देश की राजधानी दिल्ली अपने दामन में इतिहास की ऐसी विरासत को समेटे हुए है जिसे जाने बिना इस शहर और इसकी गंगा-जमुनी तहजीब को समझना मुश्किल है। इस खास पेशकश में हम आपको दिल्ली पर लगभग तीन सौ साल तक राज करने वाले मुगल शासकों और उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ तथ्य परक और रोचक किस्सों से रूबरु करा रहे हैं...तो आइए जानते हैं मुगल शासक जहांगीर हिंदुओं देवताओं के प्रति क्या सोच रखता था और उसने उनके प्रति कैसा व्यवहार किया।
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क्या इस मंदिर में पवित्र काले पत्थर को पूजते थे मुसलमान?
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मुगल शासकों की धार्मिक मान्यताओं को लेकर कई किस्से आपने सुने होंगे। इतिहासकार भी इसे अपने-अपने तरिके और विभिन्न घटनाओं के जरिए परिभाषित करते रहे हैं। जहांगीर को लेकर भी ऐसे ही किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज है। माना जाता है कि जहांगीर ने हिन्दू धर्म में ईश्वर के अवतार सम्बंधी मान्यता को अस्वीकार कर दिया था। इसे लोग अमूमन जहांगीर की रुढ़िवादी नीति से जोड़कर देखते आए हैं। जहांगीर की धार्मिक मान्यताओं को लेकर एक व्याख्या इरफान हबीब ने भी प्रस्तुत की है।
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मूर्ति पूजा और अवतार को लेकर जहांगीर का दृष्टिकोण अकबर के धार्मिक विश्वासों से कोई अलग नहीं था क्योंकि अकबर ने भी अपने सुवचनों में अवतारों के सिद्धान्त की आलोचना की थी और अकबर मूर्ति पूजा को भी अज्ञान का परिणाम मानता था। इसके अलावा अवतारों के सिद्धान्तों को अस्वीकार करने के लिए जहॉगीर इस्लाम को नहीं बल्कि बुद्धि को आधार बनाता है।
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रुढ़िवाद का जहॉगीर की रियायत के संकेत के रूप में एक और घटना का हवाला दिया गया है। जो विष्णु के वराह अवतार को लेकर पुष्कर में घटित हुई थी। पुष्कर के चारों तरफ अनेकों नए और पुराने देवघर थे जहां जहॉगीर उस देवघर को देखने गया जिसे उसके एक राजपूत अमीर राणा शंकर ने एक लाख रुपए की लागत से बनवाया था। यह यात्रा स्वयं राणा शंकर के निमंत्रण पर की गई थी।
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जहॉगीर को मंदिर में वराह भगवान की मूर्ति अच्छी नहीं लगी और उसने वराह रूप में विष्णु के अवतार के विचार के खिलाफ कठोर भाषा का प्रयोग किया। उसने आदेश दिया मूर्ति को तोड़कर तालाब में फेंक दिया जाए।
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जहॉगीर की इस घटना के निश्चित ही कुछ निहितार्थ हैं जिनको अनदेखा किया जाता है। लेखक के मुताबिक जहॉगीर का विष्णु की दूसरी मूर्तियों से कोई झगड़ा नही था। वह विष्णु को ईश्वर के रूप में भी स्वीकार करता था।
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लेकिन उसकी चिढ़ तो दूसरे रूपों में नहीं, वराह रूप में ईश्वर को देखकर पैदा हुई थी। क्योंकि वह तो मूर्तियां देखने ही गया था। वराह की मूर्ति को बाहर फेंके जाने का काम एक अमीर के एक मंदिर तक सीमित था।
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यह मूर्तियों के विध्वंस का कोई सामान्य आदेश नहीं था। उसी वर्ष 1613 में और सम्भवत: उसी समय अजमेर के अनी राय सिंह दलन की सिफारिश पर जहॉगीर ने पूरा पुष्कर गांव उस स्थान के ब्राहाम्णों को मददे-मआश के रूप में दे दिया था। जहॉगीर ने दूसरे बहुत से हिंदू धर्मकेंद्रों की भी यात्रा की थी।
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वह वृन्दावन के मानसिंह द्वारा बनवाए गए मन्दिर, हरिद्वार के मन्दिर और कश्मीर के सुन्दर मू्र्तियोंवाले मन्दिरों का वर्णन करता है। जब वह कांगड़ा जा रहा था, रास्ते में पड़े हरिद्वार पर उसका वर्णन उल्लेखनीय है।
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मैने उनमें से हरेक को उसकी आवश्यकता के अनुसार नकद और वस्तुओं के रूप में खैरातें दी हैं। बताया जाता है कि कंगाड़ा की विजय के बाद जहॉगीर ने किले का दौरा किया था।
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जहॉगीर दुर्गा की काले पत्थर की पवित्र मूर्ति पर भी सन्देह व्यक्त करता है क्योंकि उसकी राय में मूल मूर्ति को कुछ आरम्भिक मुस्लिम विजेताओं ने नदी में फेंक दिया था।
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लेकिन उसने न तो मंदिर को नष्ट किया और न ही ज्वालामुखी में पवित्र काले पत्थर को स्पर्श किया। वह कहता है कि बड़ी संख्या में मुसलमान इस मंदिर में आते हैं और काले पत्थर की पूजा करते हैं।
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ऐसे में इस वृत्तान्त में यह संकेत देनेवाली कोई बात नहीं कि वह हिंदूओं को अपमानित करना चाहता था। जो बात इससे साफ है वह ये है कि विजय से जहॉगीर जितना उचित था उससे ज्यादा श्रेय ले रहा था। नोट- उक्त विवरण इरफान हबीब की पुस्तक 'मध्यकालीन भारत' (श्रृंख्ाला-9) के गैर 'मुसलमानों के साथ्ा जहांगीर के संबंध्ा' अध्याय पर आधारित है।