सुशील, बजरंग को देखकर सीखा
दीपक के कोच विरेंदर ने एक बार खुलासा किया था कि दीपक उनके पास 15 की उम्र में आया था, लेकिन इससे पहले वह मिट्टी की कुश्ती के दंगल लड़ता था। पांच सौ से लेकर पांच हजार की ईनामी राशि दीपक के घर का बड़ा सहारा बनती थी, लेकिन उनके पास आने के बाद मिट्टी की कुश्ती बीते दिनों की बात हो गई। उसने छत्रसाल में सुशील कुमार, बजरंग समेत अन्य वरिष्ठ पहलवानों को देखकर कुश्ती के दांवपेच में महारत हासिल की।
गाय का दूध है दीपक की कमजोर
पिता सुभाष ने एक बार बातचीत में बताया था कि दीपक को बचपन से ही गाय का दूध पसंद है। उन्होंने घर में गाय पाल रखी है और इसी का दूध वह रोजाना दीपक को भिजवाते हैं। वह सिर्फ गाय का ही दूध पीता है। सुभाष को आज भी वह दिन याद है जब दीपक को सेना में लिया गया और जूनियर विश्व चैंपियन बनने के बाद उसके पास पैसे आने लगे। उसने सबसे पहला काम उनके दूध सप्लाई करने के काम को बंद कराया। अब दीपक न तो उन्हें दूध बेचने देता है और न ही खेतों में काम करवाता है। उनका काम तो बस बेटे को गाय दूध, दही और मक्खन पहुंचाना रह गया है।
नौकरी के लिए अखाड़े में उतरे थे दीपक
दीपक ने जब कुश्ती शुरू की थी तब उनका लक्ष्य इसके जरिए नौकरी पाना था जिससे वह अपने परिवार की देखभाल कर सके। वह काम की तलाश में थे और 2016 में उन्हें भारतीय सेना में सिपाही के पद पर काम करने का मौका मिला, लेकिन ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने उन्हें छोटी चीजों को छोड़कर बड़े लक्ष्य पर ध्यान देने का सुझाव दिया। फिर दीपक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सुशील ने दीपक को प्रायोजक ढूंढने में मदद की और कहा, ‘कुश्ती को अपनी प्राथमिकता बनाओ, नौकरी तुम्हारे पीछे भागेगी।’ दीपक ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम के अपने सीनियर पहलवान की सलाह मानी और तीन साल में आयु वर्ग के कई बड़े खिताब हासिल किए।
केतली पहलवान के नाम से हैं मशहूर
दीपक के पिता सुभाष 2015 से रोज लगभग 60 किलोमीटर की दूरी तय करके उसके लिए झज्जर से दिल्ली दूध और फल लेकर आते थे। उन्हें बचपन से ही दूध पीना पसंद है। वह गांव में ‘केतली पहलवान’ के नाम से जाने जाते हैं। इसके पीछे भी दिलचस्प कहानी है। गांव के सरपंच ने एक बार केतली में दीपक को दूध पीने के लिए दिया और उन्होंने एक बार में ही उसे खत्म कर दिया। उन्होंने इस तरह एक-एक कर के चार केतली खत्म कर दी जिसके बाद से उनका नाम ‘केतली पहलवान’ पड़ गया।
शॉपिंग के शौकीन हैं दीपक
दीपक ने एक इंटरव्यू में अमर उजाला से कहा था कि उनकी सफलता का राज अनुशासित रहना है। उन्होंने कहा था, ‘मुझे दोस्तों के साथ घूमना, मॉल जाना और शॉपिंग करना पसंद है। लेकिन हमें प्रशिक्षण केंद्र से बाहर जाने की अनुमति नहीं है। मुझे जूते, शर्ट और जींस खरीदना पसंद है, हालांकि मुझे उन्हें पहनने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि मैं हमेशा एक ट्रैक सूट में रहता हूं। टूर्नामेंट के बाद जब भी मुझे मौका मिलता है मैं बाहर जाकर अपना मनपसंद खाना खाता हूं, लेकिन छुट्टी खत्म होने के बाद उसके बारे में सोचता भी नहीं हूं। उसके बाद कुश्ती और प्रशिक्षण ही मेरी जिंदगी होती है। 2015 तक मैं जिला स्तर पर भी पदक नहीं जीत पा रहा था। मैं किसी भी हालत में नतीजा हासिल करना चाहता था ताकि कहीं नौकरी मिल सके और अपने परिवार की मदद कर सकूं। मेरे पिता दूध बेचते थे। वह काफी मेहनत करते थे। मैं किसी भी तरह से उनकी मदद करना चाहता था।’
पिछले साल खरीदी थी एसयूवी
मैट पर उनकी सफलता से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। वह 2018 में भारतीय सेना में नायक सूबेदार के पद पर तैनात हुए। दीपक ने अब पिता को दूध बेचने से भी मना कर दिया। उन्होंने साल 2018 में एसयूवी कार खरीदी। उन्होंने हंसते हुए बताया था,‘मुझे यह नहीं पता है कि मैंने कितनी कमाई की है। मैंने कभी उसकी गिनती नहीं की। लेकिन यह ठीक-ठाक रकम है। ‘मैट दंगल’ पर भाग लिए अब काफी समय हो गया, लेकिन मैंने इससे काफी कमाई की और सब खर्च भी किया।’