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इतिहास के पन्नों से : 1914 में बदला था डॉक्टरों का लिबास, जानिए सफेद से हरे और नीले रंग तक की कहानी

Mon, 10 May 2021 04:16 PM IST
देवेश शर्मा एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

लोगों की जिंदगी में खुशियों के रंग भरने वाले अस्पताल के ये भगवान के दूत अक्सर हरे या नीले रंग के लिबास में ही दिखते हैं। 
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Demo pic - फोटो : Social media
वैश्विक संक्रामक महामारी कोविड-19 के दौर में डॉक्टर सबसे अग्रिम मोर्चे पर कोरोना वायरस मरीजों की जान बचाने के संघर्ष कर रहे हैं। ये जीवनरक्षक डॉक्टर अक्सर सफेद कोट यानी व्हाइट एप्रिन के अलावा अक्सर हरे रंग के गाउन और नीले रंग के गाउन में नजर आते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा हैं कि लोगों की जिंदगी में खुशियों के रंग भरने वाले अस्पताल के ये भगवान के दूत अक्सर हरे या नीले रंग के लिबास में ही क्यों दिखते हैं? इतना ही नहीं अस्पताल का रंग नीरस सा क्यों होता है? क्या है इस हरे और नीले रंग के पीछे के असली कहानी और वैज्ञानिक कारण? साथ ही कब और क्यों बदला गया था डॉक्टरों का लिबास? तो आइए जानते हैं ... 
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
ऑपरेशन थियेटर में चिकित्सक और स्वास्थ्य एवं नर्सिंगकर्मी अक्सर हरे या नीले रंग के लिबास में ही दिखते हैं। अस्पताल के कमरों में सफेद रंग होता है। इतना ही नहीं, अस्पताल के पर्दे, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारी भी नीले और हरे रंग के लिबास और यूनिफॉर्म में ही नजर आते हैं। इसकी एक विशेष वजह है। करीब 107 साल पहले डॉक्टरों का यह लिबास बदला गया था।
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चिकित्सा कर्मी। - फोटो : PTI
इससे पहले तक डॉक्टर ऑपरेशन थियेटर में भी अक्सर सफेद कपड़ों में ही नजर आते थे। हालांकि, कई डॉक्टर अब भी सफेद कोट में नजर आते हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर ओपीडी में परामर्श सेवाएं देने वाले चिकित्सक और विशेषज्ञ चिकित्सक होते हैं। जबकि, ओटी में सेवाएं देने वाले ज्यादातर डॉक्टर, विशेषज्ञ सर्जन और नर्सिंगकर्मी हरे और नीले रंग के लिबास में नजर आते हैं। 

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भारतीय डॉक्टर - फोटो : PTI
1914 में बनाया गया था नियम 
मेडिकल साइंस हिस्ट्री की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अनुसार, 1914 के बाद से डॉक्टरों का लिबास बदल गया। दरअसल, 1914 में एक प्रभावशाली डॉक्टर ने ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों के लिए हरे या नीले रंग का गाउन पहनने का नियम बनाया था। इतना ही नहीं अगर हम गौर से देखें तो ऑपरेशन थियेटर में या फिर अस्पतालों के कमरों में पर्दे भी हरे या नीले रंग के होते हैं। वहीं, डॉक्टरों के मास्क भी हरे रंग या नीले रंग के होते हैं। ऐसे में हर किसी के मन में ये सवाल तो उठता वाजिब है कि आखिर इन दो रंगों में ऐसा क्या खास है जो किसी और में नहीं। 
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1 - फोटो : demo
तो ये है असली वजह
  • टुडे सर्जिकल नर्स नामक एक मेडिकल साइंस पत्रिका के 1998 में छपे एक विशेषांक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ये दो रंग अर्थात नीला और हरा रंग आंखों को काफी सुकून देते हैं। 
  • सामान्य तौर पर एक ही रंग को बार-बार और लगातार देखने पर हमारी आंखें थकान महसूस करने लगती हैं। ऐसा होना ऑपरेशन के वक्त मरीज के लिए घातक हो सकता है।
  • जैसे अगर हम सूर्य या किसी और चमकदार चीज जैसे जलती लाइट को देखते हैं तो हमारी आंखें चौंधियां जाती हैं। लेकिन जब हम हम हरा या हल्का नीला रंग देखते हैं तो हमारी आंखों को सुकून मिलता है। 
  • इसलिए, ऑपरेशन थियेटर में मरीज का ऑपरेशन करते वक्त डॉक्टरों और अन्य सदस्यों के लिए हरा या नीले रंग का लिबास पहनने का नियम शुरू किया गया था। क्योंकि डॉक्टर और नर्सिंगकर्मी लंबे समय तक खून और मांसपेशियों को देखते रहते हैं।  
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डेमो - फोटो : डेमो
अन्य रंग क्यों नहीं 
  • ऑपरेशन थियेटर की पोशाक के लिए अन्य रंग को इसलिए नहीं चुना गया कि लाल-पीले रंग हमारी आंखों को काफी चुभते हैं। जबकि, हल्के हरे और नीले रंग हमारी आंखों को सुकून देते हैं। 
  • डॉक्टर भी इन दो रंगों को आंखों के लिए अच्छे मानते हैं। इसी कारण, अस्पतालों में पर्दों से लेकर कर्मचारियों की यूनिफॉर्म तक हल्के हरे और नीले रंगों की होती है। ताकि, अस्पताल में आने वाले मरीजों को भी किसी तरह की कोई परेशानी न हो। 
  • इसकी एक वजह ये भी है कि डॉक्टर जब किसी मरीज का ऑपरेशन या सर्जरी करते हैं तो उन्हें काफी देर तक खून और मानव शरीर के भीतरी अंग देखने पड़ते हैं। ऐसे में उन्हें कोई मानसिक तनाव न हो, इसलिए हरा रंग डॉक्टर पहनते हैं या नीला रंग पहनते हैं। 
  • इससे, हरा रंग देखकर उनका मस्तिष्क उस तनाव से मुक्त हो जाता है।
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