रविवार की विशेष सुनवाई में क्या थी वकीलों की दलीलें
मेहता: चारों दोषी न्याय प्रणाली के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और राष्ट्र के सब्र की परीक्षा ले रहे हैं। दोषियों की हरकतें बहुत घृणित थीं, जिसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, इसलिए उनकी फांसी में देरी नहीं की जा सकती। इस तरह की देरी का समाज के साथ ही दोषियों पर भी अमानवीय प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पवन गुप्ता की समीक्षा याचिका खारिज हो चुकी है। उसने अभी तक सुधारात्मक और दया याचिका नहीं दी है।
रेबेका जॉन: निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। जब दोषी से कहा गया कि वह निचली अदालत के आदेश को यहां चुनौती नहीं दे सकता है, इसके लिए उसे सुप्रीम कोर्ट जाने को कहा गया तो यही नियम केंद्र पर भी लागू होना चाहिए। सुनवाई के दौरान केंद्र कभी निचली अदालत में पक्षकार नहीं रहा। चारों दोषियों के खिलाफ डेथ वॉरंट के लिए न तो केंद्र और न ही दिल्ली सरकार कभी निचली अदालत पहुंची।
मेहता: दोषी मुकेश की ओर से निचली अदालत में कहा कि गया वह दया याचिका नए सिरे से दाखिल करने पर विचार कर रहा है। जबकि नए सिरे से दया याचिका तभी दायर की जा सकती है जब उसमें किसी तरह की बदलाव की जरूरत हो। इससे साफ है कि दोषी के इरादे कितने घातक हैं।
रेबेका जॉन: शत्रुघ्न चौहान के मामले के संदर्भ में दया याचिका को नए तथ्यों के आधार पर चुनौती दी जा सकती है। राष्ट्रपति तथ्यों के आधार पर कोर्ट से अलग निर्णय दे सकते हैं। राष्ट्रपति क्षमा भी कर सकते हैं, इसलिए हम जोर दे रहे हैं कि सबको एक साथ सजा दी जाए।
मेहता: सुप्रीम कोर्ट के 1982 के हरवंश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा हुई। दोषी जीता सिंह को इसलिए लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि उसे पहले फांसी दे दी गई थी।
रेबेका जॉन: हम भी इस मामले में वह स्थिति नहीं चाहते कि किसी को फांसी मिल जाए और किसी की सजा में बाद में बदलाव हो जाए। फांसी की सजा को फांसी के बाद वापस नहीं किया जा सकता।
एपी सिंह: जेल के नियम 836 और 858 दोषियों को यह अधिकार देते हैं कि वह बचे हुए अपने कानूनी विकल्प का इस्तेमाल करें। शत्रुघ्न चौहान मामले से भी साफ है कि संविधान में फांसी देने के लिए कोई निर्धारित समय नहीं दिया गया है। केवल दया याचिका खारिज होने के बाद भी फांसी देने के लिए 14 दिन का समय मिलता है। केवल इसी मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों। न्याय में जल्दबाजी न्याय के दफन होने जैसा है।
रेबेका जॉन: मैं बर्बर हूं, मैंने घिनौना अपराध किया है, लेकिन मैं भी अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण का हकदार हूं। मृत्युदंड की सजा मिलने के बावजूद मैं अधिकार रखता हूं कि मुझसे उचित व्यवहार किया जाए। संविधान के अनुसार मौत की दहलीज पर खड़े दोषी के भी आखिरी सांस तक कुछ अधिकार हैं।