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18 की उम्र में ही दुनिया हो गई इनकी दीवानी

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महज 18 साल की उम्र में इस युवा लड़की ने अपने जिंदगी की आखिरी सांसें ली। शायद उसे पहले से पता था कि अब वह ज्यादा दिन की मेहमान नहीं है।
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पिछले कुछ सालों से उसका पूरा समय बिस्तर पर पड़े-पड़े ही बितता था। असल में वह इतनी कमजोर हो चुकी थी कि कहीं आना जाना तो दूर जिंदा रहने के लिए सांस लेना भी उसके लिए दूभर हो चुका था।
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इस दौरान एक दिन आयशा चौधरी के पिता नीरेन ने आयशा को पढ़ने के लिए एक किताब दी। उसे पढ़ने के बाद बीमार आयशा ने अपने पिता से कहा कि इससे बेहतर किताब तो वह खुद लिख सकती है।

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लाइलाज ‌बीमारी पाल्मोनरी फाइब्रोमा से जूझ रही बेटी की इच्छा के लिए उसके पिता ने उसके हाथ में पेन कागज थमा दिया। पांच महीने में उसने अपनी किताब लिख डाली और जिसे उसके पिता ने पब्लिश भी करा दिया।
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आयशा के किताब की तारीफ दुनिया भर में की गई। मशहूर फिल्म निर्माता डेनी ब्यॉल ने भी आयशा के किताब की तारीफ की।
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जाने माने फिल्म निर्माता शेखर कपूर और गीतकार स्वानंद किरकिरे ने भी आयशा के किताब की तारीफ की। इतना ही नहीं दुनिया भर से पाठकों ने आयशा के लेखन कला की प्रशंसा की।
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असल में 18 साल की आयशा अब दुनिया में नहीं है। इसी साल 24 जनवरी को उसने अंतिम सांस ली। अपनी ‌जिंदगी के आखिरी पांच महीनों में उसने अपनी किताब लिखी और उसे अपने हाथ में पाते ही उसने दुनिया छोड़ दी। जैसे वह इसी किताब के छपने का इंतजार कर रही थी।

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आयशा को जन्‍म से ही एक घातक और दुर्लभ बीमारी थी जिसे सीवीयर कमबाइंड इम्यूनो डिफिशियंसी सिंड्रोम (SCIDS) के नाम से जाना जाता है। यह बीमारी पीड़ित व्यक्ति के रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देती है और उसे बड़ी आसानी से इंफैक्‍शन हो जाता है।

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आयशा को बचाने की उनके घर वालों ने पूरी कोशिश की। महज छह महीने की उम्र में उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी किया गया। इसके बावजूद बीमारी जड़ से खत्म नहीं हुई और 2010 में पता चला कि आयशा को पॉल्मोनरी फाइब्रोसिस है।(फोटो: आयशा के पिता नीरेन चौधरी)
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पांच साल तक इस बीमारी से जूझने के बाद 24 जनवरी को वह इस दुनिया से विदा हो गई। लेकिन इतनी सी उम्र में आयशा ने कुछ ऐसा लिख डाला जिसके चलते वह दुनिया भर में अपने पाठकों के दिलों में अमर हो गई। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयशा के जज्बे को सत्-सत् नमन।(फोटो: आयशा की किताब)
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