वो 16 दिसंबर 2012 की काली रात थी। रात के करीब 11 बजे थे जब 23 साल की युवती को सफदरजंग अस्पताल में लाया गया था। वह बुरी तरह से घायल थी और खूब खून बह रहा था। वह रह-रह कर बेहोश हो रही थी और उसके पूरे शरीर पर उस ठिठुरती रात में सिर्फ एक कपड़ा लिपटा हुआ था। वह जैसे ही अस्पताल के एक वार्ड में पहुंची तुरंत उस कमरे के सभी पर्दे लगा दिए गए और नर्सों ने उसे अस्पताल की चादर से ढक दिया। इसके बाद कुछ डॉक्टर पहुंचे। निर्भया की जिंदगी के उन अंतिम 11 दिनों की कहानी जब वह सफदरजंग अस्पताल में भर्ती थी और कैसे डॉक्टर भी उसकी हिम्मत का लोहा मानने को हुए मजबूर।
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Nirbhaya Case
- फोटो : अमर उजाला
यह युवती थी निर्भया, जो 16 दिसंबर से लेकर अगले 11 दिनों तक सफदरजंग अस्पताल में ही रही, जब तक वह सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में नहीं चली गई। आज भी उसका इलाज करने वाले डॉक्टर उसे भूले नहीं हैं। वह कहते हैं कि वो पहला एक्स-रे था जिसने हमें उसके साथ हुई बर्बरता से काफी हद तक अवगत कराया। हमने निर्भया के पेट का एक बेसिक एक्स-रे किया था, जिसे देखकर हम चौंक गए थे क्योंकि उस रिपोर्ट में युवती की आंत ही नहीं दिखाई दी थी।
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निर्भया की मां
- फोटो : ANI
डॉक्टर ने आगे बताया कि मैं ये समझ ही नहीं पा रहा था कि उसकी आंत को क्या हुआ। मुझे लगा था कि मशीन को या तो रिपेयर की जरूरत है या फिर मैं ही अंधा हो गया हूं। एक्स-रे में देखा गया कि निर्भया के शरीर में मुश्किल से दो-तीन इंच ही आंत बची थी जबकि सामान्य दशा में एक महिला के शरीर में 20-22 फीट लंबी आंत होती है। एक्स-रे रिपोर्ट आने के बाद तुरंत वरिष्ठ सर्जनों को बुलाया गया और युवती को सर्जरी के लिए ले जाया गया ताकि उसके आंतरिक घावों का भी परीक्षण किया जा सके। 17 दिसंबर की रात दो बजे तक लगातार तीन घंटे की लंबी प्रक्रिया के बाद डॉक्टरों को पता चला कि पीड़िता का शोषण करते वक्त उसके शरीर से आंत ही निकाल ली गई थी।
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सफदरजंग की ही एक महिलारोग विशेषज्ञ ने एक बार कहा था कि यह केस रेप केस से कहीं ज्यादा था। दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म के मामलो में भी हम यही देखते हैं कि पीड़िता के नाजुक अंगों में चोटें आती हैं। यहां तक कि वे बहुत गंभीर दुर्बल करने वाली चोटें हैं। लेकिन ऐसा मामला जहां मरीज की पूरी आंत बाहर निकाली गई थी, ऐसा हमने पहले कभी नहीं देखा था, भले ही हमारे पास सबसे बड़ा स्त्री रोग विभाग हो।
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सफदरजंग अस्पताल के मेडिकल सुपरीटेंडेंट रहे बीडी अथानी ने एक बार कहा था कि डॉक्टरों ने इंफेक्शन रोकने के लिए पांच सर्जरी की। यह एक जबरदस्त प्रयास था, इसीलिए जब हम उसे बचा नहीं पाए तो ऐसा शून्य छोड़ दिया। डॉक्टरों को आज भी निर्भया के लड़ने का जज्बा याद है। अस्पताल की नर्सें बताती हैं कि पहली सर्जरी के बाद ही वह अलर्ट हो गई थी और उसने अपने मोबाइल फोन और क्रेडिट कार्ड के बारे में पूछा था।
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निर्भया को एनेस्थीसिया देने वाले एक स्टाफ ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि निर्भया ने मजिस्ट्रेट के सामने दो बार अपना बयान दर्ज कराया था, वो भी डिटेल में। दूसरी बार उसका बयान रिकॉर्ड हो सका था, उसकी हालत तब तक खराब होना शुरू हो गई थी। उसे बुरी तरह से ब्लड इंफेक्शन और पीलिया हो गया था और उसे रेस्पिरेटरी सपोर्ट(सांस लेने में मदद करने वाली मशीन) पर रखा गया था। स्टाफ ने ये भी बताया कि अस्पताल का स्टाफ नाराज था क्योंकि पुलिस चाहती थी कि पीड़िता अपनी डरावनी आपबीती दोबारा उन्हें सुनाए क्योंकि पुलिस और सरकार में कुछ मतभेद हो गए थे।
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निर्भया का इलाज करने वाले 10-12 डॉक्टरों की टीम उसके इलाज के दौरान के कई किस्से भी बताते हैं। इन डॉक्टरों ने बताया था कि कैसे जब वह बोल नहीं पाती थी तो अपने परिवार के लिए एक-दो लाइन के नोट लिखती थी। वह कैसे सोते वक्त अपनी मां के हाथ को मजबूती से पकड़े रहती थी और कैसे उसने अविश्वसनीय रूप से उन फोटोग्राफर और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मदद की थी जो उसके शरीर पर काटने के निशानों के सबूत इकट्ठे करने आए थे।
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एक डॉक्टर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब एक फोटोग्राफर आया तो कैसे निर्भया की मां गुस्से में आ गई थीं, लेकिन पीड़िता ने इशारों में मां को शांत कराया। और उसे आने के लिए कहा। वह बहुत बहादुर थी। जब हमने दो मनोरोग विशेषज्ञों को उसे और उसके परिवार की काउंसिलिंग के लिए लगाया तो वह काफी सकारात्मक थी। उसने अपने फीजियोथेरेपी ट्रेनिंग के बारे में भी बात की।
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एक अन्य एनेस्थीसिया स्टाफ ने बताया कि 25 दिसंबर की रात को उसे एक बार दिल का दौरा पड़ा तो उसके दिल की धड़कने पूरे दो मिनट बाद वापस आ सकीं। नर्सों ने बताया था कि उस समय वह एक-दूसरे से लिपटकर सिर्फ निर्भया की सलामती की दुआएं कर रही थीं। एनेस्थीसिया स्टाफ ने कहा था कि इसके बाद वह कभी नहीं उठी। उसके दिमाग में ऑक्सीजन सप्लाई कुछ देर के लिए बंद हो चुकी थी और जब उसे सिंगापुर ले जाया गया तो वह बेहोशी की ही हालत में थी। सिंगापुर ले जाने से पहले दो डिकॉय एंबुलेंस का इंतजाम किया गया और बुर्का पहने एक फोटोग्राफर भी आईसीयू में आई थी जो उसके पासपोर्ट के लिए फोटो खींचने आई थी।
एक नर्स ने निर्भया के इलाज के उन 11 दिनों को याद करते हुए एक बार कहा था कि अस्पताल की इन दीवारों के बाहर उस वक्त एक आंदोलन चल रहा था और यहां अंदर हम अपनी लड़ाई लड़ रहे थे जिसमें वो हमारी हौसला अफजाई कर रही थी। जब हम कुछ नहीं कर सकते थे तो हमने प्रार्थना की।