दो साल पहले मुनीरका बस स्टॉप पर रात को एक लड़का और लड़की घर जाने के लिए इसी बस स्टॉप पर इंतजार कर रहे थे। उसके बाद जो हुआ उसे पूरा देश जानता है। ऑटो चालको का कहना है कि अब इस इलाके में लड़कियां रात में आने से घबराती हैं। (सभी फोटो: जी पॉल, कुमार संजय/अमर उजाला ब्यूरो)
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'अब इस इलाके में लड़कियां रात में आने से घबराती हैं'
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हां, बरसी के चलते मीडिया की आवाजाही के बीच मुनिरका बस स्टैंड से महीपालपुर फ्लाईओवर के बीच खाकी का पहरा था।
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संवाददाता सीमा शर्मा व फोटोग्राफर जी पाल ने 16 दिसंबर की घटना के केंद्र रहे स्थलों का रात में मुआयना किया।
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वसंत गांव की शीलम गर्भवती हैं और तबीयत खराब होने पर उनकेपति उन्हें चख पाली दिल्ली सरकार के अस्पताल लेकर आए थे। जांच के बाद वापस घर जाने केलिए कोई ऑटो चालक तैयार नहीं था।
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महिला के पति के मुताबिक, घर में छोटे बच्चों को छोड़कर आए थे, इसलिए करीब एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क पर ऑटो का इंतजार कर रहे हैं। ऑटो रुकते तो हैं, लेकिन जाने को तैयार नहीं।
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दया कहती हैं कि बेशक बसों की कमी के चलते परेशानी होती है, लेकिन भरोसा है कि सफर सुरक्षित होगा। पिछले दस सालों से डीटीसी बस से ही वापस घर जाती हूं, कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। यदि बस में कोई तंग करता है तो चालक-परिचालक को बताने से वे उसे बस से उतार देते हैं।
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तारा अपार्टमेंट जाने के लिए आयशा करीब सवा नौ बजे यहां पहुंची थी, लेकिन कोई भी ऑटो जाने के लिए तैयार नहीं था। इसी बीच एक ऑटो डीएल 7952 आकर रुकता है, लेकिन रेट दोगुना बताता है।
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महिला कहती है कि मीटर से चलो तो बड़े आराम से कहता है कि मीटर ही नहीं है तो चलूं कैसे? इसी बीच दो और ऑटो रुकते हैं, लेकिन जाने के लिए तैयार नहीं? जब अमर उजाला की टीम ने वजह पूछी तो कहने लगे कि गैस खत्म हो गई है।
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रिंग रोड पर बाहरी मुद्रिका की बस नंबर डीएल 1 पी 7483 में महिला यात्री नर्स पारुल कहती हैं कि देर देर शाम जब अस्पताल से घर जाना होता है तो ऑटो या कैब की बजाय डीटीसी बस ही बेहतर लगती है।
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डीटीसी बसों के चालक-परिचालक बेहद सुलझे हुए होते हैं। यदि दिक्कत हो तो वे पीसीआर तक मदद करवाने के लिए बस भी रोक देते हैं।