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जानिए क्या है #Me Too कैंपेन, कैसे हुई इसकी शुरुआत और क्या हैं कानूनी प्रावधान

Wed, 17 Feb 2021 08:01 PM IST
देवेश शर्मा एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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क्या है #Me Too कैंपेन, कैसे हुई इसकी शुरुआत और क्या हैं कानूनी प्रावधान - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर द्वारा पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ दर्ज कराए गए मानहानि के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के साथ ही बुधवार को देशभर में #Me Too यानी (मी टू)  एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। मी टू  महज एक शब्द नहीं है। यह महिलाओं की अस्मिता से जुड़ा एक बड़ा आंदोलन है। भारत में मी टू कैंपेन के दौरान पत्रकार प्रिया रमानी द्वारा लगाए गए आरोपों के कारण तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री एमजे अकबर को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ गया था। आइए जानते हैं क्या है #Me Too कैंपेन और कैसे हुई इसकी शुरुआत ... 
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Me too in China - फोटो : Agency (File Photo)
क्या है #Me Too?
सामान्य तौर पर मी टू (#Me Too) का अभिप्राय हिंदी में ... मैं भी या मेरे साथ भी जैसे - शब्दों से हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह एक ऐसा आंदोलन है, जो महिलाओं और युवतियों को अपने साथ हुई ज्यादतियों और उत्पीड़न की दास्तां को बयां करने का साहस देता है। सोशल मीडिया पर मी टू एक ऐसा हैशटेग है जिसने यौन उत्पीड़न की शिकार हुई महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर अपनी आवाज उठाने को अधिकार दिया है। ये दुनियाभर में चर्चित रहा है। भारत में भी कई टीवी, फिल्म और पत्रकारिता जगत से जुड़ी हस्तियों ने शुरुआती दौर में अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की दबी हुई दास्तां को इस हैश टेग के साथ सार्वजनिक किया था। 
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हार्वी वाइंस्टीन
मी टू की शुरुआत 
इस आंदोलन की शुरुआत अक्तूबर, 2017 में हॉलीवुड से हुई। हॉलीवुड के बड़े निर्माताओं में से एक हार्वी वाइंस्टीन पर कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोप लगाए थे। इसी से दुनियाभर में #Me Too कैंपेन की शुरुआत हुई थी। जिसके बाद यौन उत्पीड़न के खिलाफ कई महिला संगठनों ने प्रदर्शन भी किए थे। कामकाजी महिलाओं ने अभियान से प्रेरित होकर सार्वजनिक तौर अपने साथ हुए बुरे बर्ताव की जानकारियों को साझा कर अपने मन का बोझ हल्का किया। कई ने तो इस अभियान से प्रेरणा लेकर वर्षों पुराने मामलों में कानूनी मुकदमे भी दर्ज कराए थे। 

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सांकेतिक तस्वीर
मी टू शब्द ही क्यों 
जानकारी के अनुसार, 2006 में एक सामाजिक कार्यकर्त्ता तराना बर्क ने मी टू शब्द का उपयोग करना शुरू किया था। लेकिन इसे लोकप्रियता तब मिली जब 2017 में अमेरिकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो द्वारा महिलाओं से इस हैशटेग को लेकर अपनी आपबीती साझा करने का आग्रह किया। उन्होंने इस हैशटेग के साथ यौन उत्पीड़न की दास्तां को ट्वीट करने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया। तब यह दुनियाभर में लोकप्रिय हुआ था। दिसंबर 2017 में मी टू आंदोलन के तहत यौन शोषण, यौन प्रताड़ना या यौन हिंसा का खुलासा करने वाली महिलाओं को 'पर्सन ऑफ द ईयर' घोषित किया गया था। इन महिलाओं को 'द साइलेंस ब्रेकर्स' नाम दिया गया था।  
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Me too in China - फोटो : Agency (File Photo)
शोषण क्या है?
शोषण की परिभाषा सबके लिए एक समान नहीं हो सकती है। एक महिला और एक पुरुष दोनों के लिए शोषण की परिभाषा कुछ अलग है। पुरुष के लिए जो बात या वाकया बेहद आम या सामान्य हो सकता है, वही एक महिला के लिए शोषण के दायरे में शामिल होता हो सकता है। चाहे बात शारीरिक बर्ताव की हो या मानसिक तौर पर दबाव बनाने को लेकर या सेक्सुअल डिजायर की। दोस्त, प्रेमी या परिजनों के गले मिलने या छूने से लेकर किसी अन्य पुरुष या कार्यस्थल पर इस तरह के बर्ताव या शारीरिक निकटता की कोशिश को एक निश्चित सीमा और परिभाषा के दायरे में बांधना बेहद मुश्किल है। इसके दायरे को सिर्फ एक महिला ही समझ सकती है। 
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me too - फोटो : Social Media
भारत में महिलाओं का उत्पीड़न
भारत के चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-IV) से प्राप्त जानकारी के अनुसार, देश में 5.5% महिलाओं ने यौन हिंसा का अनुभव किए जाने की पुष्टि की है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 80% से अधिक उदाहरण पति द्वारा प्रायोजित यौन शोषण से संबंधित हैं। इसका संकेत यह कि शारीरिक शोषण या यौन हिंसा के प्राथमिक स्थान के रूप में घर में सबसे अधिक असुरक्षित है। इसके बाद सार्वजनिक स्थानों और कार्यस्थलों का नंबर आता है। हां, यदि केवल कार्यस्थलों की बात की जाए तो देश की 14.58 करोड़ वयस्क महिलाओं के साथ कभी-न-कभी यौन उत्पीड़न जैसा अपमानजनक व्यवहार जरूर हुआ है। 
 
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सांकेतिक तस्वीर
भारत में कानूनी प्रावधान 
  • भारत में कामकाजी महिलाओं के साथ हो सकने वाली उत्पीड़न और शोषण जैसी घटनाओं को रोकने और ऐसे अपराध में कमी लाने के लिए कानून भी बनाया गया है। 
  • देश में 09 दिसंबर, 2013 को कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 प्रभाव में आया था। 
  • यह कानून उन संस्थाओं और कार्यस्थलों पर अनिवार्य तौर पर लागू होता है जहां महिलाओं समेत 10 से अधिक लोग काम करते हैं। 
  • यह कानून यौन उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों को चिह्नित करता है और यह बताता है कि ऐसी स्थिति में शिकायत कैसे की जा सकती है।
  • इस कानून के अनुसार यह जरूरी नहीं है कि जिस कार्यस्थल पर महिला का उत्पीड़न हुआ है, वह वहां नौकरी करती ही हो। 

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#ME TOO
कानून के दायरे में ये भी 
  • इस अधिनियम के तहत कार्यस्थल पर किसी प्रकार से संपर्क में आने वाली महिला शिकायत दर्ज करा सकती है।
  • यदि महिला का उत्पीड़न कार्यकाल के दौरान हुआ है तो वह नौकरी छोड़ने के बाद भी शिकायत दर्ज करा सकती है। 
  • यदि महिला वहां काम नहीं करती थी और अन्य गतिविधियों के दौरान संस्थान में उत्पीड़न हुआ है तो महिला संस्थान की आंतरिक शिकायत समिति के पास शिकायत दर्ज करा सकती है। 
  • पीड़ित महिला के पास आईपीसी की धारा 354 ए और अन्य के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करने का विकल्प भी है। 
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मी टू अभियान
शिकायत दर्ज कराने की समय-सीमा
  • सामान्य तौर पर यह कानून उत्पीड़न और शोषण से जुड़ी शिकायत दर्ज कराने के लिए 90 दिन की समय-सीमा देता है। 
  • यदि समय पर शिकायत दर्ज नहीं कराई है तो देरी का उचित कारण बताकर आंतरिक समिति द्वारा इसे 90 दिनों तक और बढ़ाया जा सकता है। 
  • आपराधिक कानून में अपराध की प्रकृति के आधार पर एक वर्ष से तीन वर्ष तक की सीमा अवधि होती है। 
  • पुलिस में बलात्कार की शिकायत दर्ज करने के लिए कोई तय समय-सीमा नहीं है। 
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