ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 के पास हुए दर्दनाक हादसे ने रेस्क्यू सिस्टम की पोल खोल दी। अगर दमकल के प्रशिक्षण में तैराकी शामिल होती तो सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान बच जाती। पुलिस, दमकल कर्मियों को तैराकी नहीं आती थी। अभी पीएसी के जवानों को भी तैराकी का प्रशिक्षण दिया जाता है।
ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 के पास हुए दर्दनाक हादसे के बाद रेस्क्यू व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। घटना के दौरान रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सबसे पहले पुलिस और फिर दमकल के जवान पहुंचे थे। लेकिन कोहरे, ठंड और गहरे पानी के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में भारी दिक्कतें आईं।
जांच में सामने आया कि दमकल की टीम ने क्रेन भी बुलाई गई थी, लेकिन झाड़ियां, पानी की गहराई 30 फीट से अधिक होने, दलदल और कार के मुख्य सड़क से दूर 70 फीट दूर होने के कारण वह घटनास्थल तक नहीं पहुंच सकी। रात में घना कोहरा होने से जवानों को चारों ओर से पानी में उतरने का रास्ता दिखाई नहीं दिया और वह केवल सामने से ही प्रवेश की कोशिश करते रहे।
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इंजीनियर युवराज की फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
दमकल ने रस्सी रस्सी फेंककर भी युवक को बचाने का प्रयास किया, लेकिन कोहरा और अंधेरा होने के कारण सफलता नहीं मिली। इसके साथ ही पुलिस को रात में कोई गोताखोर नहीं मिले। पुलिस ने पास के गांव से नाव को मंगाने का प्रयास किया, लेकिन इसमें भी सफलता नहीं मिली।
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इंजीनियर युवराज की फाइल फोटो और पिता
- फोटो : अमर उजाला
जबतक एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के जवान पहुंचते युवक डूब चुका था। इस दौरान बचाव दल में करीब 80 लोग थे। मगर पुलिस, दमकल कर्मियों को तैराकी नहीं आती थी। अभी पीएसी के जवानों को भी तैराकी का प्रशिक्षण दिया जाता है।
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कार समेत डूब गया सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज
- फोटो : अमर उजाला
रिमोट ऑपरेटेड लाइफबॉय की खली कमी
सबसे अहम कमी आधुनिक जल-राहत उपकरणों की रही। जिले में तीन-तीन प्राधिकरण, 20 हजार से अधिक औद्योगिक इकाइयां और करीब 40 लाख की आबादी होने के बावजूद दमकल और पुलिस के पास डूबते व्यक्ति को तुरंत बचाने के लिए रिमोट ऑपरेटेड लाइफबॉय जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह उपकरण मौके पर होता तो संभव है कि सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान बचाई जा सकती थी।
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नोएडा के सेक्टर-150 में हुए हादसे में टूटी पड़ी नाले की दीवार
- फोटो : अमर उजाला
क्या होती है रिमोट ऑपरेटेड लाइफबॉय
रिमोट ऑपरेटेड लाइफबॉय एक आधुनिक तैरता हुआ जीवन रक्षक उपकरण होता है। जिसे रिमोट कंट्रोल से पानी में फंसे व्यक्ति तक भेजा जाता है। यह तेज गति से चलता है और डूबते व्यक्ति को सहारा देकर सतह पर टिकाए रखता है। इसमें जीपीएस और कैमरा भी लगा होता है। जिससे बचाव दल को सटीक लोकेशन और स्थिति की जानकारी मिलती रहती है।
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नोएडा के सेक्टर-150 में हुई कार दुर्घटना के बाद मौके पर जुटी भीड़
- फोटो : अमर उजाला
एक बार व्यक्ति इसके सहारे पकड़ बना ले तो उसे किनारे तक सुरक्षित खींचा जा सकता है, बिना किसी जवान को जान जोखिम में डाले गहरे या ठंडे पानी में उतरे। एक रिमोट ऑपरेटेड लाइफबॉय की कीमत करीब साढ़े चार लाख से छह लाख रुपये के बीच होती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी आबादी और औद्योगिक क्षेत्र वाले जिले में इस तरह के उपकरणों का होना बेहद जरूरी है।
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नोएडा के सेक्टर-150 में दुर्घटना ग्रस्त कार सवार को निकालने के लिए जाती एसडीआरएफ की टीम
- फोटो : अमर उजाला
सोशल मीडिया पर छाई रही घटना
एक्स (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर यह मामला पूरे दिन ट्रेंड करता रहा। लोगों ने प्राधिकरण और जिम्मेदार विभागों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए मांग की कि जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हो। जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा कि अगर प्रशासन समय रहते आधुनिक रेस्क्यू संसाधनों से लैस होता, तो यह हादसा टल सकता था।
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नोएडा के सेक्टर-150 में हुए हादसे के बाद घटना स्थल पर लगाए गए बैरियर
- फोटो : अमर उजाला
चश्मदीद को थाने में चार घंटे थाने में बैठाया
सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत मामले में रेस्क्यू ऑपरेशन और बचाव दल की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने वाले फ्लिपकार्ट के डिलीवरी बॉय मोनिंदर सिंह से नॉलेज पार्क कोतवाली पुलिस ने थाने बुलाकर पूछताछ की है। डिलीवरी बॉय ने बताया कि रविवार को उन्हें पूछताछ के लिए कई बार थाने से फोन आया।
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नोएडा के सेक्टर -150 स्थित गड्ढे में जहां कार गिरी थी उसके दूसरी तरफ भी नहीं है कोई बैरिकेड
- फोटो : अमर उजाला
पुलिस की ओर से कहा गया है कि उनसे घटना के संबंध में जानकारी लेनी है। इसके बाद वह दोपहर करीब 1 बजे थाने पहुंचे। इस दौरान उन्हें 5 बजे थाने से जाने दिया गया। आरोप है कि थाने के एक बाहर खड़ा कर वीडियो भी बनवाया गया। जिसमें उनसे यह बोलने को कहा गया कि हादसे के बाद पुलिस 10 से 15 मिनट में पहुंचकर बचाव कार्य शुरू कर दिया है।
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Noida Accident
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
हालांकि मोनिंदर ने फिर कहा है कि अगर समय रहते इंजीनियर को बचाने का प्रयास किया गया होता तो उनकी जान बच सकती थी। वह आगे भी सच बोलते रहेंगे। इसकी चाहे जो कीमत उठानी पड़े। हालांकि उन्होंने झूठी कार्रवाई में फंसा कर जेल भेजे जाने की आशंका जताई है।
मोनिंद ने कहा कि पुलिस गुंडा एक्ट के मामले में मुकदमे की बात कह रही है। जबकि वह उनका पुराना पारिवारिक विवाद के कारण है। दरअसल मोनिंदर का एक वीडियो सामने आया है। जिसमें वह वह कोतवाली के बाहर खड़े होकर या कहते सुनाई दे रहे हैं कि पुलिस ने सूचना के तुरंत बाद मौके पर पहुंचकर मदद का प्रयास किया लेकिन कोहरे के कारण देरी हुई।