फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

विज्ञापन
1 of 12
‘25 अप्रैल को 12 बजे दिन में एकाएक हिमस्खलन होने लगा। जोर-जोर से आवाजें आने लगीं। पहाड़ हिलने लगे। भारी हलचल होने लगी। बर्फ की बड़ी-बड़ी़ चट्टानें हमारी ओर लुढ़कते हुए आ रही थीं। पैरों के नीचे से नीली बर्फ फट रही थी। एकबारगी ऐसा लगा कि अब जिंदा बचना मुश्किल है।’
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

2 of 12
दुनिया की पांचवीं सबसे ऊंची चोटी माउंट मकालू फतह अभियान को भूकंप की वजह से बीच में छोड़कर नोएडा वापस लौटे पर्वतारोही अर्जुन वाजपेयी मंगलवार को खौफनाक मंजर बयां कर रहे थे। अर्जुन ने बताया कि 11 अप्रैल को काठमांडू से माउंट मकालू की चोटी फतह करने निकले थे। टीम में आस्ट्रिया, स्पेन, जापान, चीन, कनाडा और अमेरिका के 12 अन्य सदस्य थे। तुमलिंग तार से चढ़ाई शुरू हो जाती है।
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

3 of 12
23 अप्रैल को 19500 फीट की ऊंचाई पर स्थित मकालू के एडवांस बेस कैंप पर पहुंचे। 25 अप्रैल को करीब 12 बजे दिन में कैंप में अपने चार साथियों के साथ बैठे हुए थे। तभी कुछ हलचल का अहसास हुआ। एकाएक जोर-जोर से आवाजें आने लगीं। सभी भागकर कैंप से बाहर निकले।

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

4 of 12
23 अप्रैल को 19500 फीट की ऊंचाई पर स्थित मकालू के एडवांस बेस कैंप पर पहुंचे। 25 अप्रैल को करीब 12 बजे दिन में कैंप में अपने चार साथियों के साथ बैठे हुए थे। तभी कुछ हलचल का अहसास हुआ। एकाएक जोर-जोर से आवाजें आने लगीं। सभी भागकर कैंप से बाहर निकले।
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

5 of 12
बाहर का नजारा देखकर इनके होश उड़ गए। सभी को पहाड़ हिलता नजर आया। हिम स्खलन होने लगा। बर्फ की बड़ी-बड़ी चट्टानें लुढ़कती हुई नीचे की ओर आ रही थीं। सभी को अपने उन साथियों की चिंता होने लगी जो उनसे कुछ ऊपर थे। इनको यही लगा कि इस भयानक हादसे के बाद कोई नहीं बचा होगा। काफी नुकसान हुआ होगा। लेकिन 12 घंटे के बाद पता चला कि किसी को नुकसान नहीं हुआ है।
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

6 of 12
साथियों ने राहत मंगाने की बात कही। चुकी सभी ने इस तरह की आपदा से निपटने का प्रशिक्षण लिया हुआ था। साथ ही इस तरह के हिम स्खलन से हमेशा दो-चार होना पड़ता था इसलिए मदद लेने का फैसला टाल दिया गया। । लेकिन यह हादसा काफी बड़ा था। जिन शेरपाओं को चोटें आई थीं। उनका प्राथमिक उपचार किया गया।
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

7 of 12
इसके बाद एक मई तक एडवांस बेस कैंप में ही रहे। लेकिन मौसम ज्यादा खराब होने लगा। इसके बाद वहां से करीब 18000 फीट की ऊंचाई पर हिलेरी बेस कैंप तक नीचे आए। यहां मौसम और खराब होने लगा। यहां करीब दो-तीन दिन रहे। अंत में उनके अलावा स्पेन के पांच, दो आस्ट्रियन व तीन शेरपा बचे। यहां से मदद की अपील की गई। लेकिन खराब मौसम की वजह से हेलीकाप्टर से मदद नहीं मिल पाई। मौसम और खराब होने लगा।

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

8 of 12
मदद मिलते नहीं देख सभी भागते हुए ढाई घंटे में 14000 फीट पर यांग्ले खारका गांव पहुंचे। इस ढाई घंटे के रास्ते को उन्होंने कभी न भुलाने वाला बताया। अर्जुन ने बताया कि जिस रास्ते से वे चढ़े थे वह पूरा का पूरा तबाह हो चुका था। हर जगह बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी पड़ी थीं। नेपाली आर्मी ने नीचे उतरने में इनकी मदद की। यहां से हेलीकाप्टर की मदद से वापस निकले।

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

9 of 12
मदद मिलते नहीं देख सभी भागते हुए ढाई घंटे में 14000 फीट पर यांग्ले खारका गांव पहुंचे। इस ढाई घंटे के रास्ते को उन्होंने कभी न भुलाने वाला बताया। अर्जुन ने बताया कि जिस रास्ते से वे चढ़े थे वह पूरा का पूरा तबाह हो चुका था। हर जगह बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी पड़ी थीं। नेपाली आर्मी ने नीचे उतरने में इनकी मदद की। यहां से हेलीकाप्टर की मदद से वापस निकले।

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

10 of 12
शुरू में राहत की जरूरत महसूस नहीं हुई। लेकिन मौसम लगातार बिगड़ता ही चला गया। तूफान थमने के बाद आर्मी ने ऑपरेशन शुरू किया और पर्वतारोहियों को निकालना शुरू किया। इंडियन आर्मी ने भी नेपाली आर्मी की मदद की।

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

11 of 12
बर्फ की चट्टानों के गिरने के भय से कोई भी पर्वतारोही सोया नहीं। बेस कैंप पर भी एक-एक कर सभी ने पहरेदारी की। सभी सचेत रहे ताकि हिम स्खलन के दौरान समय रहते बचाव का रास्ता ढूंढा जा सके। सभी 24 घंटे में केवल एक से डेढ़ घंटे ही नींद ले पाते थे। उनका कहना है कि हालत यह है कि अभी बिजली का झटका देने पर भी महसूस न हो। अर्जुन ने बताया कि पहाड़ों पर हिम स्खलन और बर्फ की चट्टानों का खिसकना और धंसना नई बात नहीं है। लेकिन इस बार जैसा हुआ वैसा पहले जैसा नहीं था। यह हिमस्खलन वहां तक पहुंचा, जहां पहले नहीं पहुंचा था। बेस कैंप को सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं था।
विज्ञापन

बड़ी-बड़ी लुढ़कती चट्टानों के बीच जब सामने खड़ी थी इनकी मौत

12 of 12
किसी तरह की चोट लगी होने के सवाल पर कहा कि शरीर घायल हो तभी चोट लगना नहीं कहा जाता। कई प्रकार की चोट लगी है। मानसिक, भावनात्मक सहित कई प्रकार के चोटों से घायल हूं। जब लगा कि अब हम नहीं बच पाएंगे तो फिर उस समय का अहसास भुलाना मुश्किल है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें