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निर्भया: एक साथ चार को फांसी देकर इतिहास रचेगा तिहाड़, ऐसी होगी प्रक्रिया

Thu, 06 Feb 2020 05:22 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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निर्भया केस - फोटो : अमर उजाला
16 दिसंबर 2012 में हुए निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामले में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दोषियों को आखिरी सात दिन दिए जा चुके हैं। वहीं दूसरी ओर पटियाला हाउस कोर्ट से गुरुवार को तिहाड़ प्रशासन ने गुहार लगाई है कि वह नया डेथ वारंट जारी करे। ऐसे में माना जा रहा है कि दोषियों को जल्द ही तीसरा और आखिरी डेथ वारंट जारी कर दिया जाएगा। डेथ वारंट जारी होने के बाद एक बार फिर से तिहाड़ में फांसी की तैयारियां जोर पकड़ेंगी और पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया जाएगा। आइए जानते हैं कि फांसी तैयारी के दौरान कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाती है और फांसी वाले दिन से कुछ रोज पहले और उस दिन क्या-क्या होता है....

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फार्म नंबर 42 - फोटो : अमर उजाला
डेथ वारंट को क्यों कहते हैं ब्लैक वारंट
दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और दिल्ली सेंटर ऑन द डेथ पेनल्टी के डायरेक्टर अनूप सुरेंद्रनाथ के मुताबिक भारत की 30 से ज्यादा जेलों में फांसी का तख्ता है। यानी यहां फांसी देने के इंतजाम हैं। हर राज्य का अपना अलग जेल मैनुअल होता है। दिल्ली के जेल मैनुअल के मुताबिक ब्लैक वॉरंट सीआरपीसी (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर) के प्रावधान के तहत जारी किया जाता है। इसमें फांसी की तारीख और जगह लिखी होती है। इसे ब्लैक वॉरंट इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके चारों ओर (बॉर्डर पर) काले रंग का बॉर्डर बना होता है। 
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निर्भया केस - फोटो : अमर उजाला
फांसी से 14 दिन पहले मिलता है इस काम का समय
फांसी से पहले मुजरिम को 14 दिन का वक्त दिया जाता है ताकि वो चाहे तो अपने परिवार वालों से मिल ले और मानसिक रूप से अपने आप को तैयार कर ले। जेल में उनकी काउंसलिंग भी की जाती है। अगर कैदी अपनी विल तैयार करना चाहता है तो इसके लिए उसे इजाजत दी जाती है। इसमें वो अपनी अंतिम इच्छा लिख सकता है। अगर मुजरिम चाहता है कि उसकी फांसी के वक्त वहां पंडित, मौलवी या पादरी मौजूद हों तो जेल सुपरीटेंडेंट इसका इंतजाम कर सकते हैं। 

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निर्भया केस - फोटो : अमर उजाला
फांसी से दो दिन पहले जल्लाद पहुंचता है जेल और वहीं रहता है
कैदी को एक स्पेशल वॉर्ड की सेल में अलग रखा जाता है। फांसी की तैयारी की पूरी जिम्मेदारी जेल अधीक्षक की होती है। वो सुनिश्चित करते हैं कि फांसी का तख्ता, रस्सी, नकाब समेत सभी चीजें तैयार हों। उन्हें देखना होता है कि फांसी का तख्ता ठीक से लगा हुआ है, लीवर में तेल डला हुआ है, सफाई करवानी होती है, रस्सी ठीक हालत में है। फांसी के एक दिन पहले शाम को, फांसी के तख्ते और रस्सियों की फिर से जांच की जाती है। रस्सी पर रेत के बोरे को लटकाकर देखा जाता है, जिसका वजन कैदी के वजन से डेढ़ गुना ज्यादा होता है। जल्लाद फांसी वाले दिन से दो दिन पहले ही जेल आ जाता है और वहीं रहता है। 
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निर्भया के दोषी - फोटो : अमर उजाला
फांसी से कुछ घंटे पहले दोषी की मातृभाषा में पढ़कर सुनाया जाता है डेथ वारंट
फांसी हमेशा सुबह-सुबह ही होती है। नियम के अनुसार नवंबर से फरवरी - सुबह आठ बजे। मार्च, अप्रैल, सितंबर से अक्तूबर - सुबह सात बजे और मई से अगस्त - सुबह छह बजे फांसी दी जाती है। हालांकि उचित समय अदालत के फैसले पर ही निर्भर करता है। सुपरिटेंडेंट और डिप्टी सूपरिटेंडेंट फांसी के तय वक्त से कुछ मिनटों पहले ही कैदी के सेल में जाते हैं। सुपरिटेंडेंट पहले कैदी की पहचान करता है कि वो वही है, जिसका नाम वॉरंट में है। फिर वो कैदी को उसकी मातृभाषा में वॉरंट पढ़कर सुनाते हैं। उसके बाद सुपरिटेंडेंट की ही मौजूदगी में मुजरिम की बातें रिकॉर्ड की जाती हैं। फिर सुपरिटेंडेंट, जहां फांसी दी जानी है, वहां चले जाते हैं।
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निर्भया केस - फोटो : अमर उजाला
काले कपड़े पहनाकर हाथ बांधकर ले जाते हैं फांसी घर
डिप्टी सुपरिटेंडेंट सेल में ही रहते हैं और उनकी मौजूदगी में मुजरिम को काले कपड़े पहनाकर, उसके हाथ पीछे से बांध दिए जाते हैं। अगर उसके पैर में बेड़ियां हैं तो वो हटा दी जाती हैं। फिर उसे फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जाता है। उस वक्त डिप्टी सुपरिटेंडेंट, हेड वॉर्डन और छह वॉर्डन उसके साथ होते हैं। दो वॉर्डन पीछे चल रहे होते हैं, दो आगे और एक-एक तरफ से मुजरिम की बांह पकड़ी जाती है। मुजरिम फांसी वाली जगह पहुंचता है। उस जगह सुपरिटेंडेंट, मजिस्ट्रेट और मेडिकल ऑफिसर पहले से मौजूद होते हैं। सुपरिटेंडेंट, मजिस्ट्रेट को बताता है कि उन्होंने कैदी की पहचान कर ली है और उसे वॉरंट उसकी मातृभाषा में पढ़कर सुना दिया है। 
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निर्भया केस - फोटो : सोशल मीडिया
कैदी को फिर हैंगमैन (जल्लाद) के हवाले कर दिया जाता है। अब अपराधी को फांसी के तख्ते पर चढ़ना होता है और उसे फांसी के फंदे के ठीक नीचे खड़ा किया जाता है। उस वक्त तक वॉर्डन उसकी बांहें पकड़कर रखते हैं। इसके बाद जल्लाद उसके दोनों पैर टाइट बांध देता है और उसके चेहरे पर नकाब डाल देता है। फिर उसे फांसी का फंदा पहनाया जाता है। जिन्होंने बांहें पकड़ रखी थी, अब वो वॉर्डन पीछे हो जाते हैं। फिर जैसे ही जेल सुपरिटेंडेंट इशारा करते हैं, हैंगमैन (जल्लाद) लीवर को खींच देता है। इससे मुजरिम जिन दो फट्टों पर खड़ा होता है वो नीचे वेल में गिर जाते हैं और मुजरिम फंदे से लटक जाता है। रस्सी से मुजरिम की गर्दन जकड़ जाती है और धीरे-धीरे वह मर जाता है।

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इसी बस में हुआ था निर्भया सामूहिक दुष्कर्म - फोटो : अमर उजाला
बॉडी आधे घंटे तक लटकती रहती है। आधे घंटे के बाद डॉक्टर उसे मरा हुआ घोषित कर देता है। उसके बाद उसकी बॉडी को उतार लिया जाता है और पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया जाता है। सुपरिटेंडेंट अब फांसी का वॉरंट लौटा देता है और ये पुष्टि करता है कि फांसी की सजा पूरी हुई। हर फांसी के तुरंत बाद सुपरिटेंडेंट, इंस्पेक्टर जनरल को रिपोर्ट देता है। फिर वो वॉरंट उस कोर्ट को वापस लौटा देते हैं, जिसने ये जारी किया था।
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
पोस्टमॉर्टम के बाद मुजरिम की बॉडी परिवार वालों को सौंप दी जाती है। अगर कोई सुरक्षा कारण है तो जेल सुपरिटेंडेंट की मौजूदगी में शव को जलाया या दफनाया जाता है। यहां ये ध्यान देने वाली बात है कि फांसी की सजा पब्लिक हॉलीडे यानी सरकारी छुट्टी के दिन नहीं होती।
(ये जानकारी दिल्ली के जेल मैनुअल और तिहाड़ के पूर्व जेलर सुनील गुप्ता से बातचीत पर आधारित है। सुनिल गुप्ता के सामने आठ फांसी हुई हैं - रंगा-बिल्ला, करतार सिंह-उजागर सिंह, सतवंत सिंह-केहर सिंह, मकबूल भट्ट, अफजल गुरु की फांसी।) 
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