पठानकोट आतंकी हमले के बाद भारत-पाक रिश्ते की खाई भले ही और गहरी हो गई हो, लेकिन गुड़गांव में उपचार करा रहे पाकिस्तानी मरीजों का कहना है कि नफरत फैलाने का काम सियासतदानों का है। सियासत से उभरे दरारों के बीच डॉक्टर-मरीज का रिश्ता दोनों मुल्कों के रिश्तों के बीच रहबर बनकर सामने आ रहा है। वहां से आए लाचार मरीजों के लिए डॉक्टर किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं। भारत के डॉक्टर पाकिस्तानी नागरिकों को नई जिंदगी दे रहे हैं। (शाहनवाज आलम/गुड़गांव, अमर उजाला)
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पाकिस्तानी बच्चे के लिए फरिश्ते बने भारतीय डॉक्टर, बचाई जान
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शहर के नामचीन अस्पतालों में कई पाकिस्तानी नागरिकों का इलाज चल रहा है। बीमार मरीजों की यही दुआ है कि दोनों मुल्कों के बीच अमन-चैन बना रहे और मधुर संबंध कायम हों। ताकि, वहां के लोगों को भारत आने में कोई दिक्कत न हो और न यहां से जाने वालों को कोई परेशानी। सियालकोट से मेदांता में मिर्गी का इलाज कराने आए 33 वर्षीय वक्कास के मामा आफताब कहते हैं कि हमारी पीढ़ियां इसी सरजमीं से वहां गई हैं। बड़े लोग अदब के साथ हिंदुस्तान का नाम लेते हैं। दहशतगर्दी से खुद पाकिस्तान भी तबाह हो रहा है।
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पाकिस्तानी बच्चे के लिए फरिश्ते बने भारतीय डॉक्टर, बचाई जान
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6 जनवरी को लाहौर के रहने वाले पौने तीन साल के सैयद अबुबकर गिलानी को गुड़गांव के अस्पताल में लीवर देकर उसकी मां अनुम आदिल ने जान बचाई। अबुबकर के लिए यहां के डॉक्टर फरिश्ता बनकर आए। पिता सैयद अदिलुर-रहमान कहते हैं पाकिस्तान में इतनी अच्छी मेडिकल सुविधा नहीं है। खुदा का शुक्र है, अब दोनों सही सलामत हैं। हिंदुस्तान की आबोहवा ने मेरे परिवार को नई जिंदगी दी है। किसी एक शख्स की गलती की सजा पूरे पाकिस्तान के अवाम को नहीं दी जा सकती। लाहौर के एक मरीज के साथ इसी अस्पताल में आए राणा सलमान कहते हैं भले ही सियासतदानों की वजह से सरहद की दूरी बढ़ गई हो, लेकिन यहां के लोग पाकिस्तान से आए लोगों का दिल खोलकर इस्तकबाल करते हैं।
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आम आदमी भी पाक में इसी तरह रहमदिली के साथ पेश आता है। बच्चों का लीवर ट्रांसप्लांट करने वाली डॉ. नीलम मोहन बताती हैं कि अस्पताल में पाकिस्तानी मरीजों को अधिक तवज्जो दी जाती है। वहां के लोग भी मोहब्बत से पेश आते हैं। हाल ही में तीन मरीजों का ऑपरेशन किया गया है। इसमें 6 साल के एमान और 15 वर्षीय समीर अलताफ भी शामिल हैं।
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कम खर्च में होता है उपचार डॉक्टरों की मानें तो पाकिस्तान में चिकित्सा सुविधा ठीक नहीं होने की वजह से मरीज दूसरे देशों की ओर रुख करते हैं। यूरोप और अन्य विकसित देश में इलाज का खर्च बहुत महंगा है। मेदांता अस्पताल के पीडियाट्रिक्स लीवर ट्रांसप्लांट विभाग की प्रमुख डॉ नीलम मोहन बताती हैं कि लीवर ट्रांसप्लांट के लिए यूरोप में करीब 70-75 लाख रुपये खर्च आता है तो यहां लगभग 15 लाख रुपये में काम होता है। दिल्ली के नजदीक होने और एयरपोर्ट से सीधी कनेक्टिविटी व एयर एंबुलेंस सुविधा होने की वजह से अधिकतर मरीज गुड़गांव आते हैं।