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Nirbhaya Case: पांच बिंदुओं में समझें फांसी की प्रक्रिया, मुजरिमों के वो आखिरी पल

Fri, 20 Mar 2020 05:39 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला
फांसी के सजा पाए निर्भया के गुनहगार आखिरकार 7 साल, 3 माह और तीन दिन बाद अपने अंजाम पर पहुंच गए। निर्भया के चारों दोषियों को शुक्रवार तड़के 5:30 बजे तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाया गया। आइए पांच बिंदुओं में समझें फांसी की प्रक्रिया के बारे में। 

जारी होता है ब्लैक वारंट
हर राज्य का अपना अलग जेल मैनुअल होता है। दिल्ली के जेल मैनुअल के अनुसार सीआरपीसी के प्रावधान के तहत ब्लैक वारंट जारी किया जाता है। इसमें फांसी की तारीख और जगह लिखी होती है। इसे ब्लैक वारंट इसलिए कहते हैं क्योंकि इसके चारों ओर काले रंग का बॉर्डर बना होता है। सरकारी छुट्टी के दिन फांसी नहीं दी जाती है।
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Nirbhaya Case - फोटो : अमर उजाला
फांसी से पहले 14 दिन
फांसी से पहले मुजरिम को 14 दिन का समय परिवार वालों से मिलने, मानसिक रूप से तैयार होने के लिए दिया जाता है। इस दौरान जेल में उनकी काउंसलिंग भी होती है। अगर कैदी वसीयत तैयार करना चाहता है तो इसकी इजाजत दी जाती हैं। इसमें वो अपनी अंतिम इच्छा लिख सकता है। अगर मुजरिम चाहता है कि उसकी फांसी के समय वहां पंडित, मौलवी या पादरी मौजूद हो तो जेल प्रशासन इसकी व्यवस्था कर सकता है। मुजरिम को विशेष वॉर्ड सेल में अलग रखा जाता है।

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nirbhaya case - फोटो : सोशल मीडिया
जेल अधीक्षक कराते हैं रिहर्सल
फांसी की तैयारी की पूरी जिम्मेदारी जेल अधीक्षक की होती है। वह सुनिश्चित करता है कि फांसी का तख्ता, रस्सी, नकाब समेत सभी सामान तैयार हों। एक दिन पहले शाम को, फांसी के तख्ते और रस्सियों की फिर से जांच होती है । रस्सी पर रेत के बोरे को लटकाकर देखा जाता है, जिसका वजन कैदी के वज़न से डेढ़ गुना ज्यादा होता है। जल्लाद दो दिन पहले ही जेल आ जाता है और वहीं रहता है।
 

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निर्भया के दोषी - फोटो : अमर उजाला
मातृभाषा में मौत का फरमान, मुजरिम की बातें होती हैं रिकॉर्ड
जेल अधीक्षक और उपाधीक्षक फांसी के तय समय से कुछ मिनट पहले दोषियों की सेल में जाते हैं। अधीक्षक पहले कैदी की पहचान करते हैं कि वो वही है, जिसका नाम वारंट में है। कैदी को उसकी मातृभाषा में वारंट पढ़कर सुनाते हैं। मुजरिम की बातें रिकॉर्ड की जाती हैं। मुजरिम को काले कपड़े पहनाकर, हाथ पीछे से बांध दिए जाते हैं। पैर की बेड़ियां हटा दी जाती हैं।
 
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nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला
मुजरिम के आखिरी पल
  • कैदी को फांसी के तख्ते की ओर ले जाया जाता है। उपाधीक्षक, हेड वॉर्डन और छह वॉर्डन साथ होते हैं। दो वॉर्डन पीछे चल रहे होते हैं, दो आगे। दो लोग मुजरिम की बाहें पकड़े रहते हैं।
  • फांसी वाली जगह अधीक्षक, मैजिस्ट्रेट और चिकित्सा अधिकारी मौजूद होते हैं।
  • सुपरिंटेंडेंट, मजिस्ट्रेट को बताते हैं कि उन्होंने कैदी की पहचान कर ली है और उसे वारंट मातृभाषा में पढ़कर सुना दिया गया है। इसके बाद कैदी को जल्लाद के हवाले कर दिया जाता है।
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Nirbhaya Case - फोटो : अमर उजाला/सोशल मीडिया
  • अपराधी को फांसी के तख्ते पर चढ़ाया जाता है और उसे फंदे के ठीक नीचे खड़ा किया जाता है। उस वक्त तक वॉर्डन कैदी की बांहे पकड़कर रखते हैं।
  • इसके बाद जल्लाद कैदी के दोनों पैर कसकर बांध देता है और उसके चेहरे पर नकाब डाल दिया जाता है। फिर उसे फंदा पहनाया जाता है। बाहें पकड़ने वाले वॉर्डन पीछे हो जाते हैं।
  • इसके बाद जेल अधीक्षक के इशारा करने पर जल्लाद लीवर खींच देता है। करीब आधे घंटे  बाद डॉक्टर की पुष्टि के बाद शव को उतारकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया जाता है।
  • पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार को सौंप दी जाती है। अगर कोई सुरक्षा कारण है तो जेल अधीक्षक की मौजूदगी में शव का अंतिम संस्कार किया जाता है।
  • फांसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जेल अधीक्षक, महानिरीक्षक को रिपोर्ट देते हैं। फिर वह वारंट उस कोर्ट को लौटा देते हैं, जिससे यह जारी हुआ था।
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