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दुनिया के वो देश जहां बाथरूम में सोने को मजबूर हो रहे हैं लोग

Tue, 03 Mar 2020 01:08 PM IST
Trainee Trainee एजूकेशन डेस्क, अमर उजाला
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पेरिस - फोटो : AFP
बढती मंदी और मंहगाई का असर दुनिया के कई बड़े शहरों में देखा जा सकता है। विश्व भर के चुनिंदा सबसे महंगे लेकिन आलीशान शहरों में शुमार लंदन, हांगकांग, म्युनिख और टोक्यों में प्रतिमाह कमरे के किराए की कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि लोग यहां बाथरूम में सोने को मजबूर हैं। ताजा रिपोर्टों के अनुसार लंदन में 27 स्कवैयर मीटर के एक कमरे के फ्लैट का प्रतिमाह किराया 1500 पाउंड है जो कि भारतीय मुद्रा में लगभग 1 लाख 39 हजार रुपये के बराबर है। 

 
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प्रतिकात्मक रूप - फोटो : Social Media
लंदन में हालात इतने बदतर हैं कि शहर में लोग शादी करने के बाद शिशुओं को जन्म देने से कतरा रहे हैं। क्योंकि जितना बड़ा परिवार होगा लोगों को महंगाई का बोझ भी उतना ही ज्यादा सहन करना पड़ेगा। लंदन के मेयर ने हालातो पर चिता जताते हुए कहा है बढ़ता हुआ किराया लोगों को मानसिक बीमारियां दे रहा है। लोग अपने परिवार के साथ वक्त नहीं बिता पा रहे हैं। कभी बड़े मकानों में रहने वाले बहुत से लोगों के लिए अब सड़कों पर रहने की नौबत आ गई है। लंदन शहर की बड़ी आबादी अपनी आय का 37 प्रतिशत किराए में दे रही है।


 
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प्रतिकात्मक रूप - फोटो : Social Media
लंदन की तरह ही जर्मनी के म्युनिख और बर्लिन में भी किराए के घर की कीमतों में तेजी से उछाल आया है। जिससे आहत होकर लोग पिछले कई महीनों से म्यूनिख, बर्लिन और फ्रैंकफर्ट में बढ़ते हुए किराए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनों को देखते हुए बर्लिन डिपार्टमेंट फॉर अर्बन डेवलपमेंट एंड हाउसिंग ने किराए की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने का अनोखा तरीका निकाला है। इसी हफ्ते बर्लिन जर्मनी का ऐसा पहला शहर बन गया है जहां किराए की कीमत अगले 5 सालों के लिए फिक्स हो चुकी है। किराए के घरों पर अगले 5 सालों के लिए लगाम कसने से एक ओर किराएदारों की जमात खुश है तो दूसरी ओर रीयल इस्टेट कारोबारी और प्रॉपर्टी से जुड़े व्यवसायी सरकार के इस फैसले से नाराज हैं।

 

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प्रतिकात्मक रूप - फोटो : Social Media
रीयल इस्टेट कारोबारियों के गुस्से पर तर्क देते हुए फाइनेंस मिनिस्टर ओलफ सोल्ज ने कहा कि किराए की कीमतों पर लगाम लगाई गई है क्योंकि बर्लिन लंदन जैसा नहीं बनना चाहता है। वहां हालात इतने खराब है कि डॉक्टर और वकील भी फ्लैटमेट के साथ रहने को मजबूर हैं। यहां ये भी जानना मजेदार है कि बर्लिन में बड़ी आबादी पूरी जिंदगी सिर्फ किराए के मकानों में बिता देती है। अन्य देशों से मुकाबले यहां खुद का मकान खरीदने का चलन बहुत कम है।

 
 
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प्रतिकात्मक रूप - फोटो : Social Media
लंदन, म्युनिख और बर्लिन ही ऐसे शहर नहीं हैं जहां बढ़ती महंगाई में लोग ऐसे गुजर बसर कर रहे हों। हांगकांग लंदन से कहीं आगे हैं। यहां जगह की कमी इतनी बढ़ चुकी है कि यहां लोग लकड़ी के ताबूतनुमा घरों में रहने को मजबूर हैं।बक्सेनुमा इन घरों में किचन और टॉयलेट एक साथ होते हैं जो काफी छोटे होते हैं। लोग इन्हें लकड़ी या फिर तारों को जोड़कर बना लेते हैं। 15 स्क्वैयर फीट के लकड़ी के ये बॉक्स ताबूत की शक्ल के होने के कारण कॉफिन क्यूबिकल भी कहलाने लगे हैं। रिपोर्टों की मानें तो हांगकांग कि एक बड़ी आबादी इन्हीं कॉफिन क्यूबिकल्स में गुजारा कर रही है।
 



 
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प्रतिकात्मक रूप - फोटो : Social Media
हांगकांग के रीयल एस्टेट कारोबारियों ने इसे व्यवसाय बना लिया है। कारोबारी लगभग 400 स्क्वैयर फीट का घर किराए पर लेते या खरीदते हैं। फिर उसे 20 डबल डेकर बिस्तरों के साथ कॉफिन क्यूबिकल में बदल देते हैं। हर बिस्तर का किराया 250 यूएस डॉलर यानी लगभग 17,781 रुपए महीने के आसपास होता है। ये घर इतने छोटे होते हैं कि छह फुट की ऊंचाई वाले लोग इनमें तनकर खड़े नहीं हो सकते हैं। इन बक्सेनुमा घरों में लोगों को पैर सिकोड़कर सोना पड़ता है।


 
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प्रतिकात्मक रूप - फोटो : Social Media
अगर आप भी पढ़ाई या किसी अन्य काम के लिए लंदन में रहने की सोच रहे हों तो एक बार वहां किराए पर प्रॉपर्टी की कीमत जरूर खंगाल लें। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया के दूसरे मुल्कों की तरह यहां के भी युवा लंदन के बाहरी हिस्सों को छोड़कर खास लंदन शहर में काम की तलाश, बेहतर मौके या पढ़ाई करने के लिए आते हैं। बड़े शहरों की चकाचौंध भी उन्हें आकर्षित करती है। युवाओं के घर छोड़ने के बाद बाहरी हिस्सों में बने बड़े-बड़े मकानों में केवल बुजुर्ग ही रह जाते हैं। ऐसे मामले तेजी से बढ़े हैं जहां एक आलीशान घर में केवल एक बुजुर्ग रहता है। दूसरी ओर घर छोड़कर शहर पहुंचे युवा सस्ता घर ढूंढने की मशक्कत करते हुए दिख रहे हैं।
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