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ऐसी थीं शीला दीक्षित: रहने को चुना भूतिया बंगला, चमगादड़ भगाने से इनकार, दिया हैरिटेज वॉक का रूप

Sun, 21 Jul 2019 01:58 PM IST
शाहरुख खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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यह बंगला खूबसूरत तो था लेकिन लंबे समय से खाली पड़ा। इसे हाउंटेड बंगला माना जाता था जिसकी वजह से कोई मंत्री इसमें रहने को तैयार नहीं था। इसके सामने की सड़क पर देर शाम निकलने पर लोगों के कानों में चमगादड़ों की कर्कश आवाज पड़ती थी।  लोग इसे अभिशाप्ति और मनहूस मानते थे, क्योंकि खाली बगलें की चारदीवारी पर लगे पेड़ों पर दुर्लभ प्रजाति की चमकादड़ों ने डेरा बना लिया था। 
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शीला दीक्षित दिल्ली की ऐसी मुख्यमंत्री थीं जिन्होंने अपने अधिकारिक निवास को ही स्कूली बच्चों के लिए हैरिटेज वॉक बना दिया था। यह वाकया कुछ यूं रहा। जब उनके मुख्यमंत्री काल का दूसरा दौर शुरू हुआ तो प्रगति मैदान स्थिति घर छोटा पड़ने लगा, इसलिए उन्हें लुटियन दिल्ली का रुख करना पड़ा। यहां कई बंगले देखे पर बात 3 मोतीलाल नेहरू प्लेस पर बनी। जब इसे सीएम हाउस बनाया गया तो उनके सामने चमगादड़ों को हटाने का विकल्प रखा गया। 
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शीला दीक्षित को जब इन चमगादड़ों की दुर्लभ प्रजाति के बारे में पता चला तो उन्होंने उन्हें हटाने के बजाए वहीं उनके साथ रहने का फैसला किया। बाद में चमगादड़ों को संरक्षित करने के लिए काफी प्रयास किए। चमगादड़ों के अलावा बंगले के परिसर में पहले मौजूद कई तरह की संरक्षित प्रजाति के पेड़ों का संरक्षण कराया और उसे बच्चों के हैरिटेज वॉक के लिए दिल्ली सरकार को उपलब्ध करा दिया। बाद में यह बंगला पूर्व पीएम मनमोहन सिंह का आवास बना। 

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शीला खुद भी खूब मॉडर्न थीं: दिल्ली को मॉडर्न लुक देने वाली पूर्व सीएम शीला दीक्षित खुद भी कम मॉडर्न नहीं थीं। आत्मकथा ‘सिटीजन डेल्ही : माय टाइम्स, माय लाइफ’ में शीला ने खुद लिखा, मैं घंटों रेडियो पर अपने प्रिय गानों के आने का इंतजार करती। किताबें पढ़ने में भी खूब सुकून मिलता। स्कूल के दिनों का जिक्र करते हुए वह कहतीं, पिता जी जिमखाना क्लब के सदस्य थे और उनका परिवार क्लब के पास डूप्लेक्स लेन में रहता था, वह वहां से हर हफ्ते छह किताबें लातीं और अगले सप्ताह तक उन्हें पढ़ डालतीं। 
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निड ब्लायटन की कहानियां ‘फेमस फाइव’, रिचमल क्रॉम्पटन की ‘जस्ट विलियम्स’, एलेक्जेंडर डमास की ‘थ्री मस्कीटयर्स’ और विक्टर हूगो की ‘लेस मिजरेबल्स’ को वह खूब पढ़तीं थीं। उनकी पसंदीदा किताबे लुइस कैरल की ‘एलिस इन वंडरलैंड’ व ‘थ्रू द लुकिंग ग्लास, व्हॉट एलिस फाउंड देयर’ और शरलॉक होम्स की सीरीज हैं। 
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जनपथ से मिलते थे जूतों के नए स्टाइल: शीला का ब्र्रांड्स से पुराना नाता था लेकिन स्टाइल अच्छा हो तो वह पटरी से जूते खरीदने से भी गुरेज नहीं करती थीं। शीला ने आत्मकथा में लिखा कि जनपथ से उन्हें जूतों में नया स्टाइल मिलता और पटरी की इन दुकानों ने ही उन्हें बड़े ब्रांड बाटा और बलूजा से छुटकार  दिलाया। उन्हें जनपथ से तीन रुपये में मिलने वाली भड़कीले रंगों के स्ट्रैप वाली फ्लैट सेंडल रास आने लगीं।
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