उनके चेहरों पर अब अपना आशियाना खरीदकर उसमें रहने का उल्लास नहीं झलकता। अब दिखती है तो बस हताशा की गहरी परत। अपनी खून पसीने की कमाई लगाकर जो आशियाना खरीदा उसके उजड़ने का खौफ। जिनका नहीं उजड़ा उन्हें भविष्य की चिंता। क्या अब भी हम यहां पहले की तरह रह पाएंगे? क्या हमारा फ्लैट सुरक्षित है? क्या यह इमारत अवैध है जिसमें हम रह रहे हैं? क्या सरकार हमें मुआवजा देगी? ऐसे ही ढेरों सवाल हादसे में मकान गंवाने वालों के मन में तो हैं ही, जो दूसरी इमारतों में लोग रह रहे हैं वे भी चिंता में हैं। भविष्य को लेकर अनिश्चय। आइये देखते हैं वक्त ने कैसे शाहबेरी को दो दिन में बदलकर रख दिया।