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Sameer Anjaan: बैंक की नौकरी छोड़ी, मुंबई में नौ साल संघर्ष किया, शौच के लिए लाइन लगाई और...

Fri, 23 Feb 2024 08:58 PM IST
दीक्षा पाठक अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय गीतकार समीर अपने चार दशक के करियर में इतने गाने लिख चुके हैं कि उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है। हिंदी सिनेमा के चोटी  के गीतकारों में एक अनजान के बेटे समीर खुद भी चोटी के गीतकार बने, ये बात दीगर है कि उन्हें उनके पिता ही गीतकार नहीं बनने देना चाह रहे थे। अपनी पिता की मर्जी के खिलाफ समीर मुंबई गीतकार बनने आए और नौ साल के कड़े संघर्ष के बाद उन्हें 'दिल' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म में गीत लिखने का मौका मिला। इस फिल्म के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज 24 फरवरी को समीर के जन्मदिन पर आइये जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें उन्हीं की जुबानी..

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

दो दिन में ही बैंक की नौकरी छोड़ दी 
एम. कॉम करने के बाद मेरे दादा शिवनाथ प्रसाद जी की इच्छा थी कि मैं बैंक में काम करूं। दादा जी सेंट्रल बैंक ऑफ इण्डिया में काम करते थे। घर से कोई दूसरा बैंक नौकरी में गया नहीं और, चूंकि मैं एमकॉम कर रहा था तो सबकी टकटकी मेरे ही ऊपर थी और मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ज्वाइन कर लिया। लेकिन इसी बीच गीत लिखने का शौक बलवान हो गया, लोग मेरी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में खूब तारीफ करते थे। बैक ज्वाइन करने के बाद मुझे लगा कि यह जगह मेरे लायक  नहीं है। मैं गलत कर रहा हूं। दिल कुछ और बोल रहा है और मैं मजबूरी में कुछ और कर रहा हूं। दो दिन सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी करने के बाद नौकरी छोड़ दी 

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मां से पांच सौ रुपये लेकर मुंबई आया 
बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद मां से 500 रुपये लेकर 5 अप्रैल 1980  को काशी एक्सप्रेस पकड़कर 6 अप्रैल को मुंबई की सरजमीं पर आ गया। पिता जी की मंशा थी कि मैं कुछ भी बनूं लेकिन गीतकार ना बनूं। वह कहते थे कि शौकिया तुम लिखते हो लिखते रहो, उसमे मुझे कोई ऐतराज नहीं है मगर कभी इस तरफ रुख मत करना। इसलिए उन्होंने मुझे साहित्य न पढ़ाकर कॉमर्स पढ़ाया। जब मुंबई में आया तो पिता जी से मिलने की हिम्मत नहीं हुई। गीतकार बनने का फैसला मेरा था, इसलिए मुझे अपनी अलग लड़ाई लड़नी थी।

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मुंबई में शौच के लिए लाइन लगाई  
मुंबई आने के बाद शुरुआती दिनों में बहुत संघर्ष किया। उन दिनों मलाड मालवानी चाल में रहता था। शुरुआती एक साल का जो संघर्ष था। आज भी याद करता हूं तो मेरी रूह कांप जाती है कि मैं कैसे रहा? न तो सही तरीके से खाना नसीब होता था और न ही रहने की सही व्यवस्था थी। शौच के लिए भी एक घंटे लाइन लगानी पड़ती थी। लेकिन इसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। तकरीबन नौ साल की लड़ाई के बाद सफलता फिल्म 'दिल' से मिली और इसके बाद मेरी दुनिया बदल गई।

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

पिताजी का दिया गुरु मंत्र काम आया 
मां ने पिताजी को चिट्ठी लिखकर बता दिया कि मैं मुंबई में हूं। पिताजी ने एक रिश्तेदार को भेजकर मुझे बुलवाया भी। उनको लगा कि बेटा जिद्दी है मानेगा नहीं तो उन्होंने कहा कि पहले इस शहर को समझना जरूरी है। उन्होंने ढेर सारे गुरु मंत्र दिए जो मेरे काम अभी भी आते हैं। जब मुझे थोड़ी बहुत दुनियादारी की समझ आ गई तो उन्होंने मुझे आजाद कर दिया। आनंद मिलिंद के पिता चंद्रगुप्त के साथ भोजपुरी में मैंने 117 गाने लिखे। वहीं पर मेरी मुलाकात आनंद मिलिंद से हुई और हमारी दोस्ती हो गई। संयोग से उनको 'कयामत से कयामत तक' मिली। फिल्म हिट हो गई। उसके बाद उनको 'दिल' मिली। जब आनंद मिलिंद को 'दिल' मिली तो आनंद ने मेरे नाम का सुझाव दिया। 

