरी कर दी और उसके बाद शूटिंग तक वह गुस्से से लाल ही रहे।
फिल्म 'धर्मात्मा'
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
गजब पंगा शम्मी कपूर से
खैर, ये तो बात हुई फिल्म ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग के दौरान। उससे पहले फिरोज खान और शम्मी कपूर के बीच भी इसी फिल्म को लेकर मुंबई में हाथापाई हो गई थी। ये बात उन दिनों की है जब राज कपूर अपनी नई फिल्म ‘बॉबी’ के लिए गाने रिकॉर्ड कर रहे थे। उस दिन राज कपूर ने नए गायक शैलेंद्र सिंह की आवाज में एक गाना रिकॉर्ड किया, ‘मैं शायर तो नहीं..!’ गाने के बाद उन्होंने एक शानदार पार्टी रखी ताकि वह पूरी फिल्म इंडस्ट्री को इस फिल्म के बारे में विस्तार से बता सकें। पार्टी में शम्मी कपूर भी आए और फिरोज खान भी। शम्मी कपूर का वजन तब तक बढ़ना शुरू हो चुका था और फिल्म ‘जमीर’ में वह सायरा बानो के पिता का रोल करने के लिए हामी भी भर चुके थे। ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग शुरू ही होने वाली थी और पार्टी में शम्मी कपूर को देख फिरोज ने इस फिल्म में भी उन्हें अपने पिता का रोल करने का ऑफर दे दिया। दोनों में सिर्फ आठ साल का फर्क है और शम्मी कपूर को भरी पार्टी में ये प्रस्ताव अच्छा नहीं लगा। उन्होंने हाथ उठाया। फिरोज खान ने भी जवाब दिया। दोनों के बीच गुत्थमगुत्था होने लगी। रणधीर कपूर ने किसी तरह शम्मी कपूर को अलग किया। संजय खान ने अपने बड़े भाई को अपनी तरफ खींचा और बड़ी मुश्किल से मामला सुलटा। पार्टी में मौजूद लोग सब परेशान और थोड़ी देर बाद शम्मी कपूर अपने साथ फिरोज खान को लेकर वहां से निकल गए। पता चला कि दोनों ने कहीं और बैठकर रात भर महफिल जमाई और गिले शिकवे दूर किए।
फिल्म 'धर्मात्मा'
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राजेश खन्ना को मिला पहला ऑफर
फिल्म ‘धर्मात्मा’ की मूल कहानी मारियो पूजो के उपन्यास ‘गॉडफादर’ पर इसी नाम से बनी फ्रांसिस फोर्ड कोपोला पर आधारित थी। सोशल मीडिया तब किसी के सपने में भी नहीं था और अखबार व पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार भी बहुत सीमित था। लोगों को बहुत दिन बाद ‘गॉडफादर’ और ‘धर्मात्मा’ का कनेक्शन पता चला और तब लोगों को इस बात का बहुत ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता था कि कौन सी हिंदी फिल्म किस अंग्रेजी फिल्म की कहानी पर बनी है, क्योंकि अंग्रेजी फिल्में तब उस तादाद में रिलीज भी नहीं होती थी और होती भी थीं तो बस बड़े शहरों में। ये बात बहुत कम लोगों को पता है कि फिल्म ‘धर्मात्मा’ में पहले फिरोज खान खुद जंगूरा की भूमिका निभाना चाहते थे और चाहते थे कि राजेश खन्ना फिल्म के नायक रणबीर का किरदार निभाएं। राजेश खन्ना उन दिनों अपने स्टारडम में खोए हुए थे, और चेहरे देखकर फिल्में स्वीकार किया करते थे। जमाना अमिताभ बच्चन की तरफ भाग रहा था और जिस साल 1975 में अमिताभ बच्चन की ‘शोले’,‘दीवार’, ‘जमीर’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी हिट फिल्में रिलीज हुईं, उस साल राजेश खन्ना की सिर्फ एक फिल्म ‘प्रेम कहानी’ ही हिट हो सकी थी।
फिल्म 'धर्मात्मा'
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अफगानिस्तान में शूट होने वाली पहली फिल्म
