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गरीबों की मदद के लिए इस तरह मेहनत करते हैं मैग्सेसे विजेता अंशू

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एनजीओ गूंज के संस्थापक अंशु गुप्ता को साल 2015 के प्रतिष्ठित मैग्सेसे पुरस्कार मिलने के बाद दिल्लीवासियों और अंशु के परिवार में खुशी का माहौल है। (सभी फोटोः अनिल कुमार/अमर उजाला)
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गरीबों की मदद के लिए इस तरह मेहनत करते हैं मैग्‍सेसे विजेता अंशू

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पुराने कपड़ों व सामान को जरूरतमंदों तक पहुंचाने का जो जज्बा अंशू ने देखा, उसे अब दुनिया सलाम कर रही है।
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अंशु ने बताया कि कपड़ों व सामान के साथ व्यक्ति की यादें जुड़ी होती हैं।

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उन्होंने कहा कि इसे उनकी संस्था स्टोर रूम में सहेजकर सालों रखते रहते हैं।
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हालांकि उन पुरानी यादों को आलमारी में सहेजने की बजाय जब किसी जरूरतमंद के काम आता देखेंगे तो वह खुशी हर याद से बड़ी लगेगी।
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आज लाखों हाथ आगे बढ़कर सोसायटी की सोच बदलने में लगे हुए हैं।
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अंशू कहते हैं कि सामने वाले की खामियां देखते हुए उस पर चिल्लाने की बजाय यदि बदलाव की कोशिश करेंगे तो समाज व देश बदलेगा।

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बता दें कि शहरी क्षेत्रों से अंशू दान में दिए गए कपड़ों, खिलौनों को साफ व ठीक करके देश के उन गरीब जरूरतमंदों तक पहुंचाते हैं, जिन्हें उसकी सबसे अधिक जरूरत होती है।

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इसमें स्कूल यूनिफार्म व किताबें भी शामिल हैं।

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इसके लिए बाकायदा दिल्ली समेत दस शहरों में सेटअप बना रखा है, जहां कटाई, छंटाई होने के बाद आगे भेजा जाता है।

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अंशू कहते हैं कि वे सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को जोड़ रहे हैं, ताकि पर्यावरण को बचा सकें।

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इसलिए वे एक प्लेटफार्म तैयार करेंगे, जिसमें फुटपाथ को बचाने और वहां लगे पड़ों को क्रंकीट के जाल से मुक्त करेंगे।

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इसके लिए जल्द ही वे युवाओं समेत पर्यावरण बचाने का अलख जगाने जा रहे हैं।

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मैग्सेसे पुरस्कार की घोषणा के बाद संजीव चतुर्वेदी और अंशु गुप्ता के घर में बधाई देने वालों के फोन घनघनाने लगे।
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अमर उजाला से विशेष बातचीत में दोनों ने अपने अनुभव और कार्य के तरीकों को साझा किया।
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