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मेरी तरह लिखने की कोशिश मत करना 
मैंने पिता जी की फिल्म 'नमस्ते जी' का गीत 'ना पूछ मेरा वतन, पहली बार सुना था। जब फिल्म 'बंधन' का गीत 'बिना बादल के बिजुरिया कैसे चमके' आई तो वहां से मुझे लगने लगा कि पिता जी  शोहरत के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। अचानक 'डॉन' मिल गई और उस फिल्म से वह शिखर पर पहुंच गए। जब मुंबई आया तब पिताजी ने मुझसे कहा बेटा, मेरी तरह लिखने की कोशिश तुम मत करना, नहीं तो लोगों को लगेगा कि मैं ही लिखकर देता हूं। 

 

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गीतकार अनजान और उनके बेटे समीर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संगीतकार ने नीचे फेंक दी डायरी 
मैं संगीतकारों से मिलता रहता है। मुझे याद है उन दिनों एक संगीतकार के घर अक्सर जाया करता था। वह मेरे पिताजी के मित्र थे। डीएन में रहते थे। एक दिन मैं उनके यहां अपनी डायरी लेकर गया और उनको तीस चालीस गाने सुनाए। गाना सुनने के बाद उन्होंने मुझे बहुत खरी खोटी सुनाई और मेरी डायरी तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दी। यह देखकर तो मेरे पैरों के नीचे जमीन खिसक गई। मैंने डायरी उठाई और वहीं सामने से बस पकड़कर संगीतकार ऊषा खन्ना के घर पहुंचा। उनको सिर्फ चार गाने सुनाए और उन्होंने उसमें से दो गाने तुरंत फाइनल कर दिए। इस तरह से मुझे पहली फिल्म 'बेखबर' में 'गोरी परेशान है,काली परेशान है' लिखने का मौका मिला।

 

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जीवन की लड़ाइयां खुद ही लड़नी पड़ती है 
पिताजी ने एक बार मुझे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से मिलवाया। लक्ष्मीकांत जी बोले, 'अनजान जी मुझसे तो कह दिया। किसी और से मत कहिएगा। एक बात याद रखिए बाप की दुकान बाप की होती है और बेटे की दुकान बेटे की होती है। अगर इसके अंदर माद्दा है तो मुझे खुद मुखड़ा सुना कर प्रभावित  करे। मैं चार साल तक लगातार चक्कर लगाता रहा। चार साल बाद फिल्म 'लव 86' में एक गाना लिखने का मौका दिया। मेरा मानना है कि जीवन की लड़ाइयां तो खुद ही लड़नी पड़ती है। 

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जया बच्चन, समीर और अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अमिताभ बच्चन ने दी सौ करोड़ की सीख 
अमिताभ बच्चन ने मुझे एक बार समझाया था कि सिर्फ आप अच्छा लिखते हैं, यह इस बात की गारंटी नहीं है कि आप सफल गीतकार हैं। आपका पढ़ा लिखा और अच्छा होना बहुत जरूरी है। आपको अच्छा दिखना भी बहुत जरूरी है। आप का व्यवहार अच्छा होना बहुत जरुरी है। आपकी बुद्धि बहुत तेज होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात आपके अंदर सफलता पचाने की ताकत होनी चाहिए। अक्सर लोग दो गाने हिट होने के बाद पागल हो जाते हैं। ऐसे बहुत सारे गीतकार हैं, जिनके सामने मैं खड़ा नहीं हो सकता था, लेकिन उनको खराब आदत लग गई और इन खराब हरकतों ने उन्हें डुबो दिया। 

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मजरूह और बख्शी साहब का मुरीद
मैंने मजरूह सुल्तानपुरी और आनंद बख्शी साहब से बहुत सीखा। मैं इनका मुरीद रहा हूं। जिस वक्त मैं आया, उस वक्त तमाम दिग्गज गीतकार सक्रिय थे इन लोगों के साथ बैठने और सीखने का मौका मिला, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं। इन लोगों के बीच ही मुझे अपनी जगह बनानी थी। मैं संगीतकारों से मिलता था तो किसी को यकीन ही नहीं होता कि मैं लिख भी सकता हूं। मेरी कद काठी ही भगवान ने ऐसी बनाई कि लोगों को बच्चा सा दिखता था। लेकिन, मैंने हिम्मत नहीं हारी और फिर धीरे धीरे बात बनती गई। मैंने संगीतकारों की चार पीढ़ियों के साथ काम किया है।

 

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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सुनील दत्त साहब ने लिखी चिट्ठी
मुझे जब दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला तो गलती से मजरूह सुल्तानपुरी साहब मंच पर चले गए। पुरस्कार मुझे मिला था और मैं भी मंच पर पहुंचा। मैंने तुरंत मामला संभाला। मैंने कहा कि पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मुझे अपने पिताजी के हाथों मिला था और तब मैंने कसम खाई थी कि दूसरा पुरस्कार जिन्हें मैं अपना गुरु मानता हूं, उनसे लूंगा। सौभाग्य देखिए कि आज मजरूह सुल्तानपुरी मंच पर हैं। इसके बाद वह पुरस्कार मैंने उनके हाथों लिया। सुनील दत्त साहब ने तब मुझे चिट्ठी भेजकर इसकी तारीफ की और लिखा कि तुमने अपने एक सीनियर की इज्जत रखी और अनजान साहब का नाम रोशन किया। 

 

 

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