दिल्ली के मुख्यमंत्री बृहस्पतिवार को जब चेन्नई एयरपोर्ट पहुंचे तो दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपर स्टार कमल हासन की बेटी अक्षरा हासन ने उनका स्वागत किया। एयरपोर्ट से केजरीवाल सीधे कमल हासन के घर पहुंचे। लंच पर साउथ के सुपर स्टार और आम आदमी पार्टी के संयोजक की मुलाकात हुई। इस मुलकात के बाद राजनीतिक गलियारों में कयासों का दौर शुरू हो गया और ये तक कहा जाने लगा कि कमल हासन अपनी पार्टी बना केजरीवाल के साथ गठबंधन करने वाले हैं। लेकिन असल में इस राजनीतिक चाल के मायने कुछ और ही हैं जिन्हें इस तरह से समझा जा सकता है।
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1. पंजाब विधानसभा और दिल्ली नगर निगम चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप)को मिली करारी हार के बाद पार्टी ने अपनी रणनीति में भारी फेरबदल किया है। इन चुनाव परिणामों के बाद से ही 'आप' ने नकारात्मक राजनीति से तौबा कर ली है। बता दें कि इससे पहले तक 'आप' भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री मोदी को सीधे निशाना बनाती रही थी।
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2. दिल्ली में प्रचंड बहुमत हासिल कर पिछले ढाई साल से सत्ता पर काबिज 'आप' भारी उथल-पुथल से गुजरी है और इस दौरान इसके कई मंत्री सहित विधायकों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं जिनमें से कई फिलहाल जेल में हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ कर सत्ता में आए केजरीवाल की छवि को इससे काफी नुकसान पहुंचा है।
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3. ईमानदार नेता और पार्टी की अपनी छवि को फिर से चमकाने के लिए केजरीवाल अब उन लोगों से हाथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं जिनकी सार्वजनिक जीवन में ईमानदार व्यक्ति की ईमेज है। ये बात बिल्कुल साफ है कि तमिलनाडु जैसे राज्य में आम आदमी पार्टी की संभावनाएं न के बराबर हैं लेकिन कमल हासन से केजरीवाल की मुलाकात असल में ईमानदार नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा है।
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4. अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक जीवन भले ही ज्यादा लंबा नहीं है लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव के चंद महीनों बाद ही पार्टी ने जिस तरह से राजधानी में भारतीय जनता पार्टी को धूल चटाते हुए विधानसभा की 70 में से 67 सीटों पर कब्जा किया उसके बाद केजरीवाल का कद काफी बड़ा हो गया। पार्टी को लगा कि केजरीवाल का चेहरा ही उनके लिए काफी है लेकिन पंजाब, गोवा विधानसभा और दिल्ली नगर निगम चुनावों में जिस तरह से पार्टी को करारी हार मिली उसके बाद पार्टी ने केजरीवाल के चेहरे के भरोसे राजनीति करने की रणनीति में भी बदलाव किया है।
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5. अब पार्टी का पूरा जोर आम आदमी पार्टी को दिल्ली के बाहर अन्य राज्यों में विस्तार देना है। पार्टी ने इसके लिए पूरा जोर लगा दिया है। पंजाब और गोवा में मिले कड़वे अनुभव के बाद पार्टी ने अब अन्य राज्यों में खुद को मजबूत करने की कोशिश शरू कर दी है जिसका असर राजस्थान विश्वविद्यालय में हुए स्टूडेंट इलेक्शन में साफ देखा जा सकता है जहां पार्टी की छात्र शाखा को सफलता मिली है। साथ ही यहां किसानों के मुद़दे उठाने की वजह से पार्टी को इस वर्ग का भी समर्थन मिल रहा है।
6. आम आदमी पार्टी ने बिहार में नीतीश कुमार और बंगाल में ममता बनर्जी से हाथ मिलाने की कोशिश की लेकिन इन दोनों ही पार्टनर के साथ पार्टी का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। नीतीश कुमार फिर से भाजपा के साथ हो गए हैं और ममता बनर्जी का मूड कब बदल जाए कोई भरोसा नहीं। ऐसे में पार्टी के लिए अन्य राज्यों में नए खिलाड़ियों को तलाशना और उनके साथ राजनीतिक खेल में उतरने की तैयारी करना स्वाभाविक है।