इसमें प्रतिदिन 600 पैड बनाए जाते हैं जिसमें काम करने वाली सहायिकाओं को महीने में लगभग ढाई हजार रुपये की आमदनी होती है। इन्हीं में से राखी स्नातक तक पढ़ी हुई हैं। उनका कहना है कि पहले तो घरवालों को बताने में बहुत शर्म आती थी।
गांव में भी महिलाएं इस बारे में कम ही बातें करती थीं, लेकिन हमें पता था कि सैनिटरी पैड का इस्तेमाल जरूरी है। प्रीति भी पढ़ी लिखी हैं और उन्होंने काम के साथ-साथ दूसरी महिलाओं को इस बारे में जागरूक करना जारी रखा।
वक्त के साथ गांव के पुरुषों के सोच में भी बदलाव आया और वह अपनी ओर से आवश्यक सहयोग करने लगे। अब इस समूह में इन दोनों के अलावा स्नेह, अर्शी, रुखसाना, सुषमा और नीशू काम कर रही हैं। नीशू अभी कक्षा 11वीं की छात्रा हैं। वह अभी इस काम से जुड़ी हैं। नीशू का कहना है कि उन्हें अच्छा लगता है कि जब लोग इस समिति और इसके काम के बारे में जिक्र करते हैं।
कुछ समय पहले एक्शन इंडिया संस्था के लोगों के साथ फिल्म बनाने वाले कुछ लोगों की यूनिट आई। समिति से जुड़ी युवतियों और महिलाओं का कहना है कि उनके लिए फिल्म में काम करना बिल्कुल अनोखा था। गांव के लोग भी आश्चर्यचकित थे। जब पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस नाम की इस डॉक्यूमेंटरी फिल्म की शूटिंग हो रही थी तो किसी को अहसास नहीं था कि इसकी धूम पूरी दुनिया में होगी। उसके बाद इसे ऑस्कर के लिए चुना गया। उसके बाद लोग गांव में आने लगे, जिससे ग्रामीण खुश हैं। एक युवा अंकित का कहना है कि उन्हें खुशी है कि उनके गांव की बेटियों ने सारे क्षेत्र का नाम रोशन किया है।
बहुत कठिन रहा यह सफर
संस्था की जिले की टीम लीडर शबाना का कहना है कि इसका सफर बहुत कठिन रहा है। जब गांव में यूनिट लगाई गई तो कुछ लोगों ने काफी आपत्ति जताई। यह भी कहा गया कि गांव की भोली महिलाओं को बहकाया जा रहा है। कई बार लगा कि किसी और गांव का रूख किया जाए, लेकिन गांव की सुमन के सहयोग से लोगों को मनाया गया।
महिलाओं को समझाने के लिए छुप-छुप कर बात की जाती थी। जब फिल्म बनाने वाली यूनिट ने गांव में संपर्क किया तो साल 2017 में 15-15 दिनों के लिए दो बार शूटिंग हुई। विदेशी मूल के लोगों के आने से गांव के लोग आश्चर्यचकित थे। अब जब फिल्म के बारे में इतनी चर्चा हो रही है तो अधिकांश लोग खुश हैं।