फिल्म ‘धर्मात्मा’ से पहले भी विदेशों में हिंदी फिल्मों की शूटिंग होने लगी थी और लोगों ने तब तक यूरोप के तमाम देशों की झलकियां भी बड़े परदे पर देख ली थीं, लेकिन अफगानिस्तान में शूट होने वाली ‘धर्मात्मा’ पहली फिल्म रही। फिल्म के कलाकार और तकनीशियन जब वहां पहुंचे तो वहां के सरकारी टेलीविजन ने इस घटना की अपने चैनल पर सीधा प्रसारण किया था। फिरोज खान खाड़ी देशों में लोकप्रिय चेहरा रहे हैं और अफगानिस्तान की सरकार को जैसे ही उनकी अगली फिल्म वहां शूट करने का प्रस्ताव मिला, उनके लिए सारी सरकारी मदद के दरवाजे खोल दिए गए। फिल्म में दो हीरोइनें हैं हेमा मालिनी और रेखा। दरअसल, ‘शोले’ और ‘धर्मात्मा’ की कास्टिंग एक ही समय में हो रही थी। ‘शोले’ में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और संजीव कुमार जैसे सितारों के बीच अपनी भूमिका बहुत छोटी होने की बात हेमा मालिनी ‘बाइस्कोप’ के पाठकों को ‘सीता और गीता’ के 50 साल पूरे होने पर दिए गए इंटरव्यू में भी बता चुकी हैं। उन्होंने ‘धर्मात्मा’ भी इसी चक्कर में साइन कर ली थी, लेकिन इसके ठीक विपरीत डैनी के साथ दिक्कत ये हुई कि दोनों फिल्मों में उनके रोल बड़े थे और तारीखों के हिसाब से वह कोई एक फिल्म ही कर सकते थे, तो उन्होंने दोनों फिल्मों के बीच फिरोज खान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ चुनी।
फिल्म 'धर्मात्मा'
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘तेरे चेहरे में वो जादू है..’ की मेकिंग
फिल्म ‘धर्मात्मा’ में रेखा ने अनु का किरदार निभाया है और हेमा मालिनी के समानांतर भूमिका होने के बावजूद फिल्म में उनके रोल की लंबाई काफी कम है। इसी वजह से जीनत अमान ने ये फिल्म साइन करने के बाद छोड़ दी थी। जीनत ने फिल्म में काम करने से मना किया तो फिरोज खान ने ये रोल रेखा को ऑफर कर दिया। अब जबकि ये पूरी फिल्म तमाम यू्ट्यब चैनलों पर फ्री में भी देखने के लिए उपलब्ध है तो इसके गानों की लोकप्रियता भी अलग मुकाम पर पहुंच चुकी है। फिल्म का सबसे हिट गाना रहा, ‘तेरे चेहरे में वो जादू है..’। और, इस गाने की कहानी फिरोज खान खुद बता चुके हैं। उनके मुताबिक एक बार गीतकार इंदीवर ने यूं ही चलते फिरते उन्हें अपनी एक कविता सुनाई थी। गीत का मुखड़ा यही था और फिरोज खान के मन में हमेशा ये कविता घूमती रही कि इसे किसी फिल्म का गीत कैसे बनाया जाए? फिल्म ‘धर्मात्मा’ के संगीतकारों कल्याणजी आनंदजी को फिरोज खान ने जब ये कविता सुनाई तो वह उछल पड़े, बोले ये तो गाने की जबर्दस्त हुक लाइन है और फिर चारों ने मिलकर बैठकी और बना किशोर कुमार का हिट गाना, ‘तेरे चेहरे में वो जादू है, बिन डोर खिंचा आता हूं, जाना होता है और कहीं, तेरी ओर चला आता हूं...!’ फिल्म में मुकेश और कंचन का गाया एक और गाना ‘क्या खूब लगती हो, बड़ी सुंदर दिखती हो’ भी बहुत बहुत लोकप्रिय हुआ।
फिल्म 'धर्मात्मा'
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
साल 1975 की तीसरी सबसे बड़ी हिट
जानदार गाने, शानदार सिनेमैटोग्राफी, अफगानिस्तान की लोककलाएं और घुड़सवारी के साथ खेला जाने वाला खेल बुजकशी और इसके कलाकार, सबने मिलकर फिल्म ‘धर्मात्मा’ के लिए ऐसा समां बांधा कि ये साल 1975 की तीसरी सबसे कामयाब फिल्म रही। पहले दो स्थानों पर ‘शोले’ और ‘जय संतोषी मां’ थीं। और उस साल की टॉप फाइव फिल्मों में बाकी की दो फिल्में रहीं, ‘दीवार’ और ‘संन्यासी’। यानी कि उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पांच फिल्मों में तीन फिल्में हेमा मालिनी की रहीं। हेमा मालिनी को उसी साल हिंदी सिनेमा में हीरोइन नंबर वन का तमगा मिल चुका था और इस फिल्म के साथ ही फिरोज खान का भी बतौर निर्माता-निर्देशक हिंदी सिनेमा मे सिक्का जम गया।