अक्सर देखा गया है कि हमारे समाज में महिलाओं को हर बात पर ये कह कर रोक दिया जाता है कि तुम एक लड़की हो, कल तुम्हारी शादी होगी। बेहतर है घर का काम काज सीख लो, तो कल ससुराल में कोई दिक्कत नहीं होगी।
हां, ये बात भी जायज है कि कुछ परिवारों में मौके भी दिए जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे लड़कों को लेकिन ऐसे कितने हैं। लेकिन, जहां मौके नहीं मिल पाते और जब लड़कियां अपना हक लड़कर लेती हैं, जिद्द से लेती हैं तो मिसाल कायम होती है। ऐसी ही कुछ कहानी है, रेसलर बबीता नागर की।
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दिल्ली पुलिस की इस एसआई ने चूल्हा नहीं पहलवानी चुनी
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बबीता ग्रेटर नोएडा की रहने वाली हैं। बबीता को बचपन से ही लड़कों की तरह रहने का शौक था। बेहतर होगा कि ये कहें कि ये उनकी पसंद थी। उन्हें भी बाकी लड़कियों की तरह मां ने कहा कि चूल्हा चौका सीख लो। लेकिन बबीता को ये नागवार था। उन्होंने अपनी मां से सीधे मना कर दिया और कहा कि मैं 'लड़कियों की तरह' नहीं रहूंगी बल्कि भाइयों की तरह रहूंगी।
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दिल्ली पुलिस की इस एसआई ने चूल्हा नहीं पहलवानी चुनी
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बचपन में लड़कों को पहलवानी करते देखा तो उन्होंने कुश्ती लड़ना शुरू कर दिया और समयांतराल में उनका चयन दिल्ली पुलिस में हो गया। यहां खेल कोटे में खूब बढ़ावा मिला और फिर बबीता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
दिल्ली पुलिस की इस एसआई ने चूल्हा नहीं पहलवानी चुनी
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उन्होंने 2005 के कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए सिल्वर मेडल जीता। परिवार के लोगों ने शादी का प्रस्ताव रखा तो उसे भी नकार दिया और कहा कि वो चूल्हे चौके के लिए नहीं बनी हैं बल्कि समाज सेवा के लिए बनी हैं।
दिल्ली पुलिस की इस एसआई ने चूल्हा नहीं पहलवानी चुनी
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आज कल बबीता करीब 120 लड़कियों और गांव की बहुओं को पुलिस में भर्ती के लिए ट्रेनिंग दे रही हैं। इससे पहले वो 50 से अधिक लड़कियों और बहुओं को पुलिस में भर्ती करवा चुकी हैं। अब आगे से कोई कहे कि लड़की हो ये नहीं कर सकती, वो नहीं कर सकती तो अपने हिस्से का दम दिखा दीजिएगा।