केवल एक फिल्म देखकर आज के समय में कोई सती प्रथा को मानने लगेगा, इस दावे पर यकीन नहीं किया जा सकता। आज के समय में बाल मजदूरी, दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या जैसे कई अहम मुद्दे हैं और याची सती प्रथा का मुद्दा उठा रहा है।
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हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी हिंदी फिल्म ‘पद्मावत’ के निर्माता व निर्देशक के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। स्वामी अग्निवेश की इस याचिका में कहा गया है कि इस फिल्म में जान-बूझकर सती प्रथा का महिमामंडन किया गया है। इसलिए फिल्म निर्माता व निर्देशक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का निर्देश दिया जाए। कोर्ट ने याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल ने सुनवाई के दौरान कहा कि देखना होगा कि फिल्म निर्माता व निर्देशक ने जानबूझकर सती प्रथा का महिमामंडन किया या नहीं। फिल्म की घोषणा के मुताबिक, यह एक काल्पनिक कृति है। इसमें निर्माता या निर्देशक संजय लीला भंसाली की कोई मंशा नजर नहीं आती।
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याचिका पर जिरह करते हुए अधिवक्ता महमूद प्राचा ने कहा कि सती प्रथा को सरकार काफी पहले खत्म कर चुकी है, क्योंकि यह एक सामाजिक बुराई थी। इसके बावजूद इस फिल्म में जौहर के रूप में सती प्रथा को दिखाया गया। इन दृश्यों को फिल्म से हटाया जाए और निर्माता व निर्देशक पर कानूनी कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने याची को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि उसकी बात मान भी ली जाए तो इस तरह तो महाभारत में द्रौपदी का चीर हरण महिलाओं के खिलाफ अपराध माना जाएगा। कोई कोई कुछ दिखा रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह उसका प्रचार कर रहा है। कोई फिल्म देखकर प्रभावित होता है तो इसमें फिल्म बनाने वाले का कोई दोष नहीं है।