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निर्भया केसः दोषियों को फांसी देते वक्त क्यों होती हैं इशारों में बातें, रुमाल का लेते हैं सहारा

Mon, 10 Feb 2020 01:41 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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nirbhaya case - फोटो : सोशल मीडिया
निर्भया के दोषियों को अपने सभी कानूनी विकल्प आजमाने के लिए दिया गया सात दिन का समय कल यानी 11 फरवरी को खत्म हो जाएगा। माना जा रहा है कि कल सुप्रीम कोर्ट में दोषियों को अलग-अलग फांसी की सजा की याचिका पर फैसला आने के बाद जल्द ही दोषियों का नया डेथ वारंट भी जारी हो जाएगा। इसके साथ ही तिहाड़ में एक बार फिर फांसी की तैयारियां भी शुरू हो जाएंगी। क्या आप जानते हैं कि जब दोषी, जल्लाद और जेल अधिकारी फांसी घर में मौजूद होते हैं और फांसी दी जाने वाली होती है तो सभी खामोश होते हैं और पूरी प्रक्रिया इशारों में संपन्न की जाती है। जानिए आखिर ऐसा क्यों होता है....
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nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला
बता दें कि सुबह की खामोशी में निर्भया के दोषियों को फांसी दी जाएगी। जेल मैन्युअल के मुताबिक, सुबह सूर्योदय के बाद ही फांसी दी जाती है। आमतौर पर गर्मियों में सुबह छह बजे और सर्दियों में सात बजे फांसी दी जाती है। फांसी घर लाने से पहले दोषी को सुबह पांच बजे  नहलाया जाता है। उसके बाद उसे नए कपड़े पहनाए जाते हैं। फिर चाय पीने के लिए दी जाती है। दोषी से नाश्ते के बारे में पूछा जाता है। अगर वह नाश्ता करना चाहता है तो उसे नाश्ता दिया जाता है। 
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nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला
उसके बाद मजिस्ट्रेट दोषी से उनकी आखिरी इच्छा के बारे में पूछते हैं। उसके बाद उसे काला कपड़ा पहनाकर उसके हाथ को पीछे से बांध कर फांसी घर लाया जाता है। यहां पहुंचने के बाद उसके चेहरे को भी ढंक दिया जाता है। यह सब काम जल्लाद करता है। 

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nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला
फांसी देते वक्त कोई आवाज न हो इसके लिए पूरे बंदोबस्त किए जाते हैं। जब फांसी देने का वक्त आता है तो उसके लिए इशारे के तौर पर रुमाल को गिराया जाता है और जल्लाद लिवर खींचता है। सभी काम इशारों में इसलिए किया जाता है ताकि फांसी घर में मौजूद किसी भी शख्स का ध्यान भंग न हो और न ही जिन्हें फांसी दी जा रही है वो हिंसक हों। इसलिए पूरी प्रक्रिया बड़ी ही खामोशी से पूरी की जाती है।
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निर्भया के दोषियों को होगी फांसी - फोटो : Amar Ujala
इनके सामने दी जाती है फांसी

जेल मैन्युअल के अनुसार, इस दौरान एक डॉक्टर, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट, जेलर, डिप्टी जेलर और करीब 12 पुलिसकर्मी मौजूद रहते हैं। यहां सारी कार्रवाई इशारों में होती है। ब्लैक वारंट में तय समय पर दोषी को वहां लाकर जल्लाद उसकी गर्दन में फंदा डाल देता है। 
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निर्भया के दोषी - फोटो : अमर उजाला
पहले रुमाल गिरेगा, फिर लिवर खिंचेगा

फिर जेलर के रुमाल गिराकर इशारा करने पर जल्लाद लिवर खींच देता है। लिवर खींचते ही तख्त खुल जाता है और फंदे पर लटका दोषी नीचे चला जाता है। दो घंटे बाद डॉक्टर वहां पहुंचकर उसकी जांच करता है। धड़कन बंद होने की पुष्टि होने के बाद उसे मृत घोषित कर दिया जाता है। उसके बाद उसे फंदा से नीचे उतार लिया जाता है। इस दौरान जेल में कोई काम नहीं होता है। फांसी लगने के बाद ही जेल के दरवाजे खोले जाते हैं। 
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- फोटो : अमर उजाला
जेल अधिकारियों के मुताबिक, दोषियों के वजन के हिसाब से फंदे की रस्सी की लंबाई तय होती है। तख्त के नीचे की गहराई करीब 15 फीट है, ताकि फंदे पर लटकने के बाद झूलते पैर का फासला हो। कम वजन वाले दोषी को लटकाने के लिए रस्सी की लंबाई ज्यादा रखी जाती है, जबकि भारी वजन वाले के लिए रस्सी की लंबाई कम रखी जाती है। सूत्रों का कहना है कि अफजल की फांसी के ट्रायल के दौरान दो बार रस्सी टूट गई थी।   
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