जितेंद्र ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए कहा, मैं जब कक्षा 8 में था तब मेरी मां का निधन हो गया। मैंने दूसरों के धान के खेतों में काम करना शुरू कर दिया, जिससे मुझे 30-40 रुपये रोजाना मिलते थे। मनरेगा के अंतर्गत मैंने सड़कें और तालाब खोदने का काम भी किया जिसमें 100-150 रुपये प्रतिदिन मिलते थे। जितेंद्र सूना के 6 भाई-बहन हैं।
मजदूरी करते हुए भी सूना ने पढ़ाई जारी रखी। अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद ओडिशा से दिल्ली आने का फैसला आर्थिक कारणों से लेना पड़ा। जितेंद्र को अपना घर बनाने के लिए पैसे कमाने थे और ये जितेंद्र दिल्ली में ही कर सकता था। जितेंद्र का भाई आईजीएल में काम करता था और वो भी वहीं काम करने चला आया।
यही वो समय था जब सूना अपनी जातिगत पहचान को लेकर ज्यादा जागरूक हो गए। सूना का कहना है कि मैंने यह नोटिस किया था कि बचपन से ही कैसे हमारे साथ अलग बर्ताव किया जाता था। हमें अलग खाना दिया जाता था और बस्ती में रहने को मजबूर किया जाता था। यह बात तब और घर करती गई जब मेरे भाई से उसके सहकर्मी उसका सरनेम पूछते थे और वह जवाब नहीं देता था।
जेएनयू परिसर में जेएनयू छात्र संघ चुनाव कमेटी द्वारा छात्र संघ चुनाव के लिए आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में सभी स्टूडेंट पार्टी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार
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3500 रुपये दिल्ली जैसे शहर में रहने के लिए काफी नहीं थे क्योंकि उसे घर पर भी पैसे भेजने होते थे। सूना ने इसलिए तय किया कि वह वापस जाकर अपना ग्रैजुएशन पूरा करेगा। सूना के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब स्नातक के बाद उसके एक दोस्त ने उसे नागपुर की एक संस्था के बारे में बताया जो यूपीएससी की मुफ्त कोचिंग कराती है।
सूना जब नागपुर पहुंचे तो उन्हें एहसास हुआ कि यह तो 10 महीने का अंबेडरवाद और बुद्धिस्म पर कोर्स है। यहां उनकी समझ जाति और छुआछूत को लेकर ज्यादा बढ़ी। इसके बाद सूना ने निश्चय किया कि वह इतिहास पढ़ेंगे और अपने(एससी/एसटी) लोगों का इतिहास लिखेंगे।
इस संस्था में सूना एचसीयू और जेएनयू के छात्रों से मिले और जेएनयू में एमए के लिए प्रवेश परीक्षा देने का निर्णय किया। यूनिवर्सिटी में उनका दाखिला 2013 में हुआ और इतिहास से एमए करने लगे। स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूशन एंड इंक्लूसिव पॉलिसी से उन्होंने एमफिल किया। इस वक्त वह पीएचडी कर रहे हैं और अपनी थीसिस 'हिस्ट्री ऑफ आईडेंटिटीज एंड एक्सक्लूशन; अंबेडकर एंड दि मार्जिनलाइज्ड' विषय पर लिख रहे हैं।
सूना बाप्सा(बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। उनका कहना है कि, हम देख रहे हैं कि आरएसएस और भाजपा किस तरह से लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद कर रहे हैं... जेएनयू उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है।
जितेंद्र अपना चुनाव जेएनयू छोड़ने वाले छात्रों की संख्या और छात्रों को फेलोशिप मिले इन मुद्दों पर लड़ रहे हैं। गौरतलब है कि जेएनयू में 6 सितंबर को चुनाव